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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
एक दूसरी कठिनाई को हल करना इतना आसान नहीं होगा। जब आप लक्षणनिर्वचनों की एक
पूरी श्रेणी पर विचार करते हैं, तब सम्भवतः आपकी पहली राय यह होगी कि यौन
स्थानापन्न परितुष्टि के अवधारण को अधिक-से-अधिक विस्तृत करने पर ही वे लक्षण
उसके अन्तर्गत आ सकते हैं। आप यह भी अवश्य कहेंगे कि इन लक्षणों से परितुष्टि
के बारे में कोई यथार्थ बात सामने नहीं आती, कि प्रायः वे किसी संवेदन की
पुनरुज्जीवित करने या किसी यौन ग्रन्थि से पैदा होने वाली कल्पना-सृष्टि का
निर्माण करने तक ही सीमित रहते हैं। इसके अलावा, आप यह भी कहेंगे कि प्रायः
यौन परितुष्टि का दृश्य रूप शैशवकालीन और अनुचित रूप जैसा होता है। शायद वह
हस्तमैथुन-कार्य से मिलता-जुलता होता है, या उन गन्दी आदतों की याद दिलाने
वाला होता है जो बचपन में बहुत पहले निषिद्ध की गई थी, और छोड़ दी गई थीं; और
फिर आप इस बात पर आश्चर्य करेंगे कि कोई व्यक्ति उन बातों को भी यौन
परितुष्टियों में गिनता है जिन्हें क्रूर या भयंकर क्षुधाओं की तृप्ति कहा जा
सकता है, या उन्हें अस्वाभाविक या अप्राकृत कहा जा सकता है। सच बात यह है कि
इन पीछे वाली बातों पर हम तब तक एकमत नहीं हो सकते, जब तक हमने मनुष्य की यौन
प्रवृत्ति पर विचार न कर लिया हो और यह तय न कर लिया हो कि किस प्रवृत्ति को
यौन प्रवृत्ति कहना उचित है।
व्याख्यान
20
मनुष्य का यौन जीवन
आपके मन में निश्चित रूप से यही बात आती होगी कि 'यौन' (या कामात्मक) शब्द के
अर्थ पर कोई सन्देह नहीं हो सकता। निःसन्देह, इसका सबसे पहला अर्थ है
'अनुचित', अर्थात् जिसकी चर्चा नहीं करनी चाहिए। मुझे एक प्रसिद्ध
मनश्चिकित्सक के कुछ छात्रों के विषय में एक कहानी सुनाई गई है : इन छात्रों
ने एक बार अपने गुरु को यह निश्चय कराने की कोशिश की कि हिस्टीरिया रोगी के
लक्षण बहुत बार यौन बातों को निरूपित करते हैं। इस उद्देश्य से वे उसे
हिस्टीरिया वाली एक स्त्री के पलंग के पास ले गए जिसके दौरे प्रसव के
असंदिग्ध अनुकरण थे। पर वह बोला 'लेकिन प्रसव में यौन कहीं नहीं है।' निश्चय
जानिए कि प्रसव सदा अनुचित नहीं होता।
मैं समझ रहा हूं कि आप ऐसे गम्भीर मामलों पर मेरे मना करने को अच्छा नहीं
समझते। पर यह सिर्फ मज़ाक नहीं है। गम्भीरता से सोचने पर हम देखते हैं कि यह
बताना आसान नहीं कि यौन शब्द के अन्तर्गत क्या-क्या बातें आती हैं। शायद इसकी
यही परिभाषा ठीक हो सकती है कि दोनों लिंगों के अन्तर या भेद से सम्बन्धित
प्रत्येक बात यौन बात है। पर आप यह कहेंगे कि यह बात बहुत व्यापक, अनिश्चित
परिभाषा हुई। यदि आप मैथुन या सम्भोग-कार्य को केन्द्रबिन्दु मान लें तो शायद
आप यौन का अर्थ यह करेंगे कि प्रत्येक वह बात जो विपरीत लिंग वाले के शरीर
(और विशेष रूप से मैथुन के अंगों) से सुखदायक परिपुष्टि प्राप्त करने से
