मोहन - गीताप्रेस 871 Mohan - Hindi book by - Gitapress
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मोहन

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :19
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 870
आईएसबीएन :81-293-0679-4

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प्रस्तुत पुस्तक में मोहन के रुपों का वर्णन...

Mohan - A Hindi Book by Gitapress - मोहन - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ब्रह्माजी का मोह-भंग

एक बार भगवान् श्रीकृष्ण ग्वालबालों के साथ भोजन कर रहे थे। उनके बछड़े हरी-हरी घास के लालच में घने जंगल में दूर चले गये। जब ग्वालबालों का ध्यान बछड़ों की तरफ गया, तब वे भयभीत हो गये। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- ‘मित्रो ! चिन्ता न करो। तुम लोग भोजन करो। मैं अभी तुम्हारे बछड़ों को ढूँढ़कर ला देता हूँ।
श्रीकृष्ण ग्वालबालों से इस प्रकार कहकर बछड़ों को ढूँढने चल दिये। उस समय ब्रह्माजी भी वहाँ उपस्थित थे। भगवान् को ग्वालबालों के साथ विचित्र लीला करते हुए देखकर उनके मन में मोह हो गया। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने के लिये बछड़ों को चुरा लिया और जब भगवान् श्रीकृष्ण बछड़ों को ढूँढ़ने चले गये तो ब्रह्माजी ने ग्वाल बालों को चुराकर किसी गुफा में छिपा दिया।

भगवान् श्रीकृष्ण बछड़े न मिलने पर यमुना के तट पर लौट आये, परन्तु वहाँ देखते हैं कि ग्वालबाल भी नहीं है। वह तुरन्त जान गये कि यह ब्रह्माजी की करतूत है। अब भगवान् श्रीकृष्ण अपने-आपको ग्वालबालों तथा बछड़ों के रूप में बना लिया। जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने ग्वालबालों तथा बछड़ों के रूप में नन्द आदि की गोशालाओं में प्रवेश किया तो कोई भी उन्हें पहचान न सका। गायें भी श्रीकृष्णरूप अपने-अपने बछड़ों को दूने स्नेह से चाटने और दूध पिलाने लगीं। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण प्रतिदिन ग्वालबालों तथा बछड़ों के रूप में वन जाते और सन्ध्या के समय लौट आते। इस तरह पूरे एक वर्ष का समय बीत गया।

जब ब्रह्माजी ब्रह्मलोक से लौटे तो उन्होंने श्रीकृष्ण को ग्वालबालों और बछड़ों के साथ पहले की भाँति क्रीड़ा करते हुए देखा। वे सोचने लगे कि ग्वालबालों और बछड़ों को तो मैंने चुराकर अपनी माया से अचेत करके गुफा में बन्द कर दिया था, वे अबतक वहाँ सो रहे हैं, फिर उतने ही दूसरे बालक तथा बछड़े कहाँ से आ गये।

ब्रह्माजी अपनी माया से भगवान् श्रीकृष्ण को मोहित करने चले थे, परन्तु स्वयं मोहित हो गये। उनके देखते-ही-देखते सभी ग्वालबाल और बछड़े श्रीकृष्ण के रूप में दिखायी पड़ने लगे। यह अत्यन्त आश्चर्यमय दृश्य देखकर ब्रह्माजी चकित रह गये। वे भगवान् श्रीकृष्ण के तेज से निस्तेज होकर मौन रह गये। उनकी आँखें मुँद गयीं।
भगवान् श्रीकृष्ण ने ब्रह्माजी की असमर्थता को देखकर अपनी माया का परदा हटा लिया, तब जाकर ब्रह्माजी को बाह्यज्ञान हुआ। ब्रह्माजी ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण जैसे पहले ग्वालबालों और बछड़ो को ढूँढ़ रहे थे, वैसे आज भी ढूँढ रहे हैं। वे अपने हंस पर से कूद पडे़ भगवान् श्री कृष्ण के चरणों में दण्ड की तरह गिर पड़े। उनकी आँखों से अश्रुधारा गिरकर भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों को भिगोने लगी। फिर बड़ी नम्रता से हाथ जोड़कर उन्होंने अपने अपराध के लिये क्षमा माँगी तथा ग्वालबालों और बछड़ों को लौटा दिया। अन्त में श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए ब्रह्मलोक चले गये।

कालिय नागपर कृपा


यमुनाजी में एक बहुत गहरा कुण्ड था। उसमें कालिय नाग रहता था। यमुना का जल कालिय नाग की विष की गर्मी से खौलता रहता था। यहाँ तक कि उसके ऊपर उड़ने वाले पक्षी भी झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे। जो भी मनुष्य या पशु वहाँ का जल पीते, तुरन्त मर जाते थे।
भगवान् का अवतार तो दुष्टों के संहार के लिये ही होता है। भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि कालिय नाग के विष का वेग बड़ा ही भयंकर है और उसके कारण यमुना जी दूषित हो गयी हैं। मुझे इस सर्प के भय से व्रजवासियों और यमुनाजी को मुक्ति दिलानी चाहिये। यह सोचकर, श्रीकृष्ण एक ऊँचे कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गये और वहाँ से उस विषैले जल में कूद पड़े।

जब कालिय नाग ने देखा कि कोई मेरे निवास स्थान में घुस आया है तो वह चिढ़कर सामने आ गया। उसने देखा कि उसके सामने एक साँवला-सलोना बालक है। उसके वक्ष:स्थल पर श्रीवत्सका चिह्न है। वह विषैले जल में बिना भयभीत हुए आनन्द से खेल रहा है। इस कालिय नाग का क्रोध बढ़ गया। उसने श्रीकृष्ण के शरीर को अपने बन्धन में जकड़ लिया।

