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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
व्याख्यान
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स्थानान्तरण
अब हम अपने विषय की समाप्ति पर पहुंच गए हैं, और आपके मन में एक भाव उठ रहा
होगा, जो आपको बहका सकता है, पर ऐसा मौका नहीं आना चाहिए। सम्भवतः आप सोच रहे
हैं कि निश्चित ही ऐसा नहीं हो सकता कि मनोविश्लेषण की इन सब उलझन-भरी
पहेलियों में से गुज़रने के बाद, मैं आपको मनोविश्लेषण द्वारा चिकित्सा के
बारे में, जिसके आधार पर ही मनोविश्लेषण कार्य किया जा सकता है, बिना कुछ कहे
विदा कर दूंगा। सच तो यह है कि इसके इस पहलू को छोड़ना सम्भव भी नहीं,
क्योंकि इससे सम्बन्धित कुछ घटनाएं आपको एक ऐसे नये तथ्य का पता देंगी; जिसके
ज्ञान के बिना आप उन रोगों को ठीक तरह नहीं समझ सकते, जिन पर हम विचार कर रहे
हैं।
मैं जानता हूं कि आप यह आशा नहीं करते कि चिकित्सा-कार्य के लिए विश्लेषण का
प्रयोग करने की विधि के निर्देश आपको दिए जाएं। आप तो मोटे तौर पर यह जानना
चाहते हैं कि मनोविश्लेषण-चिकित्सा किन साधनों से और उपायों से की जाती है,
और यह जानना चाहते हैं कि इससे क्या सफलता होती है; सचमुच यह. जानने का आपको
अवश्य अधिकार है। फिर भी, मैं आपको यह नहीं बताऊंगा, मैं चाहता हूं कि इसका
पता आप स्वयं लगाएं।
ज़रा सोचिए तो! आप उन अवस्थाओं से लेकर, जिनसे रोग आरम्भ होता है, रोगी मन के
भीतर पैदा होने वाले सब कारकों तक, प्रत्येक आवश्यक बात पहले जान चुके हैं।
इस सबमें चिकित्सा करने का रास्ता कहां है? सबसे पहले वंशगत स्वभाव है-हम
प्रायः इसका उल्लेख नहीं करते, क्योंकि अन्य क्षेत्रों में इस पर बहुत बल
दिया जाता है, और हम इसके बारे में कोई नई बात नहीं जानते। पर यह न समझिए कि
हम इसे कम महत्त्वपूर्ण समझते हैं। चिकित्सक के नाते हम इसकी शक्ति से
सुपरिचित हैं। कुछ भी हो, हम इसे बदलने के लिए कुछ नहीं कर सकते। हमारे लिए
भी यह इस समस्या का स्थिर अंश है जिससे हमारे प्रयत्नों की एक सीमा बन जाती
है। इसके बाद, आरम्भिक बचपन के अनुभवों का प्रभाव है, जिसे हम विश्लेषण में
बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण समझते हैं। वे भूतकाल से सम्बन्ध रखते हैं, इसलिए हम
उन्हें हटा नहीं सकते। इसके बाद, जीवन का वह सब दुःख है जिसे हमने 'यथार्थता
में कुंठा' के अन्तर्गत शामिल किया है, जिससे जीवन का सारा प्रेम का अभाव
पैदा होता है-अर्थात् गरीबी, पारिवारिक झगड़े, विवाह में गलत साथी का चनाव.
