Ashtavinayak - Hindi book by - Gitapress - अष्टविनायक - गीताप्रेस
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अष्टविनायक

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :19
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 869
आईएसबीएन :81-293-0669-7

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प्रस्तुत भगवान गणेश के आठों रूपों का वर्णन...

Ashtavinayak A hindi book by Gitapress - अष्टविनायक गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नम्र निवेदन

भगवान् श्रीगणेश सबके लिए सर्वप्रथम पूज्य तथा स्मरणीय हैं। कोई भी मंगल कार्य इनके प्रथम पूजा के बिना सम्पन्न नहीं होता। विघ्नविनाशक होने का कारण इनकी प्रथम पूजा अनिवार्य है। शीघ्र प्रसन्न होनेवाले स्वभाव के कारण इनके पूजा-विधान में न अधिक नियमों की आवश्यकता है—न बहुत साधन सामग्री की। कोई भी इनकी पीली मिट्टी, सुपारी या गोबर की प्रतिमा बनाकर सामान्य दुर्वांकुरों तथा थोड़े से मोदकके द्वारा पूजा करके इन्हें प्रसन्न कर सकता है। इनका रूप भी बड़ा ही मनोहर है। हाथी के मुखवाले और लम्बोदर होने से यह बच्चों के लिये भी अधिक प्रिय हैं। बुद्धिमान इतने हैं कि माता-पिता की परिक्रमा से ही इन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर डालीं और सर्वपूज्य बन गये। पुराणों में इनके विषय में बड़ी ही सुन्दर कथाएँ वर्णित हैं। मुद्गल पुराण में इनके आठ अवतारों का वर्णन मिलता है, जिनके नाम क्रमशः वक्रतुण्ड, एकदन्त, महोदर, गजानन, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, तथा धूम्रवर्ण हैं। इनके अलग-अलग वाहनों का भी परिचय मिलता है। प्रस्तुत पुस्तक में उन्हीं आठ कथाओं का सरल भाषा में सजीव चित्रण है। प्रत्येक कथा के साथ उपासनायोग्य भगवान् गणेशके सुन्दर चित्र भी हैं। अन्त में नित्य-पाठ हेतु संकट-नाशन-गणेश-स्तोत्र, नित्य-स्तुति तथा गणेशजी की आरती भी दी गयी है। लोक मंगल की कामना से यह बाल-कल्याण का सातवाँ पुष्प ‘अष्टविनायक’ पाठकों की सेवा में प्रस्तुत है। आशा है, पाठक इसे भी अन्य पिछले पुष्पों की भाँति अपनाकर हमारे परिश्रमको सार्थक करेंगे।


-प्रकाशक


संकष्टनाशनस्तोत्रम्


नारद उवाच


प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्। भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये।।
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्। तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।।
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च। सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्।।
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्। एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्।।
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्।।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्। पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्।।
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभते। संवत्सरेण सिद्धि च लभते नात्र संशयः।।
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्। तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः।।


नारदजी कहते हैं पहले मस्तक झुकाकर गौरीपुत्र विनायकदेव को प्रणाम करके प्रतिदिन आयु, अभीष्ट मनोरथ और धन आदि प्रयोजनों की सिद्धि के लिये भक्तवास गणेशजी का स्मरण करे; पहला नाम ‘वक्रतुण्ड’ है, दूसरा ‘एकदन्त’ है, तीसरा ‘कृष्णपिंगाक्ष’ है, चौथा ‘गजवक्त्र’ है, पाँचवाँ ‘लम्बोदर’, छठा ‘विकट’, सातवाँ ‘विघ्नराजेन्द्र’, आठवाँ ‘घूम्रवर्ण’, नवाँ ‘भालचन्द्र’, दसवाँ ‘विनायक, ग्यारहवाँ ‘गणपति’ और बारहवाँ नाम ‘गजानन’ है। जो मनुष्य सबेरे, दोपहर और सायं तीनों संध्याओं के समय प्रतिदिन इन बारह नामों का पाठ करता है, उसे विघ्न का भय नहीं होता। यह नाम-स्मरण उसके लिये सभी सिद्धियों का उत्तम साधक है। इन नामों के जप से विद्यार्थी विद्या, धनार्थी धन, पुत्रार्थी अनेक पुत्र और मोक्षार्थी मोक्ष पाता है। इस गणपतिस्तोत्रका नित्य जप करे। जपकर्ता को छः महीने में अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। एक वर्ष तक जप करने से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। जो इस स्तोत्र को लिखकर आठ ब्राह्मणों को अर्पित करता है, उसे गणेशजी की कृपा से सम्पूर्ण विद्या की प्राप्ति होती है।


