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विक्रमोर्वशी

कालिदास

प्रकाशक : राजपाल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :151
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7016
आईएसबीएन :978-81-7028-776

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महाकवि कालिदास रचित विक्रमोर्वशी तथा मालविकाग्निमित्र ...

Vikramorvashi - A Hindi Book - by Kalidas

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कविकुल गुरु कालिदास ने जहाँ संस्कृत साहित्य में उच्चकोटि के महाकाव्यों और खंडकाव्यों की रचना की, वहीं उत्कृष्ट नाटकों का भी सृजन किया। विक्रमोर्वशी तथा मालविकाग्निमित्र उनके लोकप्रिय नाटक हैं। दोनों ही नाटकों में नायक का नायिका से अकस्मात् मिलन, संयोग, वियोग और अंत में पुनर्मिलन होता है। यह कालिदास की ही विशेषता है कि नायक नायिका के सुख-दुःख में जड़-प्रकृति भी मुखरित हो उठती है।


महाकवि कालिदास को सर्वसम्मति से भारत का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। उन्होंने अपने महाकाव्यों नाटकों तथा मेघदूत और ऋतुसंहार जैसे काव्यों में जो अनुपम सौंदर्य भर दिया है, उसकी तुलना संस्कृत साहित्य में अन्यत्र कहीं नहीं मिलती। इसीलिए उन्हें ‘कवि-कुलगुरु’ भी कहा जाता है। यों संस्कृत में माघ, भारवि और श्री हर्ष बड़े कवि हुए हैं, जिनकी रचनाएँ ‘शिशुपालवध’, ‘किरातार्जुनीय’ तथा ‘नैषधीयचरितम्’ बृहत्त्रयी अर्थात् तीन बड़े महाकाव्यों में गिनी जाती हैं और कालिदास के ‘रघुवंश, ‘कुमारसम्भव’ और ‘मेघदूत’ को केवल लघुत्रयी कहलाने का गौरव प्राप्त है। फिर भी भावों की गहराई, कल्पना की उड़ान तथा प्रसादगुणयुक्त मंजी हुई भाषा के कारण लघुत्रयी पाठक को जैसा रस-विभोर कर देती है, वैसा बृहत्त्रयी की रचनाएँ नहीं कर पातीं। विभिन्न प्रकार के काव्य-चमत्कारों के प्रदर्शन में भले ही उन कवियों ने भारी प्रयास किया है, किन्तु जहाँ तक विशुद्ध काव्य-रस का सम्बन्ध है, उनमें से कोई भी कालिदास के निकट तक नहीं पहुँचता। ‘‘एकोऽपि जीयते हन्त कालिदासो न केनचित्। श्रृंगारे ललितोद्गारे कालिदासत्रयी किमु।’’ (राजशेखर)।

किन्तु संस्कृत भाषा के इस सर्वश्रेष्ठ कवि के सम्बन्ध में हमारी जानकारी केवल इतनी ही है कि वे कुछ संस्कृत काव्यों और नाटकों के प्रणेता थे। उनकी लिखी हुई अड़तीस रचनाएँ कही जाती हैं, जो निम्नलिखित हैं– 1. अभिज्ञान शाकुन्तल 2. विक्रमोर्वशीय 3. मालविकाग्निमित्र 4. रघुवंश 5. कुमारसम्भव 6. मेघदूत 7. कुन्तेश्वरदौत्य 8. ऋतुसंहार 9. अम्बास्तव 10. कल्याणस्तव 11. कालीस्तोत्र 12. काव्यनाटकालंकाराः 13. गंगाष्टक 14. घटकर्पर 15. चंडिकादंडकस्तोत्र 16. चर्चास्तव 17. ज्योतिर्विदाभरण 18. दुर्घटकाव्य 19. नलोदय 20 नवरत्नमाला 21. पुष्पबाणविलास 22. मकरन्दस्तव 23. मंगलाष्टक 24. महापद्यषट्क 25. रत्नकोष 26. राक्षसकाव्य 27. लक्ष्मीस्तव 28. लघुस्तव 29. विद्वद्विनोदकाव्य 30. वृन्दावनकाव्य 31. वैद्यमनोरमा 32. शुद्धचन्द्रिका 33. श्रृंगारतिलक 34. श्रृंगाररसाष्टक 35. श्रृंगारसारकाव्य 36. श्यामलादंडक 37. ऋतुबोध 38. सेतुबन्ध। किन्तु इनमें से पहली छह और ‘ऋतुसंहार’ ही सामान्यतया प्रामाणिक रूप से उनकी लिखी मानी जाती हैं। कुछ लोग ‘ऋतुसंहार’ को भी कालिदास-रचित नहीं मानते। ऐसा भी प्रतीत होता है कि कालिदास नाम से बाद में एक या दो और कवियों ने भी अपनी रचनाएँ लिखीं। इसीलिए राजशेखर ने अपने श्लोक में, जिसका हमने ऊपर उल्लेख किया है, तीन कालिदासों का जिक्र किया है। सम्भव है कि असली कालिदास के अतिरिक्त दूसरे कालिदास-नामधारी कवियों ने ये शेष रचनाएँ लिखी हों, जिनको आलोचक मूल कालिदास के नाम के साथ जोड़ना पसन्द नहीं करते।