प्रतिकल सामाजिक अवस्थाएं. और व्यक्ति पर नैतिक रूढियों के नियमों की कठोरता।
इन सभी में सफल इलाज की बहत गंजाइश है, पर इस इलाज को वियेना की दंतकथा वाले
कैसर जोसेफ के ढंग पर चलना पड़ेगा-कैसर जोसेफ ऐसा परोपकारी निरंकुश राजा था
जिसकी इच्छा के आगे लोग सिर झुका देते और कठिनाइयां दूर हो जातीं। पर हम
चिकित्सा में इतना परोपकार कैसे कर सकते हैं? हम गरीब लोग हैं और समाज में
हमारा कोई ऐसा प्रभाव नहीं, और हमें चिकित्सा करके अपनी रोज़ी कमानी है।
इसलिए हम दूसरे डाक्टरों की तरह, जो दूसरी विधियों से चिकित्सा करते हैं,
बहुत गरीब लोगों का इलाज भी नहीं कर सकते, और फिर हमारे इलाज में बहुत समय और
मेहनत लगती है। पर शायद आप अब भी पहले पेश किए जा चुके कारकों में से एक को
पकड़े हुए हैं, और यह समझते हैं कि उसके रास्ते हम अपना प्रभाव डाल सकते हैं।
यदि समाज द्वारा लगाई गई परम्परागत रुकावटों के कारण रोगी को प्रवंचित होना
पड़ा है तो इलाज से उसे साहस प्राप्त होगा, और उसे सीधे यह सलाह भी दी जा
सकती है कि वह इन रुकावटों को न माने, और अपनी सन्तुष्टि और स्वास्थ्य
प्राप्त करने के लिए उस आदर्श को तिलांजलि दे दे जो बहुत आदरणीय होता हुआ भी
प्रायः दुनिया में रोज़ ठुकराया जाता है। तो, स्वास्थ्य 'मुक्त रहन-सहन' से
प्राप्त होगा। विश्लेषण पर निश्चित रूप से यह आरोप लगाया जाएगा कि यह सामान्य
नैतिकता का पोषण नहीं करता; इसने व्यष्टि को जो कुछ दिया, वह बाकी दुनिया से
छीन लिया।
पर विश्लेषण के बारे में ऐसी मिथ्या धारणा आपको किससे मिली, यह कहने की
आवश्यकता नहीं। विश्लेषण सम्बन्धी इलाज का एक भाग यह होगा कि 'मुक्त रहन-सहन'
रखो-इसका एक यह कारण तो है ही कि हम स्वयं आपसे कहते हैं कि रोगी में
रागात्मक इच्छाओं और यौन दमन में, भोगात्मक और निवृत्ति की प्रवृत्तियों में
ज़बरदस्त द्वन्द्व चल रहा है। दोनों पक्षों में से एक को मदद देकर जिता देने
से यह द्वन्द्व दर नहीं होता। यह सच है कि हम देखते हैं कि स्नाय-रोगियों में
निवत्ति विजयी होती है जिसका परिणाम यह है कि अवरुद्ध यौन आवेग लक्षणों के
रूप में दिखाई देने लगे हैं। यदि इसके स्थान पर हम भोगात्मक पक्ष को जिता सके
तो कामुकता या यौन प्रवृत्ति का दमन करने वाले तिरस्कृत बलों को लक्षणों
द्वारा अपनी क्षति-पूर्ति करनी पड़ेगी। इन दोनों में से किसी भी उपाय से
भीतरी द्वन्द्व का अन्त करने में सफलता नहीं मिलेगी। दोनों अवस्थाओं में एक
पक्ष असन्तुष्ट रहेगा। बहुत कम रोगियों में यह द्वन्द्व ऐसा स्थायी होता है
जिस पर डाक्टर की राय से कोई प्रभाव पड़ सके, और इन रोगियों को वास्तव में
विश्लेषण द्वारा इलाज की आवश्यकता नहीं होती। जिन लोगों पर डाक्टरों का इतनी
आसानी से असर पड़ जाता है, उन्होंने इस असर के बिना ही अपने द्वन्द्व को दूर
करने का रास्ता निकाल लिया होगा। आखिरकार आप जानते हैं कि विषय-वासनाओं से
बचकर रहने वाला कोई नौजवान जब अवैध सम्भोग का इरादा करता है, या कोई
असन्तुष्ट पत्नी जो कि किसी जार में सन्तुष्टि प्राप्त करती है, तब ऐसा करने
के लिए किसी डाक्टर या मनोविश्लेषण की इजाज़त की राह नहीं देखते।
