सितारों का जगमग संसार - हरीश यादव Sitaron Ka Jagmag Sansar - Hindi book by - Harish Yadav
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सितारों का जगमग संसार

हरीश यादव

प्रकाशक : सुयोग्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :43
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7862
आईएसबीएन :81-7901-062-7

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क्या आपने कभी सितारों की नदी देखी है ? नहीं। रात्रि को आकाश की तरफ देखिए...

Sitaron Ka Jagmag Sansar - A Hindi Book - by Harish Yadav

आकाश को रात्रि में देखें

हजारों सितारे जगमग करते दिखाई देते हैं। मनुष्य सदियों से इन टिमटिमाते तारों को देखता आया है। रात्रि के आकाश में झिलमिल प्रकाश फैलाते इन तारों की दुनिया बहुत ही निराली, रोमांचक और रहस्यमय है। मनुष्य ने तारों की इस दुनिया में झाँकने की कोशिश की है और बहुत-सी जानकारी प्राप्त की है। हमारा ब्रह्माण्ड अत्यन्त विशाल है। लाखों ग्रहों व सितारों के बारे में जानने के लिए बहुत कुछ है, किन्तु संक्षेप में कुछ भूलभूत बातों की जानकारी देने का प्रयास अवश्य किया जा सकता है।

सितारों का जन्म


ब्रह्माण्ड में अनुमानतः 10 की घात 81 (एक के आगे 81 शून्य) तारे हैं। हमारी आकाशगंगा में ही लगभग एक खरब तारे हैं। इतने सब सितारे आए कहाँ से ? हम जानते हैं कि आकाशगंगा में सितारों के बीच का खाली स्थान पूर्णतः खाली नहीं होता। इसमें अन्तर-तारकीय सूक्ष्म धूल भरी होती है। इसी धूल के बादल और गैसीय बादल से तारे का जीवन प्रारम्भ होता है। इस समय इसे निहारिका कहा जाता है। यह मुख्यतः हाइड्रोजन गैस से बनी होती है। इस बात को इस तरह भी कह सकते हैं कि तारे मुख्य रूप से हाइड्रोजन व हीलियम के गोले हैं जो आपस में गुरुत्वाकर्षण से जुड़े हैं।

तारों की संख्या लाखों में होने के बालजूद आज तक किसी ने तारों का जन्म होते नहीं देखा। यह एक ऐसी क्रिया है जो लाखों वर्षों में पूरी होती है। अज्ञात कारणों से गैसीय बादल में गैस व धूल के कण एक स्थान पर एकत्रित होने लगते हैं, वहा घनत्व बढ़ने लगता है तथा ताप में लगातार वृद्धि होती जाती है। हजारों वर्षों में शनैःशनैः बढ़ता यह ताप कई हजार डिग्री तक पहुँच जाता है। इस समय बढ़ता दाब इतना अधिक हो जाता है कि गुरुत्वाकर्षण के खिंचाव को सन्तुलित करके सारे पदार्थ को गिरने से रोक सके। इस स्थिति में यह एक पूर्व सितारा (प्रोटोस्टार) बन जाता है।

कोई पूर्ण सितारा पूर्णतः सितारा नहीं होता। उस समय इससे प्रकाश भी नहीं निकलता। पूर्ण सितारे में धीरे-धीरे क्रियाएँ होती रहती हैं। ताप करोड़ों डिग्री बढ़ जाता है तथा अन्त में नाभिकीय क्रियाएँ प्रारम्भ होने के फलस्वरूप हाइड्रोजन गैस हीलियम में परिवर्तित होने लगती हैं। इस समय एक पूर्व सितारा एक पूर्ण सितारे के रूप में परिवर्तित होकर प्रकाश देने लगता है।

साधारणतः सितारे समूह में जन्म लेते हैं। आकाशगंगा में लगातार सितारों की जन्म प्रक्रिया चलती रहती है किन्तु हम उसे देख नहीं पाते। अगर हम नवीन उत्पन्न सितारों को देखना चाहें तो हमें ओरायन नेबुला (नीहारिका) को देखना होगा।

सितारों की दूरियाँ


हम जानते हैं कि सूर्य एक तारा है। यह एक मध्यम श्रेणी का सितारा है। इसका व्यास 1,392,000 कि. मी. है। इतना विशाल होने के बावजूद यह हमें हमारे चन्द्रमा के बराबर ही प्रतीत होता है, क्यों ? कारण कि यह हमसे बहुत दूर है। यह पृथ्वी से लगभग 150 मिलियन कि. मी. दूर है। यहाँ से प्रकाश को पृथ्वी तक आने में लगभग आठ मिनट लगते हैं किन्तु सूर्य के अलावा पृथ्वी के निकट का जो सबसे नजदीकी सितारा है, वहाँ से प्रकाश को आने में चार वर्ष का समय लगता है। बाकी सब सितारे इससे भी दूर हैं। ब्रह्माण्ड के अनन्त विस्तार को नापने के लिए मनुष्य ने कुछ इकाइयाँ निर्धारित की हैं।

