राजा राम - गीताप्रेस 1116 Raja Ram - Hindi book by - Gitapress
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राजा राम

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :35
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 868
आईएसबीएन :81-293-1052-x

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राजा राम की प्रमुख कथाएँ...

Raja Ram a hindi book by Gitapress - राजा राम - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

श्रीभरत को पादुका-देना

श्रीराम-वनवास के बाद महाराज दशरथ ने उनके वियोग में अपना प्राण त्याग दिया। फिर गुरुदेव वसिष्ठ के आदेश से उनके शरीर को सुरक्षित रख दिया गया और ननिहाल से श्रीभरत और शत्रुघ्न को बुलाने के लिये शीघ्रगामी दूत भेजे गये। श्रीभरत के ननिहाल से लौटने के बाद कैकेयी ने उन्हें प्रेमपूर्वक हृदय से लगाया और उनसे अपने पिता, भाई और माता की कुशल पूछी। महाराज दशरथ को कैकेयी के महल में न देखकर भरतजीने कहा—‘माँ ! तुम यहां अकेली बैठी हो, तुम्हारे बिना तो पिताजी एकान्त में कभी नहीं रहते थे। भइया श्रीराम भी नहीं दिखायी दे रहे हैं कारण क्या है ? उन्हें न देखकर मुझे अत्यन्त भय तथा दुःख हो रहा है।’

कैकेयी ने कहा—‘पुत्र ! तुम्हारे लिये भय और चिन्ता की कोई बात नहीं है। मैंने महाराज से पूर्व वर के अनुसार तुम्हारे लिये राज्य तथा श्रीराम के लिये चौदह वर्ष का वनवास माँग लिया। श्रीराम के वनवास से दुःखी होकर तुम्हारे पिता मृत्यु को प्राप्त हुए।’
कैकेयी के इस कुकृत्य सुनकर श्रीभरत शोक-समुद्र में डूब गये। उन्होंने कैकेयी से कहा—‘अरी पापिनी ! तू बात करने योग्य नहीं है। तू अपने पति की हत्या करने वाली हत्यारिणी है और तेरे गर्भ से जन्म लेने के कारण उस महापाप का मैं भी हकदार हूँ मैं तेरा मुँह भी नहीं देखना चाहता। अतः तू मेरे सामने से तत्काल हट जा।’ कैकेयी के कुकृत्य की निन्दा करने के बाद श्रीभरत माता कौसल्या के पास गये और उन्हें नाना प्रकार से सान्त्वना दिया। उसके बाद उन्होंने गुरुदेव वसिष्ठ के आज्ञानुसार महाराज दशरथ का विधिवत अन्तिम संस्कार सम्पन्न किया तथा पिता के उद्देश्य से ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार का दान किया। गुरुदेव वसिष्ठ के आदेश और माता कौसल्या के अनुरोध के बाद भी भरतजी ने राज्य लेना अस्वीकार कर दिया तथा सबको साथ लेकर श्रीराम को मनाने के लिये वे पैदल ही चित्रकूट चल दिये।

 मार्ग में निषादराज गुह और श्रीभरद्वाज जी से मिलते हुए श्रीभरतजी चित्रकूट पहुँचे वहां उन्होंने दूर्वादल के समान श्याम शरीर और विशाल हृदय वाले श्रीराम को बैठे हुए देखा। वे श्रीजानकीजी को निहार रहे थे और श्रीलक्ष्मणजी उनके चरणकमलों की सेवा कर रहे थे। श्रीभरत जी ‘पाहि नाथ !’ कहते हुए दण्ड की भाँति भूमिपर गिर पड़े और उन्होंने श्रीराम के युगलचरणों को पकड़ लिया। श्रीराम ने प्रेम से अधीर होकर उन्हें उठाकर हृदय से लगाया श्रीभरतजी ने श्रीरामसे कहा—‘हे महाभाग ! यह समस्त पैतृक राज्य आपही का है। आप हमारे बड़े भाई हैं, अतःपितातुल्य हैं। आप इस राज्य को स्वीकार करें और मेरी माता के अपराध को भुलाकर हमारी रक्षा करें।’

श्रीराम ने कहा—‘भाई ! पिताजी ने मुझे चौदह वर्ष का वनवास और तुम्हें अयोध्या का राज्य दिया है। पिता के आदेश का पालन करना हम दोनों का परम धर्म है। जो मनुष्य पिता के आदेश का उल्लंघन करता है, वह जीता हुआ भी मृतक के समान होता है। अतः तुम अयोध्या का पालन करो और मैं दण्डकारण्य में निवास करूंगा तथा वनवास से लौटने के बाद जैसा तुम चाहोगे, वैसा करुँगा। इस तरह नाना भाँति से समझाकर श्रीरामने अपनी चरण-पादुकाएँ (खड़ाऊँ) श्रीभरतजी को सौंप दी। श्रीभरत जी अयोध्या लौट आये और उन पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित कर नन्दिग्राम में तपस्वी-जीवन व्यतीत करते हुए अयोध्या का शासन करने लगे।