इस सवाल पर विचार करते हुए लोग आमतौर से कठिनाई के सबसे आवश्यक अंग को भूल
जाते हैं, कि स्नायु-रोगी में रहने वाला रोगजनक द्वन्द्व और एक ही मानसिक
क्षेत्र में मौजूद सब विरोधी आवेगों में होने वाला प्राकृत संघर्ष दो भिन्न
चीजें हैं। यह प्राकृत संघर्ष दो ऐसे बलों की कुश्ती है जिनमें से एक को मन
के पूर्वचेतन और चेतन भाग की सतह तक आने में सफलता हुई है, जबकि रोगजनक
द्वन्द्व अचेतन सतह पर घिरा रहा है। इसी कारण, इस द्वन्द्व का किसी एक तरफ
अन्तिम फैसला कभी नहीं होगा। परस्पर विरोधी बल एक-दूसरे के सामने नहीं आ
पाते। निर्णायक फैसला तभी हो सकता है जब वे उसी मैदान में आमने-सामने आएं, और
मेरी राय में, यह स्थिति ला देना ही इलाज का एकमात्र कार्य है।
इसके अलावा, निश्चित समझिए कि यदि आपका खयाल यह है कि जीवन सम्बन्धी आचरण के
विषय में सलाह और पथ-प्रदर्शन विश्लेषण की विधि का अखण्ड भाग है तो आप बड़ी
गलतफहमी में हैं। इसके विपरीत, हम यथासम्भव उपदेशक का काम करने से बचते हैं।
हम यही चाहते हैं कि रोगी अपने लिए स्वयं अपने समाधान ढूंढ़ ले। इसके लिए हम
चाहते हैं कि वह अपने जीवन को प्रभावित करने वाले महत्त्वपूर्ण निश्चय, जैसे
जीवन-कार्य का चुनाव, व्यवसाय, विवाह या तलाक इलाज के दिनों में न करे, और
इलाज पूरा हो जाने के बाद ही उनके बारे में तय करे। अब आपको स्वीकार कर लेना
चाहिए कि आपने इससे बहुत भिन्न चीज़ की कल्पना की थी। थोड़े-से बहुत कम आयु
वाले, या बिलकुल असहाय और संबलहीन लोगों के लिए ही ऐसी सख्त पाबन्दी में रहना
असम्भव है। इन व्यक्तियों के लिए हम चिकित्सक और शिक्षक दोनों बन जाते हैं।
तब हम अपनी ज़िम्मेदारी को अच्छी तरह समझते हैं और आवश्यक सावधानी से कार्य
करते हैं।
मैंने इस आरोप से, कि विश्लेषण वाले इलाज में स्नायु-रोगियों को 'मुक्त जीवन
बिताने के लिए उत्साहित किया जाता है, जिस उत्सकता से अपनी सफाई पेश की है,
उससे आपको भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए, और न यह नतीजा ही निकालना चाहिए कि हम
उन्हें परम्परागत रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। यह बात भी हमारे
प्रयोजन से उतनी ही दूर है, जितनी वह। दूसरी बात यह कि यद्यपि यह सच है कि हम
सुधारक नहीं, बल्कि सिर्फ प्रेक्षक हैं, पर तो भी हम आलोचक की दृष्टि से
प्रेक्षण किए बिना नहीं रह सकते, और परम्परागत यौन नैतिकता का समर्थन करना या
उन उपायों को श्रेष्ठ कहना, जिनके द्वारा समाज ने जीवन में यौन-प्रवृत्ति की
व्यावहारिक समस्याओं को व्यवस्थित करने का यत्ल किया है, असम्भव मालूम हुआ
है। हम आसानी से यह दिखला सकते हैं कि दुनिया जिसे अपनी नैतिक नियमावली कहती
है, उसके लिए जितनी कुर्बानी करनी पड़ती है, उतनी की पात्र वह नहीं है, और
इसका व्यवहार न तो ईमानदारी से निर्धारित हुआ है, और न समझदारी से। हम अपने
रोगियों को ये आलोचनाएं सनने से नहीं रोकते। हम उन्हें यह आदत डालते हैं कि
वे और सब मामलों की तरह यौन मामलों पर भी बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार कर
सकें, और यदि इलाज के प्रभाव से स्वतन्त्र होने के बाद, वे असंयत यौन
