कालातीत - मुद्राराक्षस Kalatit - Hindi book by - Mudrarakshas
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कालातीत

मुद्राराक्षस

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :128
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7890
आईएसबीएन :978-81-907221-6

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ये संस्मरण युग की आलोचनात्मक संस्कृति के अद्वितीय दस्तावेज़ हैं।

Kalatit - A Hindi Book - by Mudrarakshas

मुद्राराक्षस के ये संस्मरण कई अर्थों में असाधारण और सबसे अलग हैं। जिन व्यक्तियों के संपर्क में वे आए उनके आसपास की दुनिया की विवेचना को वे अपने संस्मरणों के ज़रूरी खाके के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। जिस किसी पर भी उन्होंने लिखा है उसने अपने समय से कितनी मुठभेड़ की और इतिहास में हस्तक्षेप की उसकी कोशिशें कितनी कारगर या कितनी असफल रहीं, इसकी पड़ताल इन संस्मरणों में अत्यंत तटस्थता और तार्किकता से की गई है। उनके लेखन में भावुकता की कोई जगह नहीं है। संस्मृत व्यक्तियों के अवदान का मूल्यांकन मुद्रा निर्ममता से करते हैं। कोई व्यक्ति किन कारकों के चलते महत्त्वपूर्ण हुआ या क्यों संभावनाओं के बावजूद उसका काम अधूरा रह गया, इसकी विवेचना में वे संकोच नहीं करते। आधी सदी से ज्यादा, लगभग छह दशकों के अपने अत्यंत प्रभावी लेखक काल और सीधी सामाजिक सक्रियता के असाधारण दौर में जिस तरह उन्होंने समय, समाज और इतिहास को प्रभावित करने की हलफ़ उठाई उसकी कुछ तस्वीरें इन संस्मरणों में दिखाई देंगी। संस्मृत व्यक्तित्वों को लेकर उनकी आलोचनात्मक टिप्पणियों के पीछे मुद्रा का यह आग्रह मौजूद मिलेगा। इन संस्मरणों का सबसे बड़ा महत्त्व इनके माध्यम से रेखांकित वे सरोकार हैं जो किसी व्यक्ति को इतिहास में दाखिल कराते हैं या फिर दाखिल होने से रोकते हैं। ये संस्मरण युग की आलोचनात्मक संस्कृति के अद्वितीय दस्तावेज़ हैं।

निराला : उपेक्षित वसंत की विरासत


निराला जी के देहांत की खबर लखनऊ के कॉफी हाउस में मिली। उन दिनों का यह कॉफी हाउस आज जैसा व्यक्तित्व-दरिद्र नहीं था। तब खासी चहल-पहल होती थी। मैं कुछ दिनों के लिए दिल्ली से लखनऊ आया हुआ था। मुझे याद नहीं कि इस मौके पर लखनऊ में कोई सही किस्म की शोकसभा हुई हो। दिल्ली में भी उल्लेखनीय शोक सभा नहीं हुई थी। उन दिनों बहुत-सी साहित्यिक पत्रिकाएँ निकल रही थीं। उनमें से किसी ने कोई विशेषांक नहीं निकाला था। निराला की मृत्यु की घटना पर बांके बिहारी भटनागर जैसे मित बुद्धिजीवियों ने जरूर, उन दिनों के साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसे पत्रों में संस्मरणात्मक लेख छापे थे, जिनमें निराला के साहित्य से ज्यादा उनके साहित्येतर चरित्र पर बातें की गई थीं।

यह उन निराला जी के देहांत के समय की बात है, जो आज हिंदी साहित्य के एक अनिवार्य मानक और संभवतः तीर्थ हैं। आज का कोई भी छोटा-बड़ा प्रासंगिक कवि-लेखक निराला की छाया में होना आत्मसम्मान की बात समझता है। इस बात का कभी विशेष रूप से अध्ययन होना चाहिए कि सन् 1950 से लेकर 1961 में अपनी मृत्यु के भी लगभग पाँच-सात बरस बाद तक निराला साहित्य की मुख्य धारा की चर्चा में नहीं आते। अगर उनका जिक्र होता भी था, तो या तो कवि-सम्मेलनों से जुड़ें कवियों में या लगभग गैर-साहित्यिक भक्तों के बीच।

उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग द्वारा उन दिनों ‘त्रिपथगा’ नाम से एक पत्रिका छपती थी, जिसकी साहित्यिक प्रतिष्ठा लगभग नगण्य थी। इस पत्रिका ने निराला जी की मृत्यु के बाद दो अंक श्रद्धांजलि विशेषांक के रूप में छापे थे। इसमें प्रकाशित लेखकों की सूची देखने के काबिल है। कुल उनहत्तर लेखकों में से सिर्फ दो ऐसे हैं जिन्हें साहित्य जानता है–माखनलाल चतुर्वेदी और हजारी प्रसाद द्विवेदी। माखनलाल जी ने तो एक कविता छपाई थी और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने मात्र साढ़े तीन सौ शब्दों की एक बहुत छोटी और ठंडी-सी टिप्पणी लिखी थी। निराला जी पर लिखने वाले बाकी सरसठ लेखकों ने निराला जी के रजाईदान या इक्के वाले को दो आने के बजाय पाँच रुपए देने जैसे प्रसंग ही याद किए। उनके लेखन की पड़ताल या उसकी ऐतिहासिक संभावनाओं पर कहीं कुछ नहीं लिखा।

पचास के दशक के मध्य में निराला जीवित थे, पर जब धर्मवीर भारती ने ‘निकष’ निकाला तो उसमें निराला कहीं नहीं थे जबकि वे तमाम लोग थे, जिन्होंने बाद में निराला की रचनात्मक विरासत को गर्व के साथ स्वीकार किया। तार-सप्तक के प्रयोगधर्मी काम की भी निराला से दूरी बनी रही जबकि उसके उल्लेखनीय हस्ताक्षर साठ के दशक के उत्तरार्ध से सिर्फ निराला से ही अपने को जोड़ते थे। आखिर क्या वजह है कि प्रयोगवाद नई कविता-अकविता, श्मशानी पीढ़ी आदि के खासे उथल-पुथल वाले और रचनात्मक दृष्टि से ऐतिहासिक दौर में निराला का नाम लुप्त और छुद्र साहित्यजीवियों के बीच ही थोड़ा-बहुत याद किया जाता है, लेकिन एक दौर वह आता है। जब साहित्य की समसामयिकता की बड़ी पहचान निराला बन जाते हैं। यह उससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक है कि मैथिलीशरण गुप्त और सुमित्रानंदन पंत बहुत बाद तक साहित्य में उपस्थित रहते हैं, पर उनसे अगली पीढ़ी का रचनाकार अपने को उनसे कभी नहीं जोड़ता। मेरा खयाल है कि वर्तमान महत्त्वपूर्ण रचनाकारों में से अगर किसी को थोड़ा-सा भी मैथिलीशरण गुप्त या सुमित्रानंदन पंत से जोड़ा जाय, तो उसे अप्रसन्नता ही होगी। कुँवर, रघुवीर, सर्वेश्वर और नागार्जुन के बारे में मेरे निजी अनुभव हैं कि जब कभी मैंने उनमें से किसी की रचना का कोई रिश्ता निराला से जोड़ा तो उन्हें सुखद विस्मय हुआ।

इस स्थिति को नजर में रखते हुए 1950 से अब तक साहित्य में निराला की उपस्थिति की पड़ताल हमें कुछ यादगार अनुभव दे सकती है। शायद बहुतों के साथ हुआ होगा, मुझमें निराला के प्रति एक तरह का भक्तिभाव पैदा हुआ था। दसवाँ पास करने के बाद लखनऊ के एक कॉलेज में ग्यारहवें दर्जे में आया, तो मुझे एक विचित्र दोस्त-दुश्मन मिला। मेरे एक सहपाठी थे सत्यव्रत सिंह। छोटे कद के, बहुत गोरे, ठीक निराला जैसा नाक-नक्श। वैसी ही दाढ़ी रखते थे। वे कविताएँ लिखते थे। उनका हस्तलेख निराला जैसा ही आलंकारिक और सुंदर था। उनकी कविताओं का मुहावरा भी निराला जैसा ही था। तब मैं प्रसाद, पंत और महादेवी की कविताओं से प्रभावित था। सत्यव्रत खासी मादरजात गालियाँ बकते थे और इसी को लेकर मुझसे झगड़ा भी होता था। निराला के प्रति मेरे मन में आदर उन्हीं की देन था। निराला इतने अच्छे लगे कि उनकी कविताओं की नकल पर मैंने बहुत-सी कविताएँ लिखीं।

उन्हीं दिनों हम दो-तीन छात्रों ने महादेवी वर्मा की साहित्यकार संसद की तर्ज पर बाल साहित्यकार संसद बनाई। इसके बारे में सिर्फ हम तीन-चार ही जानते थे। इस संसद की ओर से हाथ से लिखा करीब चार सौ पृष्ठ का एक महादेवी अभिनंदन ग्रंथ तैयार हुआ। यह ग्रंथ महादेवी वर्मा को खुद देने के लिए मैं अपने एक व्यवसायी-पुत्र मित्र के साथ इलाहाबाद पहुँचा। रात-भर की यात्रा के बाद रिक्शे से हम सीधे महादेवी वर्मा के घर जा पहुँचे। वे महिला विद्यापीठ में रहती थीं। उन्हें उस अभिनंदन ग्रंथ पर बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने ही कहा कि आज वसंत पंचमी है और निराला जी की जन्मतिथि। तुम लोग उनसे मिलो।