सूर्य व पृथ्वी की दूरी कि. मी. में नापी जा सकती है, किन्तु दूसरे सितारों की दूरी नापने के लिए कि. मी. बहुत सूक्ष्म इकाई है। हम जानते हैं कि प्रकाश एक सेकेण्ड में लगभग तीन लाख कि. मी. दूरी तय कर लेता है। इस प्रकार यह एक वर्ष में लगभग 9,467 अरब कि. मी. दूरी तय कर लेगा। इस प्रकार प्रकाश एक वर्ष में जो दूरी तय करता है, उसे एक प्रकाश-वर्ष कहते हैं। सितारों की दूरी नापने के लिए प्रकाश वर्ष एक प्रारम्भिक इकाई है। इसके आधार पर कहा जा सकता है कि धरती के नजदीक दूसरे सितारे जिसका नाम प्रोक्सिमा सेण्टुरी है, उसकी पृथ्वी से दूरी चार प्रकाशवर्ष है।

प्रकाशवर्ष की दूरी भी सितारों की दुनिया में बहुत छोटी है। इसका उपयोग सौरमण्डल और आकाशगंगाओं के प्रारम्भक माप तक किया जा सकता है। प्रकाशवर्ष से अधिक बड़ी इकाई ‘किलोपारसेक’ है। एक किलोपारसेक लगभग तीन हजार प्रकाशवर्ष दूरी के बराबर होती है। एक साधारण आकाशगंगा के केन्द्र से उसके किनारे की दूरी औसतन 15 किलोपारसेक होती है। हमारी आकाशगंगा का नाम मंदाकिनी है तथा इसके समीप वाली आकाशगंगा का नाम एण्ड्रोमिडा है। वह हमसे 600 किलोपारसेक दूर स्थित है।

आकाशगंगाएँ आपस में मिलकर आकाशगंगा गुच्छों (ग्रुप या क्लस्टर ऑफ गैलेक्सी) का निर्माण करती हैं। एक आकाशगंगा गुच्छे की औसत चौड़ाई 1,000 किलोपारसेक होती है। ये गुच्छे मिलकर महागुच्छों का निर्माण करते हैं जिन्हें सुपर क्लस्टर कहा जाता है। इनकी विशाल दूरी को नापने के लिए ‘मेगापारसेक’ इकाई प्रयोग में लाते हैं। एक ‘मेगापारसेक’ का मान 1,000 किलोपारसेक के बराबर होता है। अन्तरिक्ष की वह गूरी जिसके बारे में आज तक वैज्ञानिकों को पता लग सका है, वह लगभग 3,000 मेगापारसेक है।

अब तो आप जान ही गए होंगे कि सितारों की दुनिया कितनी विशाल है। हमारी पृथ्वी तो क्या, हमारा सूर्य भी उसमें एक अति सूक्ष्म बूँद के समान है।

सितारों की नदी-आकाशगंगा


क्या आपने कभी सितारों की नदी देखी है ? नहीं। रात्रि को आकाश की तरफ देखिए। उत्तर को दक्षिण-पश्चिम क्षितिज से मिलाने वाली एक धुँधली, चौड़ी व सफेद तारों से भरी एक नदी दिखाई देगी। तारों की यह विशाल नदी ही आकाशगंगा है। इसका नाम मंदाकिनी या मिल्की-वे है।

ब्रह्माण्ड में लाखों आकाशगंगाएँ हैं। एक आकाशगंगा में लगभग दस हजार करोड़ तारे होते हैं जो मिले-जुले दिखाई देते हैं। आकाशगंगा के इस दुधिया कुहासे का व्यास लगभग एक लाख प्रकाश-वर्ष होता है। आकाशगंगा में उसके केन्द्र के चारों तरफ तारे घूमते रहते हैं। आकाशगंगा का अधिकतम द्रव्यमान केन्द्रीय उभार में रहता है। अतः तारे इस केन्द्रीय उभार के चारों तरफ उसी प्रकार घूमते हैं जिस प्रकार सूर्य के चारों तरफ ग्रह। अतः जो तारे केन्द्र से बहुत दूर हैं वे धीमी गति से घूमते हैं और जो केन्द्र के निकट हैं, वे तेजी से घूमते हैं।

आकाशगंगाएँ तीन प्रकार की होती हैं–इलिप्टिकल, सर्पिल एवं स्तम्भ सर्पिल। इलिप्टिकल आकाशगंगा में केन्द्र से बाहर की तरफ जाने पर तारों का घनत्व कम हो जाता है। सर्पिल आकाशंगागा अंग्रेजी के एस(s) अक्षर की तरह होती है। इनका केन्द्रीय क्षेत्र उठा होता है तथा दो सर्पिल हाथ निकले होते हैं। स्तम्भ सर्पिल आकाशगंगा में दोनों सर्पिल हाथ एक सीधे स्तम्भ के दोनों छोर से निकले प्रतीत होते हैं। यह सीधा स्तम्भ आकाशगंगा के बीच में से गुजरता है।

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