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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
मैं यहां आपको यह चेतावनी दे दूं कि इस बिलकुल अनावश्यक विवाद में आप कोई
पक्ष न लें। वैज्ञानिक मामलों में आमतौर से लोग सत्य का एक पक्ष पकड़ लेते
हैं, और इसी को सम्पूर्ण सत्य मानने लगते हैं और फिर सत्य के अंश के पक्ष में
रहकर शेष सारे अंश के बारे में, जो स्वयं उतना ही सत्य होता है, विवाद किया
करते हैं। इस तरह एक से अधिक टोली मनोविश्लेषण आन्दोलन से पहले ही अलग हो
चुकी है। उसमें से एक सिर्फ, अहंकारमूलक आवेगों को मानती है, और यौन आवेगों
का निषेध करती है। दूसरी टोली जीवन में हुए वास्तविक कार्यों का ही प्रभाव
मानती है, और मनुष्य के पिछले जीवन का प्रभाव नहीं मानती। इस तरह औरों के
अलग-अलग विचार हैं। अब यहां एक और विवादग्रस्त प्रश्न है : स्नायु-रोग
बहिर्जात3 रोग है या अन्तर्जात4?–एक विशेष प्रकार की शारीरिक रचना का
अनिवार्य परिणाम हैं या व्यक्ति के जीवन की कुछ हानिकारण (उपघातीय) घटनाओं से
पैदा होते हैं? खास तौर से, क्या वे रोग की. बद्धता और शेष यौन रचना के कारण
पैदा होते हैं या कुण्ठा अथवा विफलता के दबाव से होते हैं? यह विवाद मुझे
वैसा ही मालूम होता है जैसा यह विवाद कि बालक पिता के जनन-कार्य से पैदा होता
है, या माता के गर्भधारण से। आप यही उत्तर देंगे, जो कि उचित है, कि दोनों
अवस्थाएं समान रूप से आवश्यक हैं। स्नायु-रोगों की आधारभूत अवस्थाएं भी, यदि
बिलकुल वैसी नहीं तो भी उनसे मिलती-जुलती हैं। कारण-कार्य की दृष्टि से
स्नायविक रोग के रोगी एक श्रेणी में आते हैं, जिसमें दो कारक-यौन रचना-और
अनुभूत घटनाएं; अथवा यदि आप इस तरह कहना चाहें, तो रोग की बद्धता और कुण्ठा
इस प्रकार निरूपित होती हैं कि जहां उनमें से एक की प्रधानता होती है, वहां
दूसरा कारक उसी अनुपात में कम प्रमुख होता है। इस श्रेणी या शृंखला के एक
सिरे पर वे चरम रोगी हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है : ये लोग अपने
विषम राग-परिवर्धन के कारण अवश्य रोगी होते; चाहे कुछ भी होता, चाहे वे कुछ
भी अनुभव करते, चाहे जीवन उनके लिए कितना ही सुखद रहा होता। दूसरे सिरे पर वे
रोगी हैं, जिनके लिए बिलकुल विपरीत राय बनेगी-यदि जीवन में उन पर अमुक-अमुक
बोझ न पड़े होते तो वे अवश्य रोग से बच गए होते। इस श्रेणी या श्रृंखला के
मध्यवर्ती रोगों में रोगानुकूलता-कारक (यौन रचना) जीवन की हानिकर घटनाओं से
कभी कम और कभी अधिक मात्रा में मिला रहता है। यदि उन्हें जीवन में अमुक-अमुक
अनुभवों में से न गुजरना पड़ता तो उसकी यौन रचना से उन्हें स्नायु-रोग नहीं
पैदा हुआ होता और यदि राग की रचना दूसरे ढंग से हुई होती तो जीवन के
उतार-चढ़ावों का उन पर उपघातज प्रभाव न पड़ा होता। इस श्रृंखला में शायद मैं
यह स्वीकार कर सकता हूं कि पूर्वप्रवृत्ति वाले कारक का प्रभाव कुछ अधिक होता
है, पर यह बात भी इस बात पर निर्भर है कि स्नायु-रोग की सीमा-रेखा आप कहां
खींचते हैं।
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1. Discharge
2. Predisposition
3. Exogenous
4. Endogenous
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