उन्होंने कुछ फोन किए। गंगा प्रसाद पांडेय कहीं बाहर गए हुए थे। निराला जी के वे काफी विश्वस्त थे। अंततः स्वर्गीय आत्माराम मिले। वे डॉ० रघुवंश के छोटे भाई थे। वे एक छोटी, काले रंग की मोटर लेकर आए। मुझे, मेरे सहपाठी श्यामनारायण मेहरोत्रा और महादेवी वर्मा को लेकर आत्माराम साहित्यकार संसद आए। महादेवी वर्मा ने वह अभिनंदन ग्रंथ किसी को सौंपा और इसके बाद वहाँ से उन लोगों ने हमें दारागंज छोड़ दिया। निराला जी के पास न तो महादेवी गईं, न आत्माराम।

दारागंज के थोड़े तंग और दोनों ओर छोटी और बेशऊर दुकानों वाले रास्ते पर जिधर हमें छोड़ा गया, वहाँ दाहिनी ओर थोड़ी खुली जमीन थी और उसके बाद वह घर जिसके सामने के दरवाजे भी खासे मैले और पुराने ढंग के थे। उस वक्त निराला जी सो रहे थे। अब याद नहीं कि वो तख्त था या पलंग, पर उस पर बहुत मैला गद्दा और उससे भी मैली चादर थी। जो रजाई आधे बदन तक वे ओढ़े थे, वह भी बेतरह मैली थी।

हम दोनों नीचे फर्श पर बैठ गए। जरूर उन्हें कुछ आहट मिली होगी। थोड़ी देर बाद वे उठकर बैठ गए। उनके प्रति श्रद्धा से ज्यादा हमें उनके डर लग रहा था। वे मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं, यह 19.51 के उस वसंत तक हमें बहुत तरह से पता लग चुका था। यह बात हमारे अध्यापकों ने तो बताई ही थी और उनके विशाल शरीर, पंद्रह-बीस दिन के बढ़े हुए अधपके बाल और अप्रत्याशित व्यवहार की आशंका से मैं खासा ही सहमा हुआ था।

कुछ क्षणों बाद निराला जी ही बोले। बहुत सधे हुए उच्चारण वाली अंग्रेजी में उन्होंने हमारा नाम पूछा, फिर यह पूछा कि कहाँ से आए हो। मेरे लखनऊ बताने पर उन्होंने मुहल्ला पूछा। मैंने बता दिया। यह इत्तफाक है कि मेरे मुहल्ले के पास ही वह भूसा मंडी थी। जहाँ निराला कुछ दिन रहे थे। उसी तरह बहुत प्रभावशाली उच्चारण वाली अंग्रेजी में उन्होंने कहा–मैंने तुम लोगों को देखा था। मैं भूसा मंडी में रहता था।

आतंकित हम पहले ही थे। ऐसे उच्चारण वाली उस अंग्रेजी भाषा से हम बुरी तरह डर गए। सोहन लाल मुराई पाठशाला से हाईस्कूल करके अंग्रेजी भाषा के अक्षरों से भी हमें घबराहट होती थी। अंग्रेजी में संवाद हमारे लिए अविश्वसनीय सपना ही था। निराला जी ने ही पूछा–कुछ लिखते हो ? यह सवाल भी अंग्रेजी में ही था। हमने हाथ से खुशखत लिखी अपनी कविताओं की कॉपी का एक पन्ना खोलकर उनकी ओर बढ़ा दिया। वह उन्हीं पर लिखी एक कविता थी। छंद, शिल्प और भाषा हूबहू उनकी रचना तुलसीदास की थी। उसे उन्होंने देर तक पढ़ा, फिर वैसी ही दबीज अंग्रेजी में बोले–ऐसी जटिल भाषा मत लिखा करो। भाषा आसान लिखो।

इसके बाद काफी जल्दी ही हम लोग उठे, जैसे भाग पड़ना चाहते हों। ठीक उसी वक्त उन्होंने पूछा–यहाँ कैसे आए ? हमने बता दिया कि महादेवी जी ने वसंत पंचमी के अवसर पर जन्मतिथि की बधाई देने को कहा था। वही छोड़ गई थीं। निराला गंभीर हो गए। एक क्षण चुप रहे, फिर अंग्रेजी में ही पूछा–महादेवी जी के पति का क्या हाल है ?

