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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
इतना जानने के बाद अब हमें एक सुझाव पर विचार करना चाहिए, जो हमारे सामने
अवश्य पेश किया जाएगा। कहा जाएगा, 'बालकपन की उन अनिश्चित अभिव्यक्तियों को,
जिनमें से बाद के यौन जीवन का परिवर्धन हुआ और जिसे आप स्वयं अनिश्चित मानते
हैं, पहले से यौन प्रवृत्ति का प्रकटन बताने के लिए आपने क्यों कमर कस ली है?
आप उनका कार्यिकी की दृष्टि से वर्णन करके, और सिर्फ इतना कहकर ही क्यों
सन्तुष्ट नहीं हो जाते कि खाली चूसने और मल रोकने जैसे व्यापार छोटे बच्चों
में पहले ही देखे जा सकते हैं, जिससे प्रकट होता है कि वे अपने अंगों से सुख
प्राप्त करते हैं? इस तरह आपको शिशुओं में भी यौन जीवन का अस्तित्व नहीं
मानना पड़ेगा जो हमारी भावनाओं के लिए इतना अरुचिकर है।' इसका मैं यही उत्तर
दे सकता हूं कि मुझे शरीर के अंगों से उत्पन्न सुख के विरुद्ध कुछ नहीं कहना
है। मैं यह जानता हूं कि मैथुन या लैंगिक ऐक्य का सर्वोपरि सुख भी एक शारीरिक
सुख ही है, जो जननेन्द्रिय की चेष्टा से पैदा होता है। पर क्या आप मुझे बता
सकते हैं कि वह शारीरिक सुख, जो शुरू में निष्काम होता है, कब यौन रूप
प्राप्त करता है?-परिवर्धन की अन्तिम कलाओं में तो इसका यौन रूप असंदिग्ध रूप
से होता है। क्या हम इस 'अंग-सुख' के बारे में यौन प्रवृत्ति की अपेक्षा अधिक
जानते हैं? आप कहेंगे कि इसमें यौन रूप तब आ जाता है जब जननेन्द्रियां अपना
कार्य करने लगती हैं; यौन प्रवृत्ति या कामुकता का अर्थ सिर्फ 'जननेन्द्रिय
से सम्बद्ध' है। आप विकतियों की रुकावट को भी यह कहकर पार कर जाएंगे कि उनमें
से अधिकतर में जननेन्द्रियों का सुखोत्तेजन होता है, यद्यपि वह जननेन्द्रियों
के ऐक्य के अलावा दूसरे उपायों से पैदा किया जाता है। यदि आप यौन प्रवृत्ति
की आवश्यक विशेषताओं में से प्रजनन से इसके सम्बन्ध को निकाल दें, क्योंकि
विकृतियों के होने के कारण यह विचार सत्य नहीं सिद्ध होता, और इसके बदले
जननेन्द्रियों की चेष्टा पर अधिक बल दें, तो सचमुच आप बहुत अधिक अच्छी स्थिति
में होंगे। पर तब हममें बहुत अधिक मतभेद नहीं रहेगा। मामला सिर्फ यह रह जाएगा
कि-जननेन्द्रिय बनाम दूसरे अंग। अब आपके पास अधिक मात्रा में मिलने वाले ऐसे
साक्ष्य का क्या उत्तर है कि परितुष्टि के प्रयोजन के लिए जननेन्द्रियों के
स्थान पर, जैसा कि सामान्य चुम्बन में होता है या आवारा जीवन के विकृत कर्मों
या हिस्टीरिया के लक्षणों में होता है, अन्य अंग आ जाते हैं। इस स्नायु-रोग
में प्रायः ऐसा होता है कि उद्दीपन घटनाएं, संवेदन, स्नायु-उद्दीपन2 और खड़ा
होने या दृढ़ीकरण के प्रक्रम भी, जो असल में जननेन्द्रियों से सम्बन्ध रखते
हैं, अपना स्थान छोड़कर शरीर के दूसरे दूर के क्षेत्रों पर पहुंच जाते हैं
(उदाहरण के लिए उनका नीचे से ऊपर सिर और चेहरे पर विस्थापन हो जाता है)। इस
प्रकार आप देखेंगे कि जिन बातों को आप यौन प्रवृत्ति की आवश्यक विशेषताएं
बताते हैं उनमें से कुछ भी नहीं बचा और आपको मेरा अनुसरण करके 'योन' या
'कामुक' के अन्तर्गत बिलकुल बचपन के उन व्यापारों को भी रखना होगा जिनका
उद्देश्य 'अंग-सुख' होता है।
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1. Infantilism
2. Innervation
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