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गांधी जी की सूक्तियां

ठाकुर राजबहादुर सिंह

प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :127
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8289
आईएसबीएन :81-216-046-0

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लठिया के सहारे चलने वाले उसी गांधी ने अपने अहिंसा के हथियार से ऐसे ज़बरदस्त बलशाली साम्राज्य की नींव हिला दी और सदियों से गुलाम देश को आज़ाद कराया।

Gandhiji Ki Suktiyan - A Hindi Book - by Thakur Rajbahadur Singh

एक सदी से भी पहले इस देश की धरती पर जन्म लिया था एक युग-पुरुष ने, जिसके पीछे करोड़ों लोग सब-कुछ त्यागने और देश पर मर-मिटने के लिए तैयार थे। उस महात्मा ने एक ऐसे साम्राज्य को चुनौती दी थी, जिसके बारे में यह तय था कि आधी दुनिया पर उसका एक-छत्र राज था, जहां उसके अहंकार का सूरज नहीं डूबता था।

लठिया के सहारे चलने वाले उसी गांधी ने अपने अहिंसा के हथियार से ऐसे ज़बरदस्त बलशाली साम्राज्य की नींव हिला दी और सदियों से गुलाम देश को आज़ाद कराया।

अपने संघर्षपूर्ण जीवन में गांधी जी जो कुछ बोलते या लिखते थे, वह बहुत संक्षिप्त, सारगर्भित और स्पष्ट होने के कारण अमर सूक्तियों के रूप में सामने आया। बापू जी के चुनिंदा वचनों का संग्रह, जो हर वर्ग के लिए प्रेरणा-स्त्रोत है।

 

अनुशासन

 

अनुशासन शारीरिक और मानसिक दो प्रकार के होते हैं और किसी भी व्यक्ति के प्रशिक्षण के लिए ये दोनों ही जरूरी हैं।

अनुशासन में रखने का प्रशिक्षण बचपन में और घर से ही शुरू होना चाहिए। अनुशासनहीन बालक आसानी से बिगड़ जाते हैं।

अनुशासन के बिना न तो परिवार चल सकता है, न संस्था या राष्ट्र। वास्तव में अनुशासन ही संगठन की कुंजी और प्रगति की सीढ़ी है।

अनुशासन केवल फौजों के लिए नहीं, जीवन के हर क्षेत्र के लिए है।

अनुशासन का पालन तभी सम्भव है, जब मनुष्य का उस काम में अनुराग हो जिसमें वह लगा हुआ है। इसके बिना तो अनुशासन अनुकरण-मात्र होगा।

किसी भी राष्ट्र का परिचय उसके अनुशासनबद्ध नागरिकों से मिल जाता है।

बाहरी दुनिया की भांति अपने मन और शरीर को भी अनुशासन में रखना चाहिए।

सारे अनुशासनों की जड़ व्यक्तिगत अनुशासन है। जब तक कोई भी व्यक्ति अपने-आप अनुशासन और नियम-पालन में बंध नहीं जाता, तब तक उसे दूसरे से वैसा कराने की आशा करना व्यर्थ है।

 

अन्तर्जातीय व्यवहार

 

दूसरी जाति के लोगों के साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध करने से किसी की जाति नहीं बदलती, क्योंकि वर्णाश्रम पेशे के आधार पर होता है न कि जन्म के।

सभी जाति के लोग भगवान की सृष्टि के सेवक हैं–ब्राह्मण अपने ज्ञान द्वारा, क्षत्रिय बाहुबल द्वारा, वैश्य वाणिज्य द्वारा, शूद्र अपने शरीर-श्रम या सेवा द्वारा। फिर इनमें कोई ऊंच-नीच नहीं कहा जा सकता।

हिन्दू-धर्म का अन्तर्जातीय खान-पान और अन्तर्जातीय विवाह के कोई विरोध नहीं है। विवाह में ऊंच-नीच का प्रश्न आड़े नहीं आता, क्योंकि ऐसे विवाह–विलोम, प्रतिलोम–प्राचीनकाल से होते आए हैं।

अन्तर्जातीय भोज और अन्तर्जातीय, विवाह से वर्णाश्रम धर्म को कोई हानि नहीं पहुंचती।
 
यह तो व्यक्ति की पसन्द पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस वर्ण में विवाह करता है।

अन्तर्जातीय और अन्तर्प्रान्तीय व्यवहार चालू हुए बिना देश में एकता और राष्ट्रप्रेम की भावना नहीं आ सकती।

वास्तव में जाति के नाम से तो केवल मनुष्य की जाति है, इसलिए सारे मानवीय व्यवहार जातीव हैं न कि अन्तर्जातीय।

जात-पात का ढकोसला हिन्दू-संस्कृति की आरम्भिक नहीं बाद की देन है, जिसका खामियाज़ा हम आज भी उठा रहे हैं।

 

अभय

 

भय तो कभी और कहीं करना ही नहीं चाहिए।

अभय-व्रत का सर्वथा पालन लगभग अशक्य है। भय-मात्र से मुक्ति तो जिसे आत्मसाक्षात्कार हुआ हो, वही पा सकता है। अभय मोहरहित अवस्था की पराकाष्ठा है।

जब यह शरीर, नश्वर है और आत्मा अमर है, तो फिर भय किसका और किसलिए?