श्रीगणेशजी की आरती


आरती गजबदन विनायककी। सुर-मुनि-पूजित गणनायककी।। टेक।।
एकदंत शशिभाल गजानन, विघ्नविनाशक शुभगुण कानन,
शिवसुत वन्द्यमान-चतुरानन, दुःखविनाशक सुखदायक की।।सुर.।।
ऋद्धि-सिद्धि-स्वामी समर्थ अति, विमल बुद्धि दाता सुविमल-मति,
अघ-वन-दहन अमल अबिगत गति, विद्या-विनय-विभव-दायककी।।सुर.।।
पिंगलनयन, विशाल शुंडधर, धूम्रवर्ण शुचि वज्रांकुश-कर,
लम्बोदर बाधा-विपत्ति-हर, सुर-वन्दित सब विधि लायककी।।सुर.।।


वक्रतुण्ड



वक्रतुण्डावतारश्च देहानां ब्रह्मधारकः।
मत्सरासुरहन्ता स सिंहवाहनगः स्मृतः।।


भगवान् श्रीगणेश का ‘वक्रतुण्डावतार’ ब्रह्मरूप से सम्पूर्ण शरीरों को धारण करनेवाला, मत्सरासुर का वध करनेवाला तथा सिंहवाहन पर चलनेवाला है।

मुद्गल पुराण के अनुसार भगवान् गणेश के अनेकों अवतार हैं, जिनमें आठ अवतार प्रमुख हैं। पहला अवतार भगवान् वक्रतुण्ड का है। ऐसी कथा है कि देवराज इन्द्र के प्रमाद से मत्सरासुर का जन्म हु्आ। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से भगवान् शिवके पञ्चाक्षरी मन्त्र (ऊँ नमः शिवाय) की दीक्षा प्राप्त कर भगवान् शंकर की कठोर तपस्या की भगवान् शंकर ने प्रसन्न होकर उसे अभय होने का वरदान दिया।

वरदान प्राप्त कर जब मत्सरासुर घर लौटा तब शुक्राचार्य ने उसे दैत्यों का राजा बना दिया। दैत्यमन्त्रियों ने शक्तिशाली मत्सर को विश्व, विजय की सलाह दी। शक्ति और पद के मद से चूर मत्सरासुर ने अपनी विशाल सेना के साथ पृथ्वी के राजाओं पर आक्रमण कर दिया। कोई भी राजा महान् असुर के सामने टिक नहीं सका। कुछ पराजित हो गये और कुठ प्राण बचाकर कन्दराओं में छिप गये। इस प्रकार सम्पूर्ण पृथ्वी पर मत्सरासुर का शासन हो गया।

पृथ्वी को अपने अधीन कर उस महापराक्रमी दैत्य ने क्रमशः पाताल और स्वर्ग पर भी चढ़ाई कर दी। शेष ने विनयपूर्वक उसके अधीन रहकर उसे कर देना स्वीकार कर लिया। वरुण, कुबेर, यम आदि समस्त देवता उससे पराजित होकर भाग गये। इन्द्र भी उसके सम्मुख नहीं टिक सके। मत्सरासुर स्वर्ग का भी सम्राट हो गया।