यह सवाल मेरे ऊपर एक बम की तरह गिरा। मैं बुरी तरह सकपका गया। उन दिनों निराला मेरे लिए ऋषि थे और महादेवी विवाहिता भी हो सकती हैं, यह कल्पनातीत था। कुछ अस्पष्ट बोलकर मैं अपने साथी के साथ वहाँ से भाग खड़ा हुआ। यहाँ एक बात ध्यान देने लायक है। उस पुराने से धुआँ खाए नीम अँधेरे कमरे में हम दोनों दोपहर को पहुँचे थे। मुझे दो महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों ने निराला जी के घर के पास तक पहुँचाया था। उस कांतिहीन, बेहद निर्जीव कमरे में निराला के सिरहाने दीवार में बिना पल्लों की तीन खाने की अलमारी। अलमारी के निचले खाने में कुछ मैली-सी चार-छह अधगिरी किताबें और मरोड़कर रखे गए चीकड़ कपड़े थे। छत पर पंखा नहीं था। बिजली का बल्ब था, पर बुझा हुआ।

उस कमरे में निराला थे और उनके व्यक्तित्व से आतंकित हम दो ग्यारहवें दर्जे के बेशऊर छात्र और वसंत पंचमी के अवसर पर उनका वह जन्मदिन जो दीवारों पर मैल की तरह चिपका था। उस कमरे में वसंत पंचमी के उस जन्मदिन पर कहीं कोई फूल नहीं था, कोई हार नहीं। कोई भेंट भी नहीं। इलाहाबाद के उस शहर में जहाँ महादेवी, पंत, धीरेंद्र वर्मा, फिराक, अश्क, भैरवप्रसाद गुप्त, श्रीपतराय, अमृतराय, नए लेखक भारती, जगदीश गुप्त, लक्ष्मीकांत वर्मा, विपिन कुमार अग्रवाल और जाने कितने रचनाकार थे–निराला का जन्मदिन घोर अकेला अँधेरा और एकांत था। लेखकों की बाकी दुनिया के लिए वसंत पंचमी के अवसर पर निराला का जन्मदिन कोई घटना नहीं था और इनमें से अधिकांश वे लोग थे जिन्होंने निराला की मृत्यु के बाद जब अपना रचना-संसार देखा, तो उसका अधिकांश निराला के कंधो पर था, यह उन्होंने खुद महसूस किया। खुद महादेवी और आत्माराम भी उस गली के बाहर से ही लौट गए थे।

यह एक और सुबूत था कि जिस निराला का अभिनंदन ग्रंथ कलकत्ते के साहित्यिक व्यवसायी ऋषि जैमिनी कौशिक बरुआ संपादित कर रहे थे और जिनमें सबसे आत्मीय शुद्ध अलेखक गंगाप्रसाद पांडेय थे, उस निराला के जीवनकाल और मृत्यु के भी कुछ बरस बाद तक उन रचनाकारों का कोई सरोकार नहीं था, जिन्होंने बाद में निराला को रचनात्मक धरातल पर जीवित किया।

इस घटना के कोई चार बरस बाद जब मैं कलकत्ते की पत्रिका ‘ज्ञानोदय’ का सहायक संपादक हुआ, मुझे याद नहीं कि उसमें निराला छपे हों। ‘युगचेतना’ हो या ‘ज्ञानोदय’, ‘कहानी’ हो या ‘अणिमा’, ‘अपरंपरा’ हो या उस समय की कोई दूसरी साहित्य संबंधी पत्रिका, निराला उनमें उपस्थित नहीं थे। निराला जी की एक प्रसिद्ध कविता है–

मैं अकेला
देखता हूँ आ रही
मेरे दिवस की सांध्य वेला।

पर इस कविता से ज्यादा दर्दनाक उनकी कविता वसंत पर है, उस वसंत पर जिसकी पंचमी उनकी जन्मतिथि थी और जिस वसंत पर कवि-सुलभ भावुकतावश उन्होंने कई बेहतरीन कविताएँ लिखी थीं। उनकी वह खिन्न मनःस्थिति की कविता है–

ठूँठ यह है आज
गई इसकी कला
गया है सकल काज।
अब यह वसंत से होता नहीं अधीर–

यह कविता उन्होंने 1937 में लिखी थी, पर 1951 में भी उनके कमरे में ऊपर से नीचे तक चिपकी हुई थी। निराला की मृत्यु के बाद जिस तरह की छुद्र साहित्यक शोकसभाएँ हुई थीं, उन पर परसाई ने एक बहुत तीखा व्यंग्य लिखा था। मुझे जो अध्यापक पढ़ाते थे, उनमें कुछ कवि भी थे, जो खड़ी बोली में खासे आकर्षक आकर्षक सवैया, घनाक्षरी, कवित्त आदि लिखते थे।

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