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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
मैं प्रारम्भ में ही आपको बता दूं की अब्राहम के ये शुरू के विचार
मनोविश्लेषण में मान्य रहे हैं, और मनोरोगों के बारे में हम इन्हीं के आधार
पर विचार करते हैं। धीरे-धीरे हमें इस अवधारणा का अभ्यास हो जाता है कि राग,
जिसे हम कुछ आलम्बनों से जुड़ा हुआ पाते हैं, और जो इन आलम्बनों से कुछ
सन्तुष्टि पाने की इच्छा को प्रकट करता है, इन आलम्बनों को त्याग भी सकता है,
और उनके स्थान पर अहम् को ही स्थापित कर सकता है, और क्रमशः यह विचार अधिक
सुसंगत होता चला गया। राग के इस तरह उपयोग में आने का नाम स्वरति अथवा
नारसिस्सिज़्म हमने पी० नैक द्वारा वर्णित एक काम-विकृति से लिया है, जिसमें
एक वयस्क व्यक्ति वे सब आलिंगन, चुम्बन आदि कार्य अपने ही शरीर पर करता है,
जो वैसे अपने भिन्न यौन आलम्बन पर किए जाते हैं।
तब सोचने पर एकदम यह पता चला कि यदि आश्रय, अर्थात् रोगी को अपने शरीर और
अपने व्यक्तित्व पर इस तरह की बद्धता हो सकती है, तो यह घटना बिलकुल
अपवाद-रूप और निरर्थक नहीं हो सकती। इसके विपरीत, सम्भावना यह है कि यह
स्वरति विश्वव्यापी मूल दशा है, जिससे आलम्बन-प्रेम बाद में पैदा होता है, और
आवश्यक नहीं कि आलम्बन-प्रेम पैदा हो जाने पर स्वरति खत्म ही हो जाए।
आलम्बन-राग के विकास को भी याद रखना ज़रूरी है, जिसमें शुरू में बहुत-से यौन
आवेग शिशु के अपने शरीर पर परितुष्ट किए जाते हैं-जिसे हम आत्मकामिता कहते
हैं-और आत्मकामिता के इस सामर्थ्य के कारण ही यौनवृत्ति यथार्थता-सिद्धान्त
के अनुरूप बनने में पिछड़ी रहती है। इस प्रकार, यह प्रतीत हुआ कि आत्मकामिता
राग की संचरण-दिशा की स्वरति वाली कला का यौन-व्यापार है।
संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि हमने अहम्-राग और आलम्बन-राग के पारस्परिक
सम्बन्ध के बारे में एक विचार बनाया था, जिसे मैं प्राणि-शास्त्र के एक
दृष्टान्त से स्पष्ट कर सकता हूं। जीवन के सरलतम रूपों की कल्पना कीजिए जो
बहुत ही कम भिन्नित1 जीवद्रव्यीय (प्रोटोप्लाज़्मिक) पदार्थों की छोटी-सी
संहति होते हैं। उनमें से कुछ उभार निकलते हैं, जिन्हें स्यूडोपोडिया (या
कूटपाद) कहते हैं, जिनमें जीवद्रव्य (प्रोटोप्लाज्म) बहकर आता है, पर वे अपने
इन उभारों को फिर वापस खींच सकते हैं, और अपने-आपको एक संहति बना सकते हैं।
उभार निकालने की इस घटना की तुलना हम आलम्बनों पर राग के विकिरण से करते हैं,
जबकि राग की अधिकतम मात्रा अभी अहम् के अन्दर ही होगी। हम यह अनुमान करते हैं
कि प्रकृत अवस्थाओं में अहम्-राग बिना कठिनाई के आलम्बन-राग में रूपान्तरित
हो सकता है, और इसे फिर पीछे खींचकर अहम् में लीन किया जा सकता है।
इन अवधारणाओं की सहायता से अब मानसिक अवस्थाओं की एक पूरी की पूरी श्रेणी की
व्याख्या की जा सकती है, या ज़रा और विनीत ढंग से कहा जाए, तो प्रकृत जीवन की
दशाओं का राग-सिद्धान्त की शब्दावली में वर्णन किया जा सकता है; उदाहरण के
लिए 'प्रेम-अनुभूति' की अवस्था अंग-रोगों1 के, और नींद की दशाओं के प्रति
मानसिक रुख। नींद की अवस्था के बारे में हमने यह कल्पना की थी कि इसका आधार
बाहरी जगत् से अपने-आपको हटा लेना, और सो जाने की इच्छा को प्रबल करना है।
हमने देखा था कि रात का मानसिक व्यापार, जो स्वप्नों में प्रकट होता है, सोने
की इच्छा का प्रयोजन पूरा करता है; और इसके अलावा, यह एकमात्र अहममूलक
प्रेरकों से नियन्त्रित होता है। राग-सिद्धान्त के प्रकाश में, हम और आगे
बढ़कर यह कह सकते हैं कि नींद वह अवस्था है जिसमें आलम्बनों के सब आच्छादन,
चाहे वे रागात्मक हों या अहम्मूलक हों, त्याग दिए जाते हैं, और उन्हें फिर
अहम् में खींच लिया जाता है। क्या इससे नींद से मिलने वाली ताज़गी और आम
थकावट के स्वरूप पर नई रोशनी नहीं पड़ती? सोने वाला हर रात जिस अवस्था में
चला जाता है, उसका गर्भाशय के भीतर की स्थिति के आनन्दमय एकान्त से सादृश्य
इस प्रकार मानसिक पहलुओं से पुष्ट और अति स्पष्ट हो जाता है। सोने वाले में
राग-वितरण की आदिम अवस्था (परम स्वरति) फिर पैदा हो जाती है, जिसमें राग और
अहम्-स्वहित अब भी स्वतः स्वावलम्बी 'स्व' में एक और अभिन्न होकर इकट्ठे रहते
हैं।
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1. Differentiated
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