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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद


छठे या आठवें वर्ष से आगे यौन परिवर्धन में स्थिरता या ह्रास दिखाई देता है बहुत ऊंचे सांस्कृतिक स्तर वाले बालकों में इसे गुप्तता-काल कहना उचित होगा, पर यह गुप्तता-काल नहीं भी आ सकता है, और यह भी आवश्यक नहीं कि सारे क्षेत्र में यौन-चेष्टाओं और यौन-दिलचस्पियों में व्याघात हो। तव गुप्तता-काल से पहले होने वाले अधिकतर मानसिक अनभव और उत्तेजन शैशवीय स्मति-व्यवधान या स्मृति-नाश से, जिस पर पहले विचार किया जा चुका है, पराजित हो जाते हैं, जो हमारे आरम्भिक बचपन को हमसे छिपा लेता है, और हमें इसके लिए अपरिचित बना देता है। प्रत्येक मनोविश्लेषण का कार्य है कि वह जीवन के इस भूले हुए काम का स्मृति में लाए। यह कल्पना बलातु होती है कि इस काल के यौन जीवन के आरम्भिक अंश ही इस भूलने के प्रेरक कारण होते हैं; अर्थात् यह विस्मरण दमन का परिणाम होता है। तीसरे वर्ष से बालकों के यौन जीवन में वयस्कों के यौन जीवन से बहुत समानता दिखाई देती हैं। इसमें वयस्कों के यौन जीवन से, जैसा कि हम पहले ही जानते हैं, यह भिन्नता होती है कि इसमें जननेन्द्रियों की प्रधानता वाले स्थायी संगठन का अभाव होता है; विकृत प्रकार के अनिवार्य रूप होते हैं और सारे आवेग में तीव्रता की बहुत कमी होती है। पर यौन परिवर्धन की, या जिसे हम आगे राग-परिवर्धन या लिबिडो-परिवर्धन कहेंगे, उसकी वे कलाएं, जो सिद्धान्ततः सबसे अधिक दिलचस्पी की हैं, इस काल से पहले होती हैं। यह परिवर्धन इतनी तेज़ गति से होता है कि शायद सिर्फ प्रत्यक्ष प्रेक्षण से इसके जल्दी-जल्दी बदलते हुए रूपों का निर्धारण करने में कभी सफलता नहीं हो सकती। स्नायु-रोगों की मनोविश्लेषण द्वारा जांच से इतनी दूर पीछे तक जाना और राग-परिवर्धन की और भी पहले वाली कलाओं को खोजना सम्भव हुआ है। निश्चित ही ये कलाएं सैद्धान्तिक निर्मित मात्र हैं, पर मनोविश्लेषण के अभ्यास से आप देखेंगे कि वे आवश्यक और मूल्यवान निर्मितियां हैं। आप शीघ्र ही समझ जाएंगे कि यह कैसे होता है कि रोग की दशाओं में हम वे घटनाएं देख लेते हैं जिन्हें प्रकृत दशाओं में निश्चित रूप से उपेक्षित कर देते हैं।

इस प्रकार अब हम यह बता सकते हैं कि जननेन्द्रिय क्षेत्र की प्रधानता से पहले बालक का यौन जीवन कौन-कौन से रूप लेता है। इस प्रधानता की तैयारी शुरू से शैशव काल में, गुप्तता-काल से पहले, होती है, और तरुणावस्था में स्थायी रूप से संगठित हो जाती है। इस आरम्भिक काल में एक ढीला-ढाला संगठन होता है जिसे हम प्राग् जननेन्द्रिय' कहेंगे; क्योंकि इस काल में सबसे अधिक प्रमुख जननेन्द्रियों की घटना निसर्ग-वृत्तियां नहीं होतीं, बल्कि पीड़कतोषीय और गुदीय निसर्ग-वृत्तियां होती हैं। अभी पुल्लिंग और स्त्रीलिंग के भेद का कोई महत्त्व नहीं होता। इसके बजाय सक्रिय और निष्क्रिय का विभेद होता है, जिसे यौन ध्रुवत्व का पूर्ण रूप कहा जा सकता है, जिसके साथ बाद में यह जुड़ भी जाता है। इस काल में हमें जननेन्द्रिय कला के दृष्टिकोण से देखने पर जो चीज़ पुल्लिंग प्रतीत होती है, वह आधिपत्य के आवेग की अभिव्यक्ति सिद्ध होती है, जो आसानी से क्रूरता में परिवर्तित हो जाती है। निष्क्रिय उद्देश्य वाले आवेगों का सम्बन्ध गुदा के कामजनक क्षेत्र से होता है, जो इस समय बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। दर्शनेच्छा और कुतूहल के आवेग बड़े प्रबल और सक्रिय होते हैं। जननेन्द्रिय यौन जीवन में वास्तव में इतना ही हिस्सा लेती है कि वह पेशाब विसर्जित करती है। इस काल में घटक-निसर्ग-वृत्तियों को आलम्बनों की कमी नहीं होती, पर आवश्यक नहीं कि ये सब आलम्बन एक आलम्बन में शामिल हों। पीड़कतोषीय-गुदीय संगठन जननेन्द्रिय क्षेत्र की प्रधानता की कला से ठीक पहले वाली अवस्था होती है। बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है कि इसका कितना अंश बाद के अन्तिम ढांचे में जैसे का तैसा कायम रहता है और किन मार्गों से ये घटक-निसर्ग-वृत्तियां नये जननेन्द्रिय संगठन के हित-साधन के लिए प्रयुक्त की जाती हैं। राग-परिवर्धन की पीड़कतोषीय-गुदीय कला के पीछे हमें परिवर्धन की उससे भी आदिम अवस्था की झांकी मिलती है, जिसमें कामजनक मुख्य क्षेत्र का कार्य मुख्य होता है। आप यह अनुमान कर सकते हैं कि (सिर्फ सुख के लिए) चूसने का यौन व्यापार इस अवस्था से ही सम्बन्ध रखता है, और आप उन प्राचीन मिस्रवासियों की समझ की प्रशंसा करेंगे जिन्होंने होरस देवता को भी मुख में उंगली डाले हुए चित्रित किया है। अब्राहम ने हाल में ही अपना गवेषण कार्य प्रकाशित किया है, जिसमें यह दिखाया गया है कि परिवर्धन की इस आदिम मुखीय अर्थात् मुख सम्बन्धी कला के अवशेष बाद के वर्षों के यौन जीवन में भी बचे रहते हैं।

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1. Pre-genital

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