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उपन्यास >> पापा मुस्कराइए ना

पापा मुस्कराइए ना

प्रहलाद श्रीमाली

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7918
आईएसबीएन :9788190820431

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एक किशोरोपयोगी उपन्यास...

Papa Muskariye Na - A Hindi Book - by Prahlad Srimali

मुस्कुराते हुए पापा कितने हैंडसम लगते हैं। क्या पापा को यह जानकारी है। कभी तो मम्मी ने उन्हें बताया होगा। कौन जाने मम्मी ने उन्हे मुस्कुराते हुए देखा भी है या नहीं। मम्मी से पूछूं और वे उदास होकर टेंशन में आ गईं तो। तो मम्मी की शुगर बढ़ जाएगी। वह गंभीर हो जाता है। अपनी मम्मी से बहुत प्यार है उसे। जितना प्यार करता है, उससे ज्यादा श्रद्धा है मम्मी के प्रति। यूं तो हर कोई अपनी मम्मी को चाहता है। महान् मानता है। लेकिन मेरी मम्मी वाकई ग्रेट हैं। इस विश्वास का ठोस आधार है अनंत के पास।

मम्मी बड़ी संवेदनशील हैं। उसकी भावनाओं का ध्यान रखती हैं। कहीं वह कमजोर पड़कर भटक न जाए। अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं मम्मी। तभी तो उस दिन पापा का पक्ष लेते हुए विस्तार से बताया था, उनके ऐसे स्वभाव के बारे में। जिस दिन पापा ने छोटी-सी बात पर तुनककर उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया था। कहीं पापा के प्रति उसके भावुक किशोर मन में नफरत घर न कर डाले। इसी चेतनावश मम्मी ने लाड़-दुलार से पास बिठाकर उसे समझाई थीं। मम्मी की इस जागरूकता से अभिभूत है अनंत। वाकई मम्मी यदि यह सब नहीं बतातीं तो पापा के प्रति उसके मन में कड़वाहट निरंतर बढ़ती जाती। यह मम्मी का उस पर बहुत बड़ा उपकार है।

–इसी पुस्तक से

वेलकम पापा!


अनंत टी.वी. देख रहा है। पर्दे पर विज्ञापन है। वह खास विज्ञापन, जिसे देखते हुए अनंत के दिल की धड़कन बढ़ जाती है। उसकी सांस तेज हो जाती है और कभी-कभी माथे पे पसीना छलक आता है। ऐसे में मम्मी-पापा या और कोई बड़ी उम्र वाला आसपास हो तो अनंत असुविधा महसूस करता है। सहज नहीं रह पाता। संभव हो तो चैनल बदल देता हैं या फिर टी. वी. के सामने से हट जाता है। लेकिन उत्तेजना कायम रहती है और रहता है इंतजार–टी.वी. के सामने अकेले बैठकर ऐसे कुछ खास विज्ञापन बार-बार देखने का। आज यह मौका कई दिनों बाद हाथ लगा है। पापा अब तक ऑफिस से आए नहीं हैं। मम्मी डॉक्टर के पास गई हैं और दीदी आकांक्षा अंदर कमरे में पढ़ाई कर रही है। पढ़ना उसे भी है, लेकिन पढ़ने का मूड़ नहीं हो रहा, क्योंकि इस वक्त टी.वी. के साथ उसके अलावा दूसरा कोई नहीं है।

कुछ ऐसे विशेष विज्ञापन हैं, जिन्हें देखते हुए अनंत बराबर महसूस करता है कि अब वह बच्चा नहीं रहा। पर इतना बड़ा भी नहीं हुआ है कि बड़ों की गिनती में आए। यह अहसास उसे सताता है। वह कसमसाता है। समझ नहीं पाता, जल्दी से जल्दी जवान होना चाहता है या फिर से अपने बचपन में लौट जाना चाहता है। अबोध, निश्छल, चंचल और सरलता-भरी निर्मल दुनिया में।