शूर्पणखा को दण्ड


जब भगवान् श्रीराम पंचवटी में निवास कर रहे थे, तब एक दिन इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली रावण की बहन शूर्पणखा सुन्दर स्वरूप में श्रीराम के संनिकट गयी। उसने श्रीराम के दिव्य स्वरूप पर मोहित होकर उनसे कहा—‘हे कमलनयन ! तुम किसके पुत्र हो और तुम्हारा क्या नाम है ? इस आश्रम में जटा-वल्कल धारण क्यों रहते हों ? यहाँ रहकर तुम क्या प्राप्त करना चाहते हो ? मुझे बताओ। मैं राक्षसराज महात्मा रावण की बहन कामरूपिणी शूर्पणखा हूँ। इस संसार में तुम्हारे समान सुन्दर पुरुष और मेरे समान सुन्दर स्त्री कोई भी नहीं है। आज हमारा और तुम्हारा संयोग ब्रह्मा के विधान से हुआ है। मैं अपने भाई खरके साथ इसी वन में रहती हूँ। रावण ने मुझे इस सम्पूर्ण वन का अधिकार सौंप दिया है। मैं तुम्हारे विषय जानना चाहती हूँ, अतः तुम मुझे अपना परिचय दो।’

भगवान् श्रीरामने उससे कहा—‘मैं अयोध्यापति महाराज दशरथ का पुत्र हूँ। मेरा नाम राम है। यह सुन्दरी मेरी पत्नी जनकनन्दिनी सीता है तथा यह सुन्दर कुमार मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है। हे सुन्दरी ! बताओ, मैं तुम्हारा  कौन-सा कार्य करूँ ?’
श्रीरामका वचन सुनकर शूर्पणखा बोली—‘राम ! आजतक मैं अविवाहित हूँ, क्योंकि संसार में मेरे अनुरूप कोई पुरुष मिला ही नहीं; जिससे मैं विवाह कर सकूँ। आज मेरा मन तुम्हें देखकर तुम्हारे दिव्य सौन्दर्य पर मोहित हो गया है, अतः तुम मुझसे विवाह कर लो और इस वन में मेरे साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो।’
श्रीरामने मुसकराकर कहा—‘हे सुन्दरी ! मेरी तो पतिव्रता भार्या मौजूद है, जिसका त्याग मेरे लिये असंभव है। इसके रहते हुए तुम जन्मभर सौत-डाहसे जलती हुई किस प्रकार रह सकोगी ? हाँ, मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है। वह तुम्हारे योग्य पति हो सकता है। तुम इस विषय में उसी से बात करो।’

फिर शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गयी और बोली—‘हे लक्ष्मण ! अपने भाई के अनुसार तुम मेरे पति हो आओ। आज हम और तुम परस्पर संगमन करें। विलम्ब मत करो।’ शूर्पणखा के कथन पर श्रीलक्ष्मण ने कहा—‘हे साध्वि ! मैं तो भगवान श्रीरामका दास हूँ। मुझे अपना पति बनाने से तुम्हें भी उनकी दासी बनना पड़ेगा। तुम्हारे लिये इससे बड़ी दुःख की बात भला और क्या होगी ? तुम उन्हीं के पास जाओ। वे महाराज हैं और सबके स्वामी हैं तथा सब कुछ करने में समर्थ हैं।’ यह सुनकर शूर्पणखा विशेष क्रोधित हो गयी। वह श्रीराम से बोली—‘राम ! तुम बड़े ही चञ्चलचित्त हो। मुझे इधर-उधर घुमाकर मेरे शुद्ध मनोरथ का तुम उपहास कर रहे हो। शायद तुम्हें मेरी असीम शक्ति का ज्ञान नहीं। मैं अभी तुम्हारे सामने ही तुम्हारी पत्नी सीता को खा जाती हूँ।’

ऐसा कहकर वह भयंकर रूप धारण करके सीता को खाने के लिए दौडी। भगवान् श्रीरामने लक्ष्मण को उसे दण्डित करने का संकेत किया। भगवान् के संकेत करने पर श्रीलक्ष्मण उठे और शीघ्रतासे शूर्पणखा के सामने आ गये तथा बड़ी फुर्ती से अपनी तलवार निकाल कर उन्होंने उसके नाक-कान काट डाले। वह पीड़ा से घोर शब्द करती हुई रक्त से लथपथ हो गयी और विलाप करती हुई खर-दूषण के पास गयी।