स्वच्छन्दता और पूर्ण निवृत्ति के बीच का कोई रास्ता चुन लेते हैं, तो हमें
कोई परेशानी नहीं होती, चाहे फिर उसका कुछ भी परिणाम हो। हम यह कहते हैं कि
जिस आदमी ने अपने बारे में सच्ची बात समझना और पहचानना सीख लिया है, उसे अब
अनैतिकता के खतरों से लड़ने का बल प्राप्त हो गया है, चाहे उसका नैतिकता का
मानदण्ड कुछ दृष्टियों से प्रचलित मानदण्ड से भिन्न ही क्यों न हो। प्रसंगतः,
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हम स्नायु-रोग पैदा करने में इन्द्रियसंयम को
बहुत अधिक महत्त्व न दे बैठे। उस तरह के सम्भोग से, जो बिना किसी कठिनाई के
प्राप्त हो सकता है, कुंठा से और तत्पश्चात् कुंठा द्वारा प्रेरित राग-संचय
से उत्पन्न रोगजनक स्थितियों में से बहुत थोड़ी-सी स्थितियों में ही, आराम
मिल सकता है।
इस प्रकार, मनोविश्लेषण के चिकित्सा सम्बन्धी प्रभाव की व्याख्या हम यह मानकर
नहीं कर सकते कि यह रोगियों को यौन सम्भोग करने की खुली छूट देता है। आपको
कोई और चीज़ भी देखनी होगी। मैं समझता हूं कि आपके इस अनुमान पर विचार करते
हुए मैंने जो बातें कही थीं, उनमें से एक बात से आप सही रास्ते पर आ गए
होंगे। सम्भवतः किसी अचेतन चीज़ के स्थान पर किसी चेतन चीज़ के आ जाने, अचेतन
विचारों के चेतन विचारों से रूपान्तरित हो जाने, से ही हमारा कार्य सफल होता
है। आपका खयाल सही है। बिलकुल यही स्थिति है। अचेतन का चेतन में विस्तार करके
दमन दूर किए जाते हैं, लक्षण-निर्माण की अवस्थाएं दूर की जाती हैं, और रोगजनक
द्वन्द्व के स्थान पर प्रकृत संघर्ष लाया जाता है, जिसमें इधर या उधर फैसला
अवश्य होता है। हम अपने रोगियों के लिए कुछ नहीं करते। उन्हें ऐसा करते हैं
कि उनमें एक यह मानसिक परिवर्तन होने लगे। यह परिवर्तन उनमें जितनी अधिक
मात्रा में कर दिया जाता है, उतना ही अधिक लाभ हम उन्हें पहुंचा देते हैं।
जहां कोई दमन, या इस जैसा कोई और मानसिक प्रक्रम नहीं होता, जिसे दूर करना
हो, वहां हमारी चिकित्सा के करने योग्य कोई भी काम नहीं होता।
हमारे प्रयत्नों का लक्ष्य अनेक सूत्रों के रूप में प्रकट किया जा सकता है,
जैसे अचेतन को चेतन बनाना, दमनों को हटाना, स्मृति में खाली स्थानों को भरना;
ये सब समान बातें हैं, पर शायद आप इस कथन से असन्तुष्ट हैं। आपने स्नायु-रोगी
के स्वास्थ्य लाभ की कुछ और ही कल्पना की थी। आपने सोचा था कि मनोविश्लेषण के
परिश्रमपूर्ण कार्य के बाद वह बिलकुल ही नया आदमी बन जाएगा और अब आपसे यह कहा
जा रहा है कि बात सिर्फ इतनी है कि उसमें जितना अचेतन पहले था अब कुछ कमी हो
गई है, और जितना पहले चेतन था उसमें कुछ वृद्धि हो गई है। असलियत यह है कि
शायद आप इस तरह के भीतरी परिवर्तन के महत्त्व को पूरी तरह समझ नहीं पाते। जिस
स्नायु-रोगी का इलाज हो जाता है, वह सचमुच ही एक नया आदमी बन जाता है, यद्यपि
मूलतः वह पहले की तरह ही होता है, अर्थात् वह अपने सर्वोत्तम रूप में आ जाता
है। वह वैसा ही बन जाता है, जैसा सबसे अनुकूल परिस्थितियों में बना होता,
परन्तु यह बहुत बड़ी चीज़ है। फिर, जब आपको वे सब बातें पता चलेंगी जो उनके
मानसिक जीवन में यह मामूली-सा लगने वाला परिवर्तन लाने के लिए करनी होंगी, तब
