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मुद्राराक्षस संकलित कहानियां

मुद्राराक्षस

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :203
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7243
आईएसबीएन :978-81-237-5335

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कथाकार द्वारा चुनी गई सोलह कहानियों का संकलन...


वहां कुल अठहत्तर लाशें थीं। या छिहत्तर। दो अभी जिंदा थे। उठाए जाते वक्त भी वे इन सिपाहियों को वैसे ही अविश्वास से आंखें फाड़कर घूर रहे थे। कप्तान को लाशों और घायलों को अस्पताल पहुंचाने के बाद खून की दुर्गंध महसूस हुई। दो बड़े दारोगा वहीं छोड़कर कप्तान घर लौट आया। वह जल्दी से जल्दी नहा लेना चाहता था। जिंदगी में पहली बार वह पूरी वर्दी में नहाया। फव्वारे की बारीक तेज धारों में वर्दी के वे लाल-काले दाग देर तक कट-कटकर गिरते हुए वह देखता रहा। जिस वक्त नहाकर वह बाहर आया, उसने महसूस किया, उसे असाधारण सर्दी लग रही है।

जिंदा बच गए दोनों आदमियों के जख्म ज्यादा घातक नहीं थे। हमदम साहब की ऊपर से दूसरी पसली और कंधे के बीच गोली लगकर तिरछी निकल गई थी। दूसरी पसली बुरी तरह टूट गई थी और बगल में बांह के नीचे मांसपेशियाँ फटकर लटक गई थीं। खून जरूर ज्यादा बह गया था, पर फेफड़े सही-सलामत थे। दूसरे आदमी के कूल्हे और जाँघ में दो गोलियाँ लगी थीं। दोनों को ऑपरेशन के बाद दूसरे दिन दोपहर तक होश आ गया।

कप्तान ने खुद बयान लिया। पहले दूसरे आदमी का। तकलीफ काफी कम हो गई थी, पर बोलने में सांस थोड़ी उखड़ती थी, पर वह जोश के साथ बयान देता , रहा, “साहब, अल्लाह मालिक है, उसकी कसम खाकर कहता हूं, अगर मैंने कभी कोई असलहा जमा किया हो या-या दंगे-फसाद में हिस्सा लिया हो।"

"ठीक है, वो बाद की बात है। पहले यह बताओ, नाम क्या है और कहां के रहने वाले हो?" कप्तान ने पूछा।

“साहब, वही तो बताया। साहब, मैं तो गरीब आदमी, हमेशा अपने काम से काम रखता हूं। उन्होंने बेकुसूर हमको गोली मारी।"

"भई नाम बताओ, नाम!"

"अब्दुल रऊफ।"

"कहां रहते हो?"

"मलियाना में। सब्जी बाजार साहब! मैं वहां पंचर जोड़ता हूं।"
 
"हुआ क्या था?"

“साहब, खुदा गवाह है-"

"है यार, तुम बात तो बताओ।" कप्तान थोड़ा अधीर होने लगा, "तुम नहर तक कैसे पहुंचे? किसने गोली मारी?"

"पी. ए. सी. ने साहब! पी. ए. सी. ने गोलियां मारकर बिछा दिया।

मेरा कोई कुसूर नहीं था साहब, मगर उन लोगों ने हमको घेर लिया। सबको घेर लिया।"

"कहां घेर लिया?"

"हमारे घरों में। हजारों सिपाही थे पी. ए. सी. के। हमारा सारा सामान सड़क पर फेंक दिया। औरतों, बच्चों को बंदूक के कुंदों से मारने लगे, तब हम बक्सों के ढेर के पीछे से निकल आए। सब लोगों को बाहर इकट्ठा कर लिया। सारे मुहल्ले के जितने मर्द थे, बूढ़े, जवान, किसी को नहीं छोड़ा। सबको लेके शहर से बाहर आ गए। तब उनका अफसर बोला, यहां नहीं, गाजियाबाद ले चलो। बस साहब, नहर तक आए, फिर सबको लाइन से खड़ा कर दिया और तड़ातड़ गोलियां चलाने लगे। साहब, एक-एक को भून दिया, एक-एक को। एक-एक को मार दिया साहब!" वह आदमी रोने लगा।

कप्तान ने धीरे से उसका हाथ दबाया।

पूरा वाकया खौफनाक भी था और उलझन में डालने वाला भी। सरेशाम लोगों को मलियाना में घरों से निकाला गया और गाजियाबाद की सीमा में लाकर पी. ए. सी. ने उन्हें गोलियों से उड़ा दिया। अब्दुल रऊफ तादाद तीन-चार सौ बताता है, पर अगर लाशें नहर में बही नहीं थीं तो दो घायलों सहित उनकी तादाद अठहत्तर थी।

दूसरा बयान हमदम साहब का था, पर देर तक वे कुछ नहीं बोले। कई बार पूछने पर अपना नाम और पता बता दिया और फिर चुप हो गए।

"क्या बहुत तकलीफ है?" हारकर कप्तान ने पूछा।

"नहीं हुजूर! अब तो काफी ठीक हूं। बहुत बेहतर हूं।" कहकर वे फिर चुप हो गए। अब वे कप्तान को नहीं, छत को घूर रहे थे। शायद जब उनकी आंखें थक गईं तो उन्होंने पलकें मूंद लीं और बहुत धीरे से एक शे'र पढ़ा।

"दुनिया में ऐ जबां, रविशे सुलहे कुल न छेड़,
जिससे किसी को रंज हो ऐसा बयां न छेड़।"

यह शे'र पढ़ने के बाद वे फिर खामोश हो गए। बहत-बहुत कोशिश करने के बाद भी वे नहीं बोले तो कप्तान निराश होकर उठ पड़ा। जब वह बाहर जाने लगा तो हमदम साहब ने दायां हाथ थोड़ा-सा उठाया और धीरे से आवाज दी, "सुनिए!"

कप्तान फौरन वापस आया, “कहिए!"

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