खर-दूषण से युद्ध



शूर्पणखा विलाप करती हुई खरके चरणों में जाकर गिर पड़ी। उसने खरसे कहा—‘भाई ! तुम्हारे बल और पराक्रम को धिक्कार है। आज तुम्हारे ही राज्य में मनुष्य-जैसे निरीह प्राणी निर्भय होकर तुम्हारी बहन की दुर्दशा करने का दुःसाहस कर रहे हैं।’
उसकी विचित्र दशा देखकर खरने कहा —‘शूर्पणखा ! क्या बात है ! मृत्यु के मुख में जाने वाले किस दुष्ट ने तुम्हारी यह दशा की है ? तू सही बतला ! वह काल के समान बलवान् क्यों न हो, मैं उसे तत्काल यमराज के घर भेजकर तुम्हारे इस अपमान का बदला लूँगा। वह, देव, दानव, राक्षस, यक्ष, मनुष्य कोई भी हो; अपनी तीक्ष्ण तलवार से काटकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा।’

राक्षसी शूर्पणखाने कहा—‘भाई ! यहाँ सीता और लक्ष्मण सहित अयोध्यापति दशरथ का पुत्र राम दण्डकारण्यके ऋषि-मुनियों को राक्षसों के भय से निर्भय करता हुआ निवास कर रहा है। उसने पृथ्वी को राक्षसों से विहीन करने की प्रतिज्ञा कर रखी है उसी की प्रेरणा से उसके भाई लक्ष्मण ने मेरी नाक-कान काट कर यह दुर्दशा की है। यदि आप में अपने पौरुष का जरा भी अभिमान है तो तुम उन दोनों राक्षस-शत्रुओं को तत्काल मार डालो। मैं उन दोनों का रुधिर पिऊँगी, नहीं तो अपना शरीर-त्यागकर यमलोक चली जाऊँगी।’ शूर्पणखा का कथन सुनकर  तथा उसकी दुर्दशा देखकर खर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने तत्काल युद्ध के लिये प्रस्थान कर दिया उसके साथ चौदह सहस्र की विशाल सेना थी। खर-दूषण और त्रिशिरा—सभी नाना प्रकार के दिव्यास्त्रों से सुसज्जित थे। सब एक-से –एक महान् पराक्रमी थे।

राक्षसों का कोलाहल सुनकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—‘लक्ष्मण ! देखो, राक्षसों का कोलाहल सुनायी पड़ रहा है निश्चय ही राक्षसों की विशाल सेना आ रही है। आज मेरे साथ उनका भयंकर युद्ध होगा। अतः हे महाबली ! तुम सीता को लेकर पर्वत की किसी कन्दरा में चले जाओ। आज मैं इन समस्त राक्षसों का एक साथ वध करना चाहता हूँ।’ उसके बाद लक्ष्मण जी ‘जो आज्ञा’ कहकर तथा सीताजी को साथ लेकर पर्वत की एक कन्दरा में चले गये। फिर श्रीरामचन्द्र जी धनुष तथा दो अक्षयबाणों वाले तरकरश बाँधकर युद्ध करने के लिये तैयार हो गये। उसी समय राक्षसों की सेना श्रीरामके ऊपर नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगी।

श्रीरामने अत्यन्त लाघवसे उनके समस्त अस्त्र-शस्त्रों को काट डाला। फिर सहस्रों बाणों से उन समस्त राक्षसों को मारकर उनके नायक, खर, दूषण का भी वध कर डाला। इस प्रकार रघुवंशियों में श्रेष्ठ श्रीराम ने आधे पहर मे ही समस्त राक्षसी सेना का संहार कर दिया। श्रीलक्ष्मणजी जब सीताजी को लेकर गिरिगुहा से वापस आये, तब वहाँ सम्पूर्ण राक्षसों को मरा हुआ देखकर वे विशेष विस्मित हुए। श्रीसीताजी ने श्रीरामका आलिंगन किया और उनके घावों पर मरहम-पट्टी की शूर्पणखा भी निराश्रित और असहाय होकर खर-दूषण की मृत्यु पर विलाप करती हुई रावण के पास लंका चली गयी। विशाल राक्षसी सेना का संहार हो जानेपर दण्डकारण्य के ऋषि मुनि निर्भय हो गये। उन लोगोंने श्रीराम के बल और पराक्रम की भूरि-भूरि प्रशंसा कीं।


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