कॉल बेल बजती है। शायद पापा आए हैं। वह जल्दी से चैनल बदलता है। धत्त तेरे की ! यह तो हद हो गई ! दूसरे चैनल पर भी ठीक वही विज्ञापन। झुंझलाते हुए टी. वी. ऑफ करके वह दरवाजा खोलता है। पापा सामने खड़े हैं। अनिर्णीत यु्द्ध से लौटे थके-बुझे योद्धा वाली गंभीर मुद्रा में। वह मुस्कुराकर उनका स्वागत करना चाहता है, मगर हिचकिचाता है। क्यों बे, ये दांत किस खुशी में निकाल रहा है ? पापा तमककर पूछ बैठे तो क्या जवाब देगा। अकसर यह खयाल उसके चेहरे पर मुस्कुराहट जमा देता है। यदि विधिवत् रिकॉर्ड रखा जाता तो पापा का नाम कब का गिनीज बुक में आ चुका होता। सीधे मुंह बात नहीं करने के लिए।

इधर पापा पीकर आने लगे हैं। शराब की गंध वह पहचानता है। देसी और विलायती मोटे तौर पर दोनों का अंदाज है उसे। यह सरकारी मेहरबानी से संभव हुआ। लगभग हर नुक्कड़ के आसपास शराब की दुकान, वहीं पीने की छूट और सुविधा भी। पहले उसे पिये हुए से डर लगता था। बिदकता था, बचकर निकल जाता। धीरे-धीरे डर निकल गया, नफरत होने लगी। अब उसे दया आती है, उनके प्रति सहानुभूति पैदा होती है। यह क्लास टीचर जी की कृपा से संभव हुआ। जयशंकर प्रसाद जी की कहानी ‘मधुआ’ पढ़ाते हुए उन्होंने छात्रों को विषय की गहराई में ले जाकर शराबियों का मनोविज्ञान विस्तार से समझाया था। जिस पर क्लास से बाहर चर्चा करते हुए कुछ जागरूक टाइप छात्रों ने विषय से हटकर पढ़ाने का आरोप लगाया था। अनंत मौन रहा था। वह भला उन छात्रों से सहमत कैसे होता ! बल्कि इसके लिए सर का और अधिक प्रशंसक हो गया था।

अपने पिये हुए पापा के प्रति उसे पूरी सहानुभूति है। वह समझ रहा है, यह पापा की कमजोरी है। मानसिक और व्यावहारिक दुर्बलता। लेकिन इस बाबत पापा से चर्चा करने की औकात हासिल करने में थोड़ा वक्त लगेगा। तब तक अपने धैर्य की परीक्षा निरंतर देनी होगी।

‘टी. वी. देख रहा था क्या ?’ हिकारत पापा के लहजे में ओवरलोड थी। घर में सबको तुच्छ समझने का अधिकार पापा के पास सुरक्षित है। अनंत जानता है। पापा के कान तेज हैं। उन्होंने सीढ़ियों से ही टी. वी. की आवाज सुन ली होगी। वैसे भी बात-बात में झूठ बोलने की उसकी आदत नहीं। सर से मिले संस्कार की बदौलत।

उसने स्वीकृति में सिर हिलाते हुए कहा–‘जी हां !’ स्वर इतना धीमा था कि तेज श्रवण-शक्ति के बावजूद पापा ने सुना नहीं, पर समझा जरूर। और मुझे दिखाने के लिए टी. वी. बंद कर दिया ! वाह, क्या चालाकी है ! अपनी ये होशियारी तू पढ़ाई में क्यों नहीं लगाता ? पापा ने कर्कश आवाज में घुड़का। इस अपमानजनक प्रश्न की पीड़ा झेलते हुए भी अनंत का मानसिक संतुलन कायम है। वह सोच रहा है, वाह, क्या धासू डायलॉग मारा है पापा ने। लेकिन ऐसा संवाद तो ठहाका लगाकर या कुटिलतापूर्वक ही सही, पर मुस्कुराते हुए बोला जाना चाहिए। भविष्य में कभी टी. वी. सीरियल या कोई फिल्म डायरेक्ट करने का मौका मिला तो यह डायलॉग वह विलन के मुंह से हंसते हुए बुलवाएगा, अंत में ‘प्यारे’ जोड़कर। उसने तय किया और मुस्कुराने से बचा। अलबत्ता शिष्टाचार के नाते उसने मन ही मन कहा–‘थैंक यू पापा, फॉर दिस धाकड़ डायलॉग।’ तब एकाएक उसमें चाह जगी, काश, दरवाजा खोलते हुए पुलकित होकर कह पाता, वेलकम पापा ! और वह उदास हो गया।