असुरों से दुःखी देवताब्रह्मा और विष्णु भगवान् को साथ लेकर कैलास पहुँचे। उन्होंने भगवान् शंकर को दैत्यों के अत्याचार का सारा समाचार सुनाया। भगवान् शंकरने मत्सरासुर के इस दुष्कर्म की घोर निन्दा की। यह समाचार सुनकर मत्सरासुर ने कैलास पर भी आक्रमण कर दिया। भगवान् शिव से उसका घोर युद्ध हुआ। परन्तु, त्रिपुरारि भगवान् शिव भी उसके समक्ष नहीं ठहर सके। उसने उन्हें भी कठोर पाश में बाँध लिया और कैलाश का स्वामी बनकर वहीं रहने लगा। चारों तरफ दैत्यों का अत्याचार होने लगा।

दुःखी देवताओं के सामने मत्सरासुर के विनाश का कोई मार्ग नहीं बचा। वे अत्यन्त चिन्तित और दुर्बल हो रहे थे। उसी समय वहाँ भगवान दत्तात्रेय आ पहुँचे। उन्होंन देवताओं को वक्रतुण्ड के एकाक्षरी मन्त्र (गं) का उपदेश किया। समस्त देवता भगवान् वक्रतुण्ड के ध्यान के साथ एकाक्षरी मन्त्र का जप करने लगे। उनकी आराधना से सन्तुष्ट होकर तत्काल फलदाता वक्रतुण्ड प्रकट हुए। उन्होंने देवताओंसे कहा—‘आप लोग निश्चिन्त हो जायँ। मैं मत्सरासुर के गर्व को चूर-चूर कर दूँगा।’
भगवान् वक्रतुण्ड ने अपने असंख्य गणों के साथ मत्सरासुर के नगरों को चारों तरफ से घेर लिया। भयंकर युद्ध छिड़ गया। पाँच दिनों तक लगातार युद्ध चलता रहा। मत्सरासुर के सुन्दरप्रिय एवं विषयप्रिय नामक दो पुत्र थे वक्रतुण्ड के दो गणों ने उन्हें मार डाला। पुत्र-वध से व्याकुल मत्सरासुर रणभूमि में उपस्थित हुआ। वहाँ से उसने भगवान् वक्रतुण्ड को तमाम अपशब्द कहे। भगवान् वक्रतुण्ड ने प्रभावशाली स्वर में कहा ‘यदि तुझे प्राणप्रिय हैं तो शस्त्र रखकर मेरी शरण में आ जा नहीं तो निश्चित मारा जायगा।’

वक्रतुण्ड के भयानक रूप को देखकर मत्सरासुर अत्यन्त व्याकुल हो गया। उसकी सारी शक्ति क्षीण हो गयी। भयके मारे वह काँपने लगा तथा विनयपूर्वक वक्रतुण्ड की स्तुति करने लगा। उसकी प्रार्थना से सन्तुष्ट होकर दयामय वक्रतुण्ड ने उसे अभय प्रदान करते हुए अपनी भक्ति का वरदान किया तथा शान्त जीवन बिताने के लिये पाताल जाने का आदेश दिया। मत्सरासुर से निश्चिन्त होकर देवगण वक्रतुण्ड की स्तुति करने लगे। देवताओं को स्वतन्त्र कर प्रभु वक्रतुण्ड ने उन्हें भी अपनी भक्ति प्रदान की।


एकदन्त


एकदन्तावतारौ वै देहिनां ब्रह्मधारकः।
मदासुरस्य हन्ता स आखुवाहनगः स्मृतः।।


भगवान् गणेश का ‘एक दन्तावतार’ देहि-ब्रह्मधारक है, वह मदासुरका वध करनेवाला है; उसका वाहन मूषक बताया गया है।

मदासुर नाम का एक बलवान् पराक्रमी दैत्य था। वह महर्षि च्यवन का पुत्र था। एक बार वह अपने पिता से आज्ञा लेकर दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास गया। उसने शुक्राचार्य से कहा कि आप मुझे कृपापूर्वक अपना शिष्य बना लें मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वामी बनना चाहता हूँ। आप मेरी इच्छा पूरी करने के लिये मेरा उचित मार्गदर्शन करें। शुक्राचार्य ने सन्तुष्ट होकर उसे अपना शिष्य बना लिया। सर्वज्ञ आचार्य ने उसे विधिसहित एकाक्षरी (ह्रीं) शक्तिमन्त्र दिया।

