एक लड़की की जिन्दगी - कुर्रतुल ऐन हैदर Ek Ladki Ki Jindagi - Hindi book by - Qurratul Ain Haider
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एक लड़की की जिन्दगी

कुर्रतुल ऐन हैदर

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :183
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6908
आईएसबीएन :9788126700530

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एक रोचक उपन्यास...

 

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दुल्हन रुख़सत होकर जा चुकी थी। मँझली खाला कोनों में मुँह छिपाकर रोती फिर रही थी। बड़े भैया बार-बार आँसू पीने की कोशिश कर रहे थे। लोगों के उठने के बाद शामियाने के नीचे सोफ़े अब ज़रा वेतरतीवी से पड़े थे। कारचोवी मसनद पर जहाँ निकाह और बाद में आरसी मुसहिफ़ हुआ था, अब बच्चे कूद रहे थे और फूलों के हार बिखरे प़डे थे। मीरासने गाते-गाते थक चुकी थीं। शहर की ‘ऊँची सोसाइटी’ के अफ़राद मेज़वानों को खुदा हाफ़िज़ करके मोटरों में सवार हो रहे थे। विलकीस रिश्तेदारों के हुजूम में अंदर बैठी जोर-जोर से हँस रही थी। स्याह शेरवानी और चूड़ीदार पाजामे में मलबूस उसका कज़िन मेहमानों को सिगरेट पेश करते-करते उकताकर सोफ़े पर बैठ गया था। उसकी भाभीजान शामियाने के एक कोने में उसके दोस्तों के हुजूम में खड़ी मसल-ए-कश्मीर पर धुआँधार तकरीर कर रही थीं। यह हमारा पटरा करवाएँगी’-नादिर ने जरा परेशानी से सोचा और फिर कॉफी मँगवाने के लिए कोठी के अंदर चला गया।

वह उसी तरह खड़ी वहस में उलझ रही थी जब एक शानदार शख़्स हाथ में कॉफ़ी की प्याली लिए उसके करीब से गुज़रा और उसे देखकर बड़ी उदासी से मुस्कुराया गोया उसकी आँखों में तैरते बेपायाँ अलम को समझता हो या समझने की कोशिश कर रहा हो।

 

1

 

वह दोपहर भी हमेशा की तरह बड़ी आम-सी दोपहर थी जब डाक्टर सीता मीरचंदानी को मालूम हुआ कि जमील ने दूसरी शादी कर ली। घड़ी उसी तरह टिक-टिक कर रही थी। नवंबर के आसमान पर परिदें उसी तरह चक्कर काट रहे थे। एशियन थिएटर इंस्टीट्यूट में लड़कियाँ और लड़के ‘‘बच्चों के थिएटर’’ की क्लास में उसी तरह कठपुतलियाँ बनाना सीख रहे थे। वह ललिता से मिलने यहाँ आई थी। तीन बजे उसे हिमा के यहाँ पहुँचकर शहज़ाद के हमराह 1 ‘मुद्राराक्षस’ के रिहर्सल में जाना था। रात को मॉर्डन थिएटर के अराकीन2 ने मिसेज डोलीसेन के यहाँ खाना खाने के लिए मदऊँ3 किया था। जिंदगी कितनी मसरूफ थी ! (और कितनी खाली थी !) ढाई बजे वह मथुरा रोड से बस मे बैठकर अलीपुर लेन की तरह रवाना हुई थी। कमिश्नर लेन में आकर ‘‘पीली कोठी’’ की सुर्ख बजरीवाली तवील 4 सड़क पर पहुँची थी। ‘‘पीली कोठी’’ के चबुतरे पर बैठी हुई लड़कियों को हलो-हलो करती ‘‘नीली कोठी’’ के गार्डन हाउस की गैलरी में दाखिल हुई थी। दरवाज़े के बराबर शहजाद का कमरा था। उसने झाँककर कमरे में से देखा था कि शहजाद अभी थी जब गैलरी के दूसरे फोन की घंटी थर्राना शुरू हो गई। फोन बहुत देर से बज रहा था और बीच में चंद लम्हों के लिए रुक गया था। उसने लपककर रिसीवर उठाया था। उस वक्त तीन बजा था। दूसरे सिरे पर बिलकीस ज़ोर-ज़ोर से कह रही थी, ‘‘हिमा, क्या सीता तुम्हारे यहाँ पहुँच गई हैं ?’’ ‘‘हाए...बिलकीए...मैं सीता बोल
1. साथ; 2. सगस्यगण;3. आमंत्रित; 4. लंबी।
रही हूँ। कोई खास बात है ?’’