पापा के इस विकट प्रश्न का वह अपनी सामान्य बुद्धि से क्या जवाब दे। पापा उसे घेरकर प्रताड़ित करने के मूड में हैं। लगता है, आज बाहर से फिर कोई चोट खाकर आए हैं। अच्छा है मम्मी घर में नहीं हैं, वरना उसकी जगह आज मम्मी होतीं पापा का शिकार। आकांक्षा इस मामले में भाग्यशाली है। अपनी कुंठा का दबाव वे दीदी पर उतारने से कतराते हैं। यह तथ्य उसने कई बार आश्चर्य सहित नोट किया है। उसे दीदी से ईर्ष्या तो होती रहती है। इस वक्त गुस्सा भी आ रहा है। कमबख्त जानबूझकर बंद कमरे में पढ़ने का नाटक कर रही है। बाहर आ जाती तो क्या प्रथम आने से पिछड़ जाती। पापा की गूंजती आवाज उसने सुनी ही होगी। दीदी जानती तो है। पापा उसके अव्वल आने का रोब मानते हैं। उसके प्रति कुछ नरम रवैया रखते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि दीदी सोच रही हो पापा के नरम रवैये का अपना कोटा वह अनंत पर क्यों खर्च करे। यह मानते हुए वह झुंझलाया।

‘जुबान सी रखी है क्या ? जवाब क्यों नहीं देता !’ पापा चीखे। वह हड़बड़ाया। तभी कॉलबेल बजी। मम्मी होनी चाहिए। उसने जितनी राहत महसूस की उससे अधिक चिंतित हुआ। अब पापा अपनी खुन्नस मम्मी पर उतारेंगे। यह उनकी पुरानी लत है। समझ आने के बाद से पापा का व्यवहार देखते हुए उसे विश्वास नहीं होता। मम्मी से उन्होंने प्रेम विवाह किया है। अलबत्ता यह स्पष्ट है कि मम्मी ने उनसे लव मैरिज की है, जिसे बराबर निभा रही हैं। पापा की प्रत्येक ज्यादती सहन करते हुए।

दरवाजा खोलते हुए अनंत मुस्कुराया। मम्मी उसे निहारते हुए पहले ही मुस्कुरा रही थीं। मम्मी के हाथ से सब्जी का थैला लेते हुए सम्मान और प्रशंसा के भाव उसकी आंखों में तैरने लगे। धन्य है आदर्श भारतीय नारी। अस्वस्थ है, डॉक्टर के यहां जा रही है। लेकिन ध्यान केंद्रित है घर की जरूरतों पर। ‘एक पंथ दो काज’ वाली उक्ति मम्मी के व्यक्तित्व के सामने बौनी है। अनंत ने मम्मी को ‘एक पंथ तीन काज’ निबटाते देखा है, कई-कई बार। पापा ने कभी दूध-सब्जी लाने जैसा कोई काम किया हो। अनंत को याद नहीं पड़ता। हां, उसने अपनी कक्षा के अध्यापक जी को कपड़े की थैली में फल-सब्जी आदि ले जाते अकसर देखा है और प्रभावित हुआ है। जाने क्या बात है। अपने क्लास सर को देखते-सुनते उसे अपने पापा याद आ जाते हैं।