जब गोप-गोपिकाओं ने देखा कि उनके प्रियतम श्रीकृष्ण को कालिय नाग ने जकड़ लिया है तो उनके प्राण मानों कण्ठ पर आ गये। उनकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गयी। माता यशोदा तो अपने लाड़ले लाल के कालिय दह में कूदने जा रही थीं, परन्तु गोपियों ने उन्हें पकड़ लिया।

साँप के शरीर में बँध जाना तो भगवान् की एक लीला थी। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि सारे लोग मेरे लिये दु:खी हो रहे हैं तो उन्हेंने अपना शरीर फुलाना शुरू कर दिया। इससे साँपका शरीर टूटने लगा। वह श्रीकृष्ण को छोड़कर क्रोध से फुफकारें मारने लगा। उस समय उनके मुख से आग की लपटें निकल रही थीं। भगवान् श्रीकृष्ण उसके साथ खेलते हुए पैंतरा बदलने लगे। साँप भी उनपर चोट करने का दाँव देखते हुए पैंतरा बदलने लगा।

अचानक भगवान् श्रीकृष्ण कूदकर कालिय नाग के फणोपर सवार हो गये तथा नृत्य करने लगे। कालिय नाग एक सौ फण थे। वह जिस फण को उठाता भगवान् अपने पैरों की चोट से उसे कुचल डालते। इससे कालिय नाग की शक्ति क्षीण हो गयी और वह अपने नथुनों से खून उगलने लगा। उसका एक-एक अंग चूर हो गया। अब उसे जगत् के आदिशक्ति भगवान् नारायण की स्मृति हुई। अपने यह पति की दशा देखकर उसकी पत्नियाँ भगवान् की स्तुति करने लगीं।
कालिय नाग ने भी भगवान् की स्तुति करते हुए कहा- ‘प्रभो ! हम जन्म से ही दुष्ट और बड़े क्रोधी जीव हैं। हम आपकी माया के चक्कर में मोहित हो रहे हैं। आप ही हमारे स्वभाव और माया के आदिकारण हैं। हम आपकी शरण में हैं। आप अपनी इच्छानुसार जैसा ठीक समझें- हम पर कृपा कीजिये या दण्ड दीजिए। भगवान् ने उसे क्षमा कर रमणक द्वीप भेज दिया और यमुना के जल को विषहीन तथा अमृत के समान मधुर बना दिया। श्रीकृष्ण को पाकर व्रजवासियों के तो मानो प्राण ही लौट आये।

दावाग्नि-पान


एक बार ग्वालबाल अपनी गायों को चरती हुई छोड़कर भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम के साथ खेल-कूद में लग गये। उस समय उनकी गौएँ बेरोक-टोक चरती हुई बहुत दूर निकल गयीं और हरी-हरी घास के लोभ में एक गहन वन में घुस गयीं। जब ग्वालबालों ने देखा कि हमारे पशुओं का तो कहीं पता-ठिकाना ही नहीं है तो उन्हें अपने खेल-कूदपर बड़ा पछतावा होने लगा। बहुत प्रयास करने पर भी वे अपनी गायों का पता न लगा सकें।

गौएँ ही तो व्रजवासियों की जीविका का साधन थीं, उनके न मिलने पर सभी ग्वालबाल अचेत-से हो गये। फिर वे गौओं के खुर का निशान देखते हुए तथा उनका पता लगाते हुए आगे बढ़े। अन्त में उन्होंने देखा कि उनकी गायें सरकण्डों के वन में रास्ता भूलकर डकार रही हैं। वे सब गौओं को लेकर लौटने लगे। उस समय सारे ग्वालबाल बिलकुल थक गये थे। उन्हें जोर से प्यास लगी हुई थी। इससे सब-के-सब व्याकुल हो रहे थे। उनकी यह दशा देखकर भगवान् श्रीकृष्ण गौओं का नाम लेकर पुकारने लगे। गौएँ अपने नाम की ध्वनि सुनकर हुंकारने और रँभाने लगीं। उसी समय वन में भयंकर दावाग्नि लग गयी, जो वनवासी जीवों का काल होती है। बड़ी जोर की आँधी चलकर उस अग्नि के बढ़ने में सहायता देने लगी। सब ओर फैलता प्रचण्ड दावाग्नि वनवासी जीवों को भस्म करने लगी। चारों तरफ जीवों की चीख पुकार से कोहराम मच गया। शेर-चीते, भालू आदि वन्य जीव, जो जिधर रास्ता पाते थे, परस्पर वैर भूलकर भागने लगे।

जब ग्वालबालों और गौओं ने दावानल को अपनी ओर बढ़ते हुए देखा, तब वे सब अत्यन्त भयभीत हो गये। मृत्यु से भयभीत ग्वालबाल भगवान् श्रीकृष्ण-बलराम को घेरकर प्राण-रक्षा की प्रार्थना करने लगे। उन्होंने कहा- ‘प्यारे श्रीकृष्ण ! हम सब तुम्हारी शरण में है। हम दावानल से जलना नही चाहते हैं। हमें जल्दी बचाओं। हम लोग भाई-बन्धु, मित्र, रक्षक सब तुम्हें ही मानते हैं। श्यामसुन्दर ! तुम्हारे सिवा कोई भी हमारा रक्षक नहीं है। हमें केवल तुम्हारा ही भरोसा है।
अपने सखा ग्वालबालों के दीन वचन सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा- ‘मित्रो ! चिन्ता मत करो। मैं तुम लोगों की अवश्य ही रक्षा करूँगा। तुम सब अपनी आँखें बंद कर लो।’

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