मदासुर अपने गुरुदेव के चरणों में प्रणाम कर जंगल में तप करने के लिये चला गया। उसने भगवती का ध्यान करते हुए एक हजार वर्षों तक कठोर तप किया। यहाँ तक कि उसका शरीर दीमकों की बाँबी बन गया। उसके चारों ओर वृक्ष उग गये और लताएँ फैल गयीं। उसके कठोर तपसे प्रसन्न होकर भगवती प्रकट हुईं। माताजी ने उसे नीरोग रहने तथा निष्कंटक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का राज्य प्राप्त होने का वरदान दिया।

मदासुरने पहले सम्पूर्ण धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। फिर स्वर्ग पर चढ़ाई की। इन्द्रादि देवाताओं को जीत कर वह स्वर्ग का भी शासक बन बैठा। उसने प्रमदासुर की कन्या सालसा से विवाह किया। उससे उसे तीन पुत्र हुए। उसने शूलपाणि भगवान् शिव को पराजित कर दिया। सर्वत्र असुरों का क्रूरतम शासन चलने लगा। पृथ्वीपर समस्त धर्म-कर्म लुप्त हो गये। देवताओं एवं मुनियों के दुःख की सीमा न रही। सर्वत्र हाहाकार मच गया।

चिन्तित देवता सनत्कुमार के पास गये तथा उनसे उस असुर के विनाश एवं धर्म-स्थापना का उपाय पूछाः सनत्कुमार ने कहा —‘देवगण आप लोग श्रद्धापूर्वक भगवान् एकदन्त की उपासना करें। वे सन्तुष्ट होकर अवश्य ही आपलोगों का मनोरथ पूर्ण करेंगे।’ महर्षि के उपदेशानुसार देवगण एकदन्त की उपासना करन लगे। तपस्या के सौ वर्ष पूरे होने पर मूषक वाहन भगवान् एकदन्त प्रकट हुए तथा वर माँगने के लिये कहा। देवताओंने निवेदन किया—‘प्रभो ! मदासुर के शासन में देवगण स्थानभ्रष्ट और मुनिगण कर्मभ्रष्ट हो गये हैं। आप हमें इस कष्ट से मुक्ति दिलाकार अपनी भक्ति प्रदान करें।’

उधर देवर्षिने मदासुर को सूचना दी कि भगवान् एकदन्त ने देवताओं को वरदान दिया है। अब वे तुम्हारा प्राण-हरण करने के लिये तुमसे युद्ध करना चाहते हैं। मदासुर अत्यन्त कुपित होकर अपनी विशाल सेना के साथ एकदन्त से युद्ध करने चला। भगवान् एकदन्त रास्ते में ही प्रकट हो गये। राक्षसों ने देखा कि भगवान् एकदन्त सामने से चले आ रहे हैं। वह मूषक पर सवार हैं। उनकी आकृति अत्यन्त भयानक है। उनके हाथोंमें परशु, पाश आदि आयुध हैं। उन्होंने असुरों से कहा कि तुम अपने स्वामी से कह दो यदि वह जीवित रहना चाहता है तो देवताओं से द्वेष छोड़ दे। उनका राज्य उन्हें वापस कर दे। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो मैं निश्चित ही उसका वध करूँगा। महाक्रूर मदासुर युद्ध के लिये तैयार हो गया जैसे-ही उसने अपने धनुष पर बाण चढ़ाना चाहा कि भगवान् एकदन्त का तीव्र परशु उसे लगा और वह बेहोश होकर गिर गया।

बेहोशी टूटने पर मदारसुर समझ गया कि यह सर्वसमर्थ परमात्मा ही हैं। उसने हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए कहा कि प्रभो ! आप मुझे क्षमा कर अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें। एकदन्त ने प्रसन्न होकर कहा कि जहाँ मेरी पूजा आराधना हो, वहाँ तुम कदापि मत जाना। आजसे तुम पाताल में रहोगे। देवता भी प्रसन्न होकर एकदन्त की स्तुति करके अपने लोक चले गये।


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