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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
इस प्रकार स्नायु-रोगों के कारणों की समस्या और अधिक उलझ गई मालूम होती है।
तथ्य तो यह है कि मनोविश्लेषण सम्बन्धी जांच-पड़ताल हमारा एक और कारक से
परिचय कराती है, जिस पर हमने अपनी कारण-श्रृंखला में विचार नहीं किया है. और
जो ऐसे व्यक्ति में बडी अच्छी तरह देखा जा सकता है. जिसका पहले का अच्छा
स्वास्थ्य स्नायु-रोग हो जाने के कारण एकाएक बिगड़ गया हो। इन लोगों में
परस्पर विरोधी इच्छाओं या मानसिक द्वन्द्व के चिह्न सदा पाए जाते हैं।
व्यक्तित्व का एक पक्ष कुछ इच्छाएं रखता है, और दूसरा भाग उनके खिलाफ संघर्ष
करता है और उन्हें मार्ग बताता है। इस तरह के द्वन्द्व के बिना कोई
स्नायु-रोग नहीं होता। हो सकता है कि आपको इसमें कोई विशेष बात दिखाई न दे।
आप जानते हैं कि हम सबके मानसिक जीवन में सदा द्वन्द्व होते रहते हैं, जिनका
फैसला करना पड़ता है। इसलिए ऐसा प्रतीत होगा कि कुछ विशेष दशाएं होने पर ही
यह द्वन्द्व रोगजनक हो सकता है। हम पूछ सकते हैं कि वे दशाएं कौन-सी हैं। इन
रोगजनक द्वन्द्वों में मन से कौन-कौन-से बल हिस्सा लेते हैं या द्वन्द्वों का
अन्य कारणों से क्या सम्बन्ध होता है।
मैं इन प्रश्नों का उत्तर दे सकता हूं जो सन्तोषजनक होंगे, पर शायद संक्षिप्त
रूपरेखामात्र होंगे। यह द्वन्द्व कुण्ठा या विफलता से पैदा होता है, क्योंकि
असन्तुष्ट राग को दूसरे रास्ते और दूसरे आलम्बन तलाश करने की प्रेरणा मिलती
है। तो, इसकी एक शर्त यह है कि ये दूसरे रास्ते और आलम्बन व्यक्तित्व के एक
भाग में नापसन्दगी पैदा करते हैं, जिससे वीटो या अभिषेध अर्थात् उसका निषेध,
पैदा होता है, जो शुरू में सन्तुष्टि के नये रास्ते को व्यर्थ कर देता है।
यहीं से लक्षणों के निर्माण की ओर गति होती है, जिस पर हम बाद में विचार
करेंगे। अस्वीकृत रागात्मक लालसाएं चक्करदार मार्गों से अपने आगे बढ़ने का
तरीका निकाल लेती हैं पर उन्हें प्रतिषेध1 को यह चुंगी चुकानी पड़ती है कि वे
अपना रूप कुछ बदल लेती हैं। ये चक्करदार रास्ते लक्षण-निर्माण के रास्ते हैं।
लक्षण ही नई और स्थानापन्न सन्तुष्टियां हैं, जिनकी आवश्यकता कुण्ठा के कारण
पैदा हुई है।
मानसिक द्वन्द्व का अर्थ एक और तरह से भी बताया जा सकता है : बाहरी कुण्ठा या
विफलता के रोगजनक बनने के लिए आवश्यक है कि बाद में भीतरी कुण्ठा या विफलता
से उसकी पूर्ति हो। जब ऐसा होता है तव निस्सन्देह बाहरी और भीतरी कुण्ठाएं
भिन्न-भिन्न मार्गों और भिन्न-भिन्न आलम्बनों से सम्बन्धित होती हैं, बाहरी
कुण्ठा सन्तुष्टि के एक अवसर को दूर करती है और भीतरी कुण्ठा दूसरे अवसर को
हटाने की कोशिश करती है, और यह दूसरा अवसर ही द्वन्द्व का अखाड़ा बन जाता है।
मैं इस रूप में इसलिए यह बात रख रहा हूं क्योंकि इसमें एक ध्वनितार्थ है।
इसमें यह ध्वनि है कि भीतरी बाधा शुरू में मानव-परिवर्धन की आदिम कलाओं में
मौजूद वास्तविक बाहरी बाधाओं में से पैदा हुई।
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1. Prohibition
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