‘‘अरे, तुम बड़ी जल्दी पहुँच गई। खास बात ?....ओह....अरे...हा हा हा...आज बड़ा मज़ा आया...प्रदीप ने कामरान से कहा...?’’
‘‘कुछ नहीं...ऐसे ही..’’ बिलकीस की आवाज मामूल1 से ज्यादा पुरसुकून2 थी। ‘‘हि हि हि ! मैंने सोचा, जरा मालूम कर लूँ, आज की खबरे क्या है ? तुमने ललिता को हमीदा का पैगाम पहुँचा दिया या नहीं ?’’
उसके बाद कोई बीस मिनट तक बिलकीस ने शहर की थिएटर गासिप की थी !
अब साढ़े चीन बजा था। सीता ने आजिज़ आकर कहा था, ‘‘बिली डियर...क्या तुमने यही सब बतलाने के लिए फोन किया है ?’’
‘‘अरे भई वह...’’
‘‘न्यूयार्क से कोई ख़त आया है ?’’
‘‘हाँ’’, बिलकीस की आवाज का मसनूई3 जोश यकलख्त4 मद्धम पड़ गया।
‘‘क्या बात है बिलकीस ?’’
‘‘जमील भैया ने...जमील भैया ने शादी कर ली।’’

घड़ी की टिक-टिक ....शहज़ाद ने जोर से करवट बदली और उसकी पलंग के स्प्रिंग बज उठे। बाहर उन्नाबी गुलाब की क्यारियों के पास हिमा का बच्चा टीहूँ-टीहूँ करके रोया। खाने के कमरे में बिशनसिंह ने खटाक से अलमारी बंद की।
‘‘किससे ?’’ सीता ने इस तरह पूछा गोया अंधे कुएँ में से बोल रही है।
‘‘कोई कांटिनेंटल लड़की है...।’’ मीलों दूर चाणक्यपुरी मे बिलकीस के घर की जिंदगी भी मामूल के मुताबिक जारी थी। बच्चे शोर मचा रहे थे। चाय के बरतन खड़खड़ाते थे। छोटी खाला5 रामअवतार पर बिगड़ रही थीं। ड्राइंगरूम में बिलकीस की बड़ी भांजी फर्श पर उकड़ूँ बैठी टेपरिकार्ड
1. सामान्य 2. शान्तिपूर्ण; 3. बनावटी; 4 एकाएक, 5. मौसी।
चला रही थी- तमाम उम्र रहा गम्ज-ओ-अदा1 का शिकार...‘‘दरवाजा भेड दो...खामोश ! अरे, बोल मत चले जाओ भई....वाह वाह, बहुत खूब, क्या बात है...कि गम्ज़-ओ-अदा क्या है....अरे भई दोबारा पढ़िएगा....तमाम उम्र रहा...यह ग़ज़ल बिलकीस केयहाँ चंद रोज हुए, किसी शायर ने तरन्नुम से पढ़ी थी और सीता को बहुत पसंद थी। उन सब आवाजों में मिलकर बिलकीस की आवाज़ साफ सुनाई नहीं दी।
‘‘ज़रा से बोली भई...तुम्हारे यहाँ बहुत रोला मच रहा है,’’
सीता ने तकरीबन चिल्लाकर कहा था।

‘‘एक कांटिनेंटल, लड़की है, तफसील मालूम नहीं। सिर्फ इतना ही लिखा है यू एन. में उनके दफ्तर में काम करती है...कोई होगी...अरे मुज़फ्फर भैया, मेरे सर पर क्यों झूल रहे हो ? बाहर जाकर कूदो। अरे हाँ, कोई होगी वेट्रेस या टाइपिस्ट कमबख्त।’’
‘‘वो मेरी तरफ से एलिजाबेथ टेलर से ब्याह कर लें मुझसे मतलब...’ सीता ने बड़ी मतानत2 से जवाब दिया। वह फोन के करीब रखी हुई आरामकुर्सी से टिक चुकी थी। गैलरी बहुत तारीक3 थी और गैरमामूली तौर पर सर्द !
‘‘इसमें सिर्फ एक कबाहत4 है सीता डियर....एलिजाबेथ टेलर तो ब्याह रचा चुकी है और सुना है प्रिंसेस मार्गरेट के भी आजकल में हाथ पीले होनेवाले है। सारी दुनिया मे यही दो लड़कियाँ उन्हें पसंद थीं और तीसरी नरगिस, तो वह भी हाल ही में अपने घरबार की हो चुकी।’’

बिलकीस अनवर अली मुल्क की चोटी की स्टेज-एकट्रेस होने के नाते अब फिर बड़ी नार्मल आवाज़ में बात कर रही थी। इस साल उसे देहली नाट्य संघ की तरफ से बेहतरीन एक्ट्रेस होने का एवार्ड मिला था। मॉडर्न थिएटर की अगली पेशकश ने वह गजब की अलमिया5 अदाकारी6 करनेवाली थी। फिर वह अपनी आवाज से किस तरह जाहिर होने देती कि दरअसल क्या सोच रही है।
‘‘बिलकीस...’’
1.नाज-नखरे; 2.विनम्रता. नर्मी; 3. अँधेरी; 4.झंझट. 5त्रासद, 6 अभिनय।
‘‘हाँ भई सीता...’’
‘‘अच्छा मैं जरा हिमा से मिल लूँ। शाम को मुलाकात होगी... बाई...’’
‘‘बाई...सीता...’’