पापा टी. वी. ऑन करके स्पोर्ट्स चैनल देख रहे हैं। सोफे पर बुरी तरह पसरकर। बुरी तरह यानी फूहड़तापूर्वक। वह इस तरीके से बैठा दिख जाए तो जरूर एक तगड़ी धौल जमा दें। अनंत अपनी इस सावधानी से प्रसन्न है। उसने अब तक पापा को यह चांस नहीं दिया है। बैठते समय सदा अपनी रीढ़ सीधी रखता है। अपने सर के निर्देशानुसार, ताकि कई शारीरिक-मानसिक समस्याओं से बच सके। एक बार मम्मी ने बताया था। पापा क्रिकेट के अच्छे खिलाड़ी थे। उसे विश्वास नहीं होता। तोंद निकल आई है पापा की। कभी अच्छे खिलाड़ी रहे व्यक्ति का लक्षण यह तो कतई नहीं होना चाहिए। खुद क्रिकेट के खिलाड़ी होने के बावजूद कभी उन्होंने दीदी या उसके हाथ में बल्ला नहीं थमाया। बॉल नहीं लपकवाई। इसे लेकर अनंत को उनसे कोई शिकायत नहीं है। क्यों ? चिंतन करता है तो सर मुस्कुराते नजर आते हैं। मैं क्रिकेट क्या, शुद्ध देशी खेल कबड्डी का भी अच्छा खिलाड़ी नहीं बन पाया हूं। लेकिन पापा की तरह अपनी तोंद नहीं निकलने दूंगा। उस तनाव-भरे वातावरण में अनंत ने शांत मन से संकल्प लिया।

क्या कहा डॉक्टर ने ? पापा का लहजा पुलिसिया पूछताछ वाला है। अनंत का संदेह प्रबल हुआ। पापा ने मम्मी से प्रेम-विवाह तो हरगिज नहीं किया होगा। तब संभव है कोई दूसरा कारण रहा हो मम्मी से शादी करने का। वरना प्रेमी पति के लिए तो यह एक सुनहरा अवसर है। प्रेमिका पत्नी पर प्यार बरसाने का। अनंत ने सोचा और चौंका। यह तो वह अपनी उम्र से आगे बढ़कर सोच रहा है। उसने सुना है कि लड़कों की तुलना में लड़कियां अपनी उम्र से अधिक परिपक्व हो जाती हैं। तो यह लड़कियों वाली विशेषता उसमें कैसे आ गई ! वह झेंपा, खिसियाया फिर मुस्कुराया, क्योंकि पापा की नजर मम्मी पर थी।

बस, शुगर जरा बढ़ गई है और थोड़ी कमजोरी है। बाकी सब नॉर्मल है ! मम्मी ने रिपोर्ट वाली फाइल पापा को देते हुए कहा और किचन में घुस गईं। गैस स्टोव पर एक तरफ चाय के लिए पानी रखा। दूसरी तरफ चावल का कूकर चढ़ा दिया। फिर फ्रिज में से गुंधा आटा, कटी सब्जी और उबली दाल निकाल लाई। वाह ! क्या प्रबंधन व्यवस्था है। डॉक्टर के यहां जाना है। खाना तैयार करने में देरी भी मंजूर नहीं। बच्चों की मदद लेकर उनकी पढ़ाई में व्यवधान डालने का तो सवाल ही नहीं। पापा चाय पीकर फ्रेश होने जाएंगे। आराम से नहाकर आएंगे। तब तक खाना तैयार। एकदम ठीक वक्त पर। मानो मम्मी बाहर कहीं गई ही नहीं थीं। अनंत मुग्ध भाव से सोच रहा है। काश, मम्मी कुछ अधिक शिक्षित होतीं और किसी कंपनी में जॉब कर रही होतीं। तो अपनी दक्षता के दम पर अब तक प्रबंधक का पद पा चुकी होतीं।

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