सम्बन्ध रखती है; बहुत संकुचित अर्थ में वह प्रत्येक बात यौन बात है, जिसका
लक्ष्य जननेन्द्रियों का मिलन और मैथुन-कार्य की परिपूर्ति है। पर यह परिभाषा
करते हुए आपने यौन तथा अनुचित को करीब-करीब एक ही मान लिया है, और इस अवस्था
में प्रसव का यौन प्रवृत्ति (काम) से सचमुच कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहेगा। फिर
यदि आप प्रजनन के कार्य को यौनवृत्ति का सारतत्त्व मानते हैं तो हस्तमैथुन या
चुम्बन जैसी बहुत सारी बातें, जिनका उद्देश्य प्रजनन नहीं होता, पर फिर भी
निस्सन्देह यौन प्रवृत्तियां हैं, इससे बाहर रह जाएंगी। पर हम पहले देख चुके
हैं कि परिभाषा करने की कोशिश से सदा कठिनाइयां पैदा होती हैं। इसलिए इस
मामले में हमें कोई अच्छी परिभाषा करने की कोशिश छोड़ ही देनी चाहिए। हम यह
मान सकते हैं कि 'यौन' (या कामात्मक) अवधारणा बनते हुए कोई ऐसी बात हुई है
जिसके परिणामस्वरूप, एच० सिलबरर के शब्दों में, 'व्याप्ति दोष' हो गया है। सच
बात तो यह है कि यौन का अर्थ हम अच्छी तरह जानते हैं।
जनसाधारण की दृष्टि से, जो सामान्य जीवन में सब व्यावहारिक प्रयोजनों के लिए
काफी है, यौन वह चीज़ है जिसमें लिंग-भेद, आनन्दजनक उत्तेजना और परितुष्टि,
प्रजनन-कार्य अनुचित की धारणा और छिपाने की आवश्यकता सम्बन्धी सब बातें
इकट्ठी आ जाती हैं। पर विज्ञान के लिए अब इतना ही काफी नहीं है। कारण कि
परिश्रम से की गई गवेषणाओं से (जो आत्मत्याग से पोषित आत्मसंयम की भावना से
ही हो सकती हैं) यह प्रकट हुआ है कि मनुष्य जाति में ऐसे वर्ग भी हैं जिनका
यौन जीवन प्रचलित यौन जीवन से बहुत अधिक भिन्न है। इन 'विकृतों'1 के एक समूह
ने मानो अपने जीवन-क्रम में से लिंगों के भेद को निकाल बाहर कर दिया है। इन
लोगों में अपने समान लिंग के व्यक्ति से ही यौन इच्छा पैदा हो सकती है। उसके
लिए दूसरे लिंग का (विशेष रूप से दूसरे लिंग वाले की जननेन्द्रिय का) ज़रा भी
यौन आकर्षण नहीं है, और कुछ पराकाष्ठा वाले उदाहरणों में वह उनकी घृणा की
वस्तु हो सकती है। इस प्रकार, उन्होंने प्रजनन के प्रक्रम को बिलकुल छोड़
दिया है। ये व्यक्ति समकामी या समलिंग कामी2 कहलाते हैं। प्रायः, (पर सदा
नहीं) वे ऐसे नरनारी होते हैं जो बौद्धिक दृष्टि से और आचार की दृष्टि से
मानसिक वृद्धि और परिवर्धन के बहुत ऊंचे स्तर पर पहुंच चुके हैं, और उनमें एक
यही अजीब विशेषता होती है। अपने वैज्ञानिक प्रवक्ताओं के ज़रिये वे यह दावा
करते हैं कि हम मानव जाति की एक विशेष किस्म 'तीसरा लिंग' हैं जिसे शेष दो
लिंगों के बराबर ही अधिकार हैं। शायद हम आगे इन दोनों की समीक्षा करें। वे
निःसन्देह मनुष्य जाति का 'श्रेष्ठ अंश' नहीं हैं, जैसा कि वे खुशी से मानते
हैं। उनमें भी कम-से-कम उतने ही घटिया और बेकार लोग हैं जितने दूसरे प्रकार
की यौनप्रवृत्ति वालों में।
ये विकृत लोग अपनी अभिलाषाओं के आलम्बनों से प्रायः वही लक्ष्य पूरे करना