 

2

 

बिलकीस ने रिसीवर रख दिया और लांज में से गुजरकर अपने कमरे की तरफ चली गई। दरमियानवाले कमरे में छोटी खाला फालसई शाल में सर से पाँव तक लिपटी तुलसीपुर से आए हुए किसी रिश्तेदार से बातों में मसरूफ थीं। पिछले लान पर बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। अवाख़िर ख़िज़ाँ का1 सूरज बहुत धुँधला-धुँधला, लांज के शीशों में से झाँक रहा था। अपने कमरे में जाकर बिलकीस ने सिंगामेज से ख़त उठाया जो क्लीनिक्स के डिब्बे पर आधा खुला पड़ा था। स्टूल पर टिककर उसने दोबारा पढ़ना शुरू किया। उसके चहेते ख़ालाज़ाद भाई ने इधर-उधर की बातों के बाद आखिर में सिर्फ़ एक पैरा और लिखा थाः

‘‘....मैंने पिछले इतावर को एक स्पेनिश लड़की से शादी कर ली। वह मेरे ही सेक्शन में काम करती है बहुत माकूल लड़की है। इंटेलेक्चुएल नहीं है। स्मिथ कालिज की तालीमयाफ्ता2 है जो यहाँ का सख़्त एरिस्ट्रोक्रेटिक कालिज है। चुनांचे इतमीनान रखो, तुम्हारी भावज ‘‘शॉप गर्ल’’ नहीं जो कालिज है। चुनांचे इतमीनान रखो, तुम्हारी भावज ‘‘शॉप गर्ल’’ नहीं जो तुम नेटिव लड़कियों का रासिख3 अकीदा4 है कि तुम्हारे नाख़लफ़5 भाई लोग मगरिब6 में आकर शॉप गर्ल्ज और बकौल तुम्हारे धोबनों को समेट लाते है...वाकई ! तुम लोग किस कदर जबरदस्त स्नॉब हो। बहरहाल तसवीर आइंदा भेजूँगा। कार्मन खूबसूरत नहीं मगर सारी पहनकर बिलकुल हिंदुस्तानी लगेगी क्योंकि ‘आज भी इस देश में आम है चश्मे-गजाल7 वगैरह ! यह

1.पतझड़ के अंतिम दिनों का; 2. शिक्षाप्राप्त; 3. पक्का; 4. विश्वास आस्था; 5. निकम्मे; 6. पश्चिम; 7. हिरन जैसी आँख।
बात अम्माँ को बतला देना। राहूल तरह है। कार्मन से अभी से बहुत हिल-मिल गया है और खूब मोटा हो रहा है माशाअल्लाह से। मैं कल ही कार्मन के साथ उसके स्कूल गया था।
‘‘तुम अगले साल फॉल के ज़माने में जहाँ आओ जब मशरिकी1 साहिल के शानदार जंगल सुर्ख पत्तों की आग से बिलकुल दहक उठते है। सुना है तुमको यहाँ आकर एक्टिंग सीखने के लिए स्कॉलरशिप मिल गया है। कब तक आ रही हो ? हम लोग क्रिसमस के लिए बोस्टन जाएँगे।’’

सीता के मुतल्लिक उसने एक लफ्ज़ नहीं लिखा था-सीता जो उसके बेटे राहुल की माँ थी !
1951 मे बिलकीस के पास जमील का खत उसी न्यूयार्क से आया था। (उस रोज भी वह इसी तरह एक रिहर्सल के लिए बाहर जानेवाली थी। यही सब लोगो थे, यही दुनिया, यही मसरूफियतें।) और चंद घरेलू बातों के बाद उसने लिखाः
‘‘....और कोई खास बात काबिले-तहरीर2 नहीं।

‘‘हाँ, एक चीज़ अलबत्ता बतलाना भूल गया। मैने पिछले हफ़्ते एक सिंधी लड़की से शादी कर ली। वह कोलंबिया में सोशियोलॉजी पढ रही है। जात की आमिल है जो सिंधियो में बडी़ ऊँची जात समझी जाती है। लिहाजा अम्माँ को कम-अज-कम यह इतमीनना होना चाहिए। कि मैने किसी नीच फिरंगन’ को पल्ले नहीं बाँध लिया। अब बिटिया तुम इस इश्तियाक3 में मेरी जा रही होगी कि उसकी शक्ल कैसी है। तो भई, बेहद गोरी है। एकदम सुर्खों सफेद और काफी खूबसूरत है। औरतों के हुस्न की तारीफ के मामले में हमेशा का कंजूस हूँ (क्योंकि जरा-सी तारीफ से उनका दिमाग खराब हो जाता है) मगर यह वाकई अच्छी-खासी कुबूल-सूरत लड़की है। कद में तुमसे जरा निकलती है। उर्दू बहुत साफ नहीं बोलती मगर बड़ा पायँचा पहनकर ऐन-मैन चाँदपुर मौजा 4तुलसीपुर, जिला फैजाबाद की सय्यदानी मालूम होगी, इतमीनान रखो !
‘‘हमने अभी से तय कर लिया है कि बच्चे का नाम राहुल रखेंगे।

1, पूर्वीः 2. लिखने योग्य. 3 जिज्ञासा,. 4. गाँव।

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