इन अनेक मानसिक सतहों के इन अन्तरों का अर्थ आपको अधिक समझ में आएगा।
मैं ज़रा-सा विषयान्तर करके यह पूछना चाहता हूं कि क्या आपको पता है कि
'नैमित्तिक चिकित्सा'1 का क्या अर्थ है? नैमित्तिक चिकित्सा उस प्रक्रिया को
कहते हैं जो रोग के अभिव्यक्त रूपों को छोड़कर रोग के कारण को दूर करने के
लिए कोई कमज़ोर पहलू तलाश करती है। अब प्रश्न यह है कि मनोविश्लेषण नैमित्तिक
चिकित्सा है या नहीं? इसका उत्तर सरल नहीं है, पर इससे हमें ऐसे प्रश्नों की
व्यर्थता अच्छी तरह समझने का मौका मिल सकता है। जहां तक इसका प्रश्न है कि
मनोविश्लेषण चिकित्सा का लक्ष्य लक्षणों का तत्काल दूर करना नहीं होता; उस
सीमा तक यह नैमित्तिक चिकित्सा के रूप में की जाती है। और दृष्टियों से यह
कहा जा सकता है कि नैमित्तिक चिकित्सा नहीं, क्योंकि हम कारण-श्रृंखला पर
पीछे की ओर चलते-चलते दमन से परे नैसर्गिक पूर्वप्रवृत्तियों, शरीर-रचना,
उनकी आपेक्षिक तीव्रता और उनके परिवर्धन के मार्ग में होने वाले विपथनों तक
पहुंचे हैं। अब मान लीजिए कि किसी रासायनिक साधन के इस मनोयन्त्र पर असर डाला
जा सकता, किसी खास समय उपलब्ध राग की मात्रा को बढ़ाया-घटाया जा सकता, या एक
आवेग की ताकत छीनकर दूसरे आवेग की ताकत बढ़ाई जा सकती, तो यह शाब्दिक अर्थ की
दृष्टि से नैमित्तिक चिकित्सा होती, और हमारा विश्लेषण उसका अनिवार्य आरम्भिक
कार्य होता। जैसा कि आप जानते हैं, इस समय राग के प्रक्रमों पर ऐसे किसी
प्रभाव का प्रश्न नहीं है। हमारी मानसिक चिकित्सा इस श्रृंखला के एक और स्थान
पर हमला करती है। यह स्थान बिलकुल वही नहीं है, जहां रोग के अभिव्यक्त रूप
जमे हुए दिखाई देते हैं, पर फिर भी यह लक्षणों से बहुत पीछे है। यह स्थान
बड़ी विशिष्ट परिस्थितियों में हमारे काबू में आ जाता है।
तो, रोगों में जो कुछ अचेतन है, उसे चेतना में लाने के लिए हमें क्या करना
पड़ता है? किसी समय हमने समझा था कि यह बड़ा सरल काम होगा। हमें सिर्फ इतना
करना होगा कि हम इस अचेतन वस्तु को पहचान लें और फिर रोगी को यह बता दें कि
यह वस्तु क्या है, परन्तु हम पहले ही यह समझ चुके हैं कि वह हमारी
अदूरदर्शिता थी। उसमें जो कुछ अचेतन है, उसके बारे में हमें जानकारी होना, और
रोगी की जानकारी होना एक ही बात नहीं है। जब हम उससे वे बातें कहते हैं जो हम
जानते हैं, तो वह उन्हें अपने निज के अचेतन विचारों के स्थान पर नहीं अपनाता,
बल्कि उनके साथ-साथ अपनाता है; और उसमें कुछ भी परिवर्तन नहीं होता। हमें इस
अचेतन सामग्री पर स्थानवृत्तीय दृष्टि से विचार करना पड़ता है। हमें उसकी
स्मति में वह असली जगह खोजनी पड़ती है, जिसमें इसका दमन शरू में आरम्भ हुआ।
पहले इस दमन को हटाना होगा, और फिर सीधे ही अचेतन विचार के स्थान पर चेतन
विचार लाया जा सकता है। इस तरह के दमन को कैसे हटाया जाए? यहां हमारे कार्य
की दूसरी कला प्रारम्भ होती है। प्रथम तो दमन को खोजना, और फिर उस प्रतिरोध
को हटाना, जो इस दमन को कायम रखता है।
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1. Casual therapy
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