Adhure Sapne - Hindi book by - Ashapurna Devi - अधूरे सपने - आशापूर्णा देवी
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अधूरे सपने

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : गंगा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :88
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7535
आईएसबीएन :81-903874-2-1

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इस मिट्टी की गुड़िया से मेरा मन ऊब गया था, मेरा वुभुक्ष मन जो एक सम्पूर्ण मर्द की तरह ऐसी रमणी की तलाश करता जो उसके शरीर के दाह को मिटा सके...


पतोहबहू को और भी अधिक शर्म का दिखावा कर वहां रहना पड़ता, क्योंकि यह तो उसके लिए लज्जा का विषय था (पति के पास जाना) फिर पुनः-पुन: अनुरोध के पश्चात् ही कमरे से बाहर पैर निकालती।
मेरी पहली वही थी-जिसका नाम निर्मला था। जो दादी के बड़प्पन पर निहाल थी। कहती-जो भी हो दादी के मन में प्यार और दया है।
 


मेरी हालत उस वक्त बन्द शेर की जैसी होती। तभी तो दांत पीसकर कहता।
दयामाया। मेरी तो उस बूढ़ी को फांसी देने की इच्छा होती है। निर्मला शिहरत होती। भगवान का नाम लेती, दुर्गा, देवी। मेरा मुंह दबाकर कहती छि:-छि: तुम्हारी जबान पर लगाम नहीं है। किसको क्या कह रहे हो?

मैं और भी चिढ़ जाता। और उसकी स्थिरता, धैर्य पर और मुझे खीज होती। 'षोड़शी' के बारे में कितना काव्य रचा गया है, गाना, संगीत, सभी बेकार है। यह जो मेरे सामने हाड़-मांस की षोड़शी है बिल्कुल हाथ की मुट्ठी में है। कहना चाहिए, कहां इसमें तो षोड़शी का आवेग, उन्मादना, वासना, आकुलता कुछ भी नहीं दिखाई नहीं पड़ता।

मेरी इच्छा होती उसे पटक कर पूछूं, ''इतना धैर्य तुम कहां से लाती हो? तुम्हारे अन्दर क्या रक्त, मांस कुछ भी नहीं है, सिर्फ भूसा, मिट्टी है। वह भी गंगा के किनारे वाली मिट्टी।

संयुक्त परिवार के लड़के को काफी झमेलों से पार होना पड़ता है। अपनी उत्तेजना पर पानी फेरना पड़ता है। अगर ऐसा ना करे तो घर में समालोचना का तूफान बहने लगे।

निर्मला कहती-तब मुझे क्यों कहते हो। तुम तो घर के बेटे हो जब तुम्हीं-कहती थी क्योंकि मैं उसे धिक्कारता, लांछित करता। कुछ वाक्यों से विद्ध करता। सोचता था अगर वह तंग आकर कोई अन्यथा बन्दोवस्त करे। कुछ भी ना। नियमपूर्वक वह भोरे में अंधेरा रहते ही उठ जाती, और मध्य रात्रि में चोरों की तरह आती।

इधर मैं अपने ताया जी के लड़के को भी देखता जिसकी शादी मेरे बाद हुई थी। पर काफी चालाक चतुर बन बैठा था। अक्सर ही देखता उसके कमरे का दरवाजा पहले बन्द हो जाता और सुबह धूप निकलने के बाद ही वह दरवाजा खुलता।

मैं भी क्रोधित होकर कहता, ''देख रही हो।'' निर्मला कहती, ''क्यों नहीं।''
कहना-देखकर सीखती क्यों नहीं।
उसका जबाव होता-हाय! मैं तो मर ही जाऊं।

निर्मला की बात करने का लहजा ही ऐसा था। शायद सर्वगुणसम्पन्न बहू का खिताब लेने के लिए उसने अपने वाक्यों को भी सयंमित कर डाला था।
परन्तु उस खिताब के प्रति मैं काफी नाराज था। उस नाम का मेरे पास कुछ भी मूल्य ना था। मुझे लगता एक दिन चिल्ला-चिल्ला कर सारी लज्जा त्याग कर कहूं घर के अभिभावकों को, अगर नवयुवती को सेवा पाने का इतना ही लोभ था तो वे स्वयं ही एक और शादी कर सकते थे।

लगता था, इच्छा होती थी घर में चिल्लाने की पर हिम्मत ना होती।
अगर विद्रोह करने की हिम्मत जुटा कर कमरे से बाहर निकलता तो ताया जी को देख कर जो खड़ाऊं की खट-खट की आवाज से अन्दर से बाहर या बाहर से अन्दर आ जा रहे हैं, और पिताजी और चाचा ही दालान की चौकी पर बैठे शतरंज की बाजी चल रहे हैं, मेरी हिम्मत जबाव दे जाती।

मेरे पिता, ताया, चाचा जमींदार नहीं थे। वे व्यवसायी, कारोबारी थे, जो धान, चावल का कारोबार करते थे। उनका मिजाज था जमींदारों की तरह। ग्राम के सब उनका सम्मान करते, डरते भी थे, क्योंकि उनका दबदबा था। इस घर में जब पूजा, पार्बन होता तो प्रजा गुलामों की तरह सलाम करने आ जाती। इस दीनता की वजह एक और थी-यह सब परोपकारी थे। प्रचुर पैसा था पर अहंकार या अमीरों जैसी शान-शौकत नहीं थी। सबसे ऊपर भाइयों के बीच एकता भी थी-जो गांव के लिए आदर्शवादिता का नमूना था।

पता नहीं भाइयों में एकता होने से लोग उसे क्यों इतना महत्व देते हैं, उसे सराहते हैं। मुझे तो इस एकता में व्यक्तित्वहीन अपरिणति की छाप दृष्टिगोचर होती है। एक व्यक्तित्व सम्पन्न पुरुष शिशु या बालक की भूमिका ग्रहण करे तो इससे हास्यकर क्या हो सकता है?

हां, ऐसा ही तो होता था।
छोटे भाई की पत्नी या बच्चे की बीमारी की खबर पहले लड़के के ताया जी के पास पहुंचेगी, वे डॉक्टर या वैद्य का बन्दोबस्त करेंगे-यही था परिवार का आईना, कानून, विधि।

बीवियों को अगर मायके जाना है तो पतियों की इसमें कोई भूमिका नहीं थी, वह तो गृहकर्ता का दायित्व था। सर्वविधि प्रयोजन के अवसर पर हमें तायाजी या दादा जी के पास शरणागत होना पड़ता था।
यह सब मुझे अत्यन्त, बचपना लगा करता। हमारे उस परिवार में 'कर्ता भजन' नामक वस्तु ही पवित्र पुण्यकर्म हुआ करता। इसके अतिरिक्त कुछ और भी अन्यथा हो सकती है यह कल्पनातीत था।
मैं सिर्फ अजीबोगरीब कल्पना करता था।

मुझे यह लगता ताया जी निर्लज्ज स्वार्थी की तरह परिवार के नैवेद्य का हरण कर रहे हैं और उनके इस 'आदर्श' परिवार रूपी बेदी पर सबकी बली चढ़ रही है, सब अपने आनन्द, इच्छाओं की बलि देकर आदर्श की शबाशी उन्हें मिल रही है। वे उनके नाबालिग भाई। उनको सम्मानबोध भी अनूठा था।
मैं अगर अपनी पत्नी से असमय, थोड़ा प्रेमालाप करने की इच्छा जाहिर करूं तो वह उनका असम्मान होगा।

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