चाहते हैं जो प्रकृत लोग अपनी अभिलाषाओं के आलम्बनों से करते हैं। पर इनके
पीछे अप्रकृत प्ररूपों की एक लम्बी श्रेणी है जिनमें काम-चेष्टाएं ऐसी
वस्तुओं से अधिकाधिक दूर होती जाती हैं जो किसी बुद्धियुक्त प्राणी को आकर्षक
प्रतीत होती हैं। उनकी विविधता और विचित्रता की दृष्टि से इन प्ररूपों की
तुलना उन विकट जीवों से की जा सकती है जिन्हें पी० ब्रायडगाल ने सेंट एन्थनी
के प्रलोभन को निरूपित करने के लिए चित्रित किया है. या उन बडढे देवताओं और
उपासकों के लम्बे जुलूस से की जा सकती है जो प्रस्ताव फ्लाबेयर ने अपने
धार्मिक प्रायश्चित्त करने वाले पात्र के सामने से गुज़रता दिखाया है। इसकी
तुलना और किसी चीज़ से नहीं की जा सकती। इस अव्यवस्थित जमघट को कुछ समझना है,
तो इसका वर्गीकरण आवश्यक है। हम उन्हें दो भागों में बांटते हैं : पहले वे
जिनमें काम का आलंबन बदल गया है, जैसा कि समकामियों में हुआ, और दूसरे वे
जिनमें सबसे मुख्य बात यह हुई कि काम का उद्देश्य बदल गया है। पहले समूह में
वे लोग आते हैं जिन्होंने जननेन्द्रियों के परस्पर मिलन को छोड़ दिया है, और
जिन्होंने काम-क्रिया के एक साथी में जननेन्द्रियों के स्थान पर कोई और अंग
या शरीर का भाग (योनि के स्थान पर मुख या गुदा) को रख लिया है, और इसमें होने
वाली शारीरिक कठिनाइयों और विरक्ति के निवारण को भुला दिया है। इसके बाद, वे
लोग हैं जिन्होंने जननेन्द्रियों को आलम्बन तो बनाया हुआ है, पर उसके मैथुन
सम्बन्धी कार्य के कारण नहीं, बल्कि उन दूसरे कार्यों के कारण जिनमें वे शरीर
की दृष्टि से, या उनकी संसक्तता, अर्थात् सबसे अधिक पास होने, के कारण शामिल
होती हैं। इन लोगों को देखने ये यह पता चलता है कि मल-विसर्जन, अर्थात्
टट्टी-पेशाब के कार्य, जिन्हें बच्चे के पालन-पोषण के समय गन्दा या अशिष्ट
मान लिया जाता है, सम्पूर्ण यौन दिलचस्पी आकर्षित करने में समर्थ बने रहते
हैं। कुछ और लोग ऐसे हैं जिन्होंने जननेन्द्रियों को अपना आलम्बन बनाना पूरी
तरह छोड़ दिया है, और इसके बदले शरीर के किसी दूसरे भाग को अपनी इच्छा का
आलम्बन बना लिया है, जैसे स्त्री की छाती, या बालों की लट। कुछ लोग ऐसे हैं
जिनके लिए शरीर का हिस्सा भी निरर्थक है, और कोई कपड़े का टुकड़ा या जूता या
अन्दर पहनने का कपड़ा उनकी सब इच्छाओं की परितुष्टि कर देता है। ये लोग
जड़ासक्त1 कहलाते हैं। आगे चलकर वे लोग आते हैं, जो सारे आलम्बन की कामना
करते हैं; पर इन लोगों की कामना बड़े असाधारण या अजीब रूप ग्रहण कर लेती है,
यहां तक कि वे इसे चेष्टाहीन लाश के रूप में ही हासिल करना चाहते हैं, और
अपनी अपराधी मनोग्रस्तियों से प्रेरित होकर इससे एकात्मता कायम करना, और इस
तरह इसका भोग करना चाहते हैं, पर इन भयंकर बातों का इतना ही वर्णन काफी है।
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1. Perverts
2. Homosexual or Inverts
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