‘अभिज्ञान शाकुन्तल,’ ‘विक्रमोर्वशीय’ और ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक तथा ‘रघुवंश’, ‘कुमारसम्भव’, और ‘मेघदूत’ काव्य कालिदास के यश को अमर रखने के लिए पर्याप्त हैं। संस्कृत में ऐसे कवि कम हैं जिनकी इतनी प्रौढ़ रचनाओं की संख्या एक से अधिक हो। भवभूति के लिखे तीन नाटक तो प्राप्त होते हैं, किन्तु उसने महाकाव्य लिखने का प्रयत्न नहीं किया।
इतने बड़े साहित्य का सृजन करने वाले इस कवि-शिरोमणि ने अपने सम्बन्ध में कहीं भी कुछ नहीं लिखा। यह कवि की अत्यधिक विनम्रता का ही सूचक माना जा सकता है। अन्य कई संस्कृत कवियों ने अपनी रचनाओं में अपने नाम के साथ-साथ अपने माता-पिता के नाम तथा जन्मस्थान का उल्लेख किया है; परन्तु कालिदास ने केवल अपने नाटकों के प्रारम्भ में तो यह बतला दिया है कि ये नाटक कालिदास रचित हैं, अन्यथा और कहीं उन्होंने अपना संकेत तक नहीं दिया। रघुवंश के प्रारम्भ में उन्होंने यह अवश्य लिखा है कि ‘मैं रघुओं के वंश का बखान करूँगा।’’ परन्तु यह ‘मैं’ कौन है, इसका उल्लेख रघुवंश के श्लोकों में नहीं है। वहाँ भी जहाँ कालिदास ने उत्तमपुरुष एक वचन में अपना उल्लेख करते हुए यह लिखा है कि ‘‘मैं रघुओं के वंश का बखान करूँगा’’, वहाँ अतिशय विनय से काम लिया है। न केवल उन्होंने अपने-आपको ‘तनुवाग्विभव’ कहा है, अपितु यह भी कहा है कि ‘‘मेरी स्थिति उस बौने के समान है, जो ऊँचाई पर लटके फल को लेने के लिए हाथ बढ़ा रहा हो’ और यह कि ‘‘मेरा प्रयत्न छोटी-सी नाव से सागर को पार करने के यत्न जैसा है’’; और अन्त में दूसरे प्राचीन कवियों का आभार स्वीकार करते हुए कहा है कि ‘‘जैसे वज्र से मणि में छेद कर देने के बाद उसमें सुई से भी धागा पिरोया जा सकता है, उसी प्रकार प्राचीन कवियों द्वारा रघु के वंश का वर्णन किए जा चुकने के बाद मैं भी सरलता से उसका वर्णन कर सकूँगा।’’ कालिदास की यह विनयशीलता उनके लिए शोभा की वस्तु है और सम्भवतः इसी के वशीभूत होकर वे अपने सम्बन्ध में कुछ भी नहीं लिख गए। और आज उनकी रचनाओं का रसास्वादन करने वाले रसिकों को जब यह जिज्ञासा होती है कि कालिदास कौन थे और कहाँ के रहने वाले थे, तो इसका उन्हें कुछ भी सुनिश्चित उत्तर प्राप्त नहीं हो पाता। अधिक-से-अधिक कालिदास के सम्बन्ध में जो जानकारी प्राप्त की जा सकती है, वह उनकी रचनाओं में जहाँ-तहाँ बिखरे हुए विभिन्न वर्णनों से निष्कर्ष निकालकर प्राप्त की गई है। यह जानकारी अपूर्ण तो है ही, साथ ही अनिश्चित भी है। उदाहरण के लिए केवल इतना जान लेने से कि कालिदास पहली शताब्दी ईस्वी-पूर्व से लेकर ईसा के बाद चौथी शताब्दी तक की अवधि में हुए थे, और या तो वे उज्जैन के रहने वाले थे या कश्मीर के या हिमालय के किसी पार्वत्य प्रदेश के, पाठक के मन को कुछ भी संतोष नहीं हो पाता। इस प्रकार के निष्कर्ष निकालने के लिए विद्वानों ने जो प्रमाण उपस्थित किए हैं, वे बहुत जगह विश्वासोत्पादक नहीं है और कई जगह तो उपहासास्पद भी बन गए हैं। फिर भी उन विद्वानों का श्रम व्यर्थ गया नहीं समझा जा सकता, जिन्होंने इस प्रकार के प्रयत्न द्वारा कालिदास के स्थान और काल का निर्धारण करने का प्रयास किया है। अन्धेरे में टटोलने वाले और गलत दिशा में बढ़ने वाले लोग भी एक महत्वपूर्ण लक्ष्य को पूर्ण करने में सहायक होते हैं, क्योंकि वे चरम अज्ञान और निष्क्रियता की दशा से आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।

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