सदा अभय रहने से मनुष्य का कोई कभी कुछ बिगाड़ नहीं सकता।

सच्चा जवांमर्द वही है, जो ईश्वर के अतिरिक्त किसी से भी न डरे।

अभय की गिनती गीता में दैवी सम्पत्ति प्रकरण में भगवान ने सर्वप्रथम की है।

बिना अभय के अन्य दैवी सम्पदाएं मिल ही नहीं सकतीं।

अभय का मतलब है तमाम बाहरी भयों–डरों से मुक्ति।

अभय में मोटे तौर पर मौत के डर, धन–दौलत लुटने के भय, कुटुम्ब-कबीले के बारे में डर, रोग के डर, हथियार चलने के डर, आकर जाने के डर, किसी को बुरा लगाने या चोट पहुंचाने के भय आदि से मुक्ति पा जाते हैं।

अभय-व्रत का पूरा पालन जनसामान्य के लिए लगभग असम्भव है। परन्तु निश्चय करने, लगातार कोशिश करने और आत्मा में श्रद्धा रखने से अभय की भावना बढ़ती ही जाती है।

बाहरी भयों से मुक्ति पा लेने पर भी भीतर के दुश्मनों–काम, क्रोध, मोह और लोभ–से छुटकारा पाना और भी कठिन हो जाता है।

दरअसल अगर देह की ममता छूट जाए, तो आसानी से अभय प्राप्त हो जाए।

संसार के जितने भी भय हैं, वे हमारे खयाली पैदावार हैं। पैसे से, कुटुम्ब से, शरीर से ‘मेरापन’ की भावना दूर कर दें तो फिर भय किसका और काहे का!

भगवान ऐसे लोगों को अभय कर देते हैं, जो उनमें विश्वास रखते हैं।

बल तो निर्भयता में है; शरीर में मांस बढ़ जाने में नहीं।

संसार में आधे से अधिक सक्षम लोग तो इसीलिए असफल हो जाते हैं कि समय पर उनमें साहस का संचार नहीं हो पाता और वे भयभीत हो उठते हैं।

जो मनुष्य भयवश असत्य बोलता और झूठा आचरण करता है, वह पशु से भी बदतर है।

निर्भय का लोहा शत्रु भी मानता है।

 

अमीरों से

 

अमीरों को चाहिए कि वे अपने धन को जनता की धरोहर समझकर खर्च करें।

ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त इसी बात पर आधारित है कि जिसके पास धन है वह उसे अपना समझकर फजूल खर्च न करे–थाती समझकर रखे और लोक–कल्याण में खर्च करे।

धन को धरोहर समझकर सुरक्षित रखनेवाले का काम कम महत्वपूर्ण नहीं है। उससे ज़बर्दस्त आत्मनियंत्रण की शक्ति आती है।

अमीर जिस तरह गरीबों से अपने को अलग और दूर रखते हैं, उससे उनका भविष्य अन्धकारमय दीखता है।

अमीरों को धन के गर्व में अपना मानसिक संतुलन नहीं खोना चाहिए, क्योंकि धन तो उनका है ही नहीं।
 
यदि हमारे देश के धनाढ्य और राजा–रईस समय रहते चेत गए और काल की गति को पहचानते हुए अपने रुख को बदल लिया, तो उनका भविष्य अन्धकारमय नहीं होगा।
 
हर अमीर और धनाढ्य को यह बात गांठ बांध रखनी चाहिए कि वह मनुष्य पहले हैं और सेठ–साहूकार बाद में।

 

असहयोग

 

असहयोग का पालन तलवार की धार पर चलने के समान है।

असहयोग कोई निष्क्रिय स्थिति नहीं है; यह अत्यन्त सक्रिय स्थिति है–शारीरिक प्रतिरोध या हिंसा से कहीं अधिक क्रियाशील।

मैं जिस अर्थ में असहयोग शब्द का प्रयोग करता हूं; उसमें उसे निश्चित रूप से अहिंसात्मक होना चाहिए।

असहयोग अनुशासन और उत्सर्ग का कार्य है, और उसमें विरोधी विचारों के प्रति धैर्य और आदर रखने की आवश्यकता पड़ती है।

मैं स्वीकार करता हूं कि सब असहयोगियों की प्रेरणा शक्ति प्रेम नहीं, बल्कि एक अर्थहीन घृणा है।

हमारा असहयोग भौतिक सभ्यता और तत्सम्बन्धी लोभ और दुर्बलों के उत्पीड़न से है।

असहयोग मेरा कल्पद्रुम है।
 
असहयोग मेरे जीवन-सिद्धान्त का अंग है, तथापि वह सहयोग का मंगलाचरण-मात्र है।

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