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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
रोग के कुछ अन्य रूप भी हैं, जिनमें हमारा इलाज कभी सफल नहीं होता, यद्यपि
अवस्थाएं एक-सी होती हैं। उनमें भी शुरू में अहम् और राग में द्वन्द्व हुआ
था, और फिर दमन हुआ था, यद्यपि इस द्वन्द्व में और स्थानान्तरण स्नायु-रोगों
के द्वन्द्व में स्थानवृत्तीय फर्क थे। उनमें भी रोगी के जीवन का वह स्थान
खोजा जा सकता है, जिनमें दमन हुए। हम वही विधि अपनाते हैं, वही आश्वासन देने
को तैयार हैं; रोगी को यह बतलाकर कि वह क्या चीज़ खोजे, उसे वही सहायता पेश
करते हैं; और यहां भी जिस समय दमन हुए थे, उसके और आज के बीच का समयान्तरण
द्वन्द्व का अधिक अच्छा परिणाम होने के लिए अनुकूल है, और फिर भी हम उसके एक
भी प्रतिरोध को हटाने या एक भी दमन को दूर करने में सफल नहीं हो सकते। ये
रोगी, जो पैरानोइआ, मैलांकोलिया (उदासी रोग) और डेमेन्शिया प्रीकौक्स के रोगी
होते हैं, मनोविश्लेषण के इलाज के लिए चिकने घड़े सिद्ध होते हैं। इसका क्या
कारण हो सकता है? बुद्धि की कमी इसका कारण नहीं है। यह ठीक है कि विश्लेषण के
लिए बौद्धिक क्षमता की कुछ मात्रा स्वभावतः आवश्यक है; पर उदाहरण के लिए,
बड़े हाज़िर-जवाब डिडेक्टिव-पैरानोइआ-रोगी में इस दृष्टि से कोई कमी नहीं
होती। इसी तरह, दूसरे प्रेरक बल भी सदा अनुपस्थित नहीं होते; उदाहरण के लिए,
पैरानोइआ-रोगियों के मुकाबले उदासी रोगी इस बात को बहुत अधिक अनुभव करते हैं
कि वे रोगी हैं, और उनके कष्टों का कारण यह रोग है; पर इसके कारण उन पर अधिक
आसानी से प्रभाव नहीं पड़ता। इस तरह हमारे सामने एक ऐसा तथ्य आ जाता है जिसे
हम नहीं समझ पाते, और इसलिए यह प्रश्न पैदा होता है कि क्या
हमने दूसरे स्नायु-रोगों में सफलता पाने के लिए आवश्यक सव अवस्थाओं को वास्तव
में समझ लिया है?
जब हम हिस्टीरिया और मनोग्रस्तता के रोगियों पर विचार करते हैं. तब हमारे
सामने शीघ्र ही एक दूसरा बिलकुल असम्भावित तथ्य आ जाता है। कुछ समय इलाज होने
के बाद हम देखते हैं कि इन रोगियों का हमारे प्रति बड़ा अजीब व्यवहार होता
है। हमने सचमुच समझा था कि हमने इलाज-सम्बन्धी प्रेरक बलों पर विचार कर लिया
है, और अपने तथा रोगी के बीच की स्थिति को इतनी अच्छी तरह स्पष्ट कर लिया है
कि वह गणित की राशि के समान सन्तुलित हो गई है। पर अब फिर कोई ऐसी चीज़ बीच
में आ गई मालूम होती है, जो हमारी गणना से बिलकुल छूट गई थी। इस नई और
अप्रत्याशित बात के खुद बहुत-से पहलू और उलझने हैं। सबसे पहले मैं इसके अधिक
आम और सरल रूप आपके सामने पेश करूंगा।
तो, हम देखते हैं कि रोगी में, जिसके मन में अपने को परेशान करने वाले
द्वन्द्वों के समाधान के अलावा कोई और बात नहीं होनी चाहिए, डाक्टर के
व्यक्तित्व में विशेष दिलचस्पी पैदा होने लगती है। उसे इस व्यक्ति से
सम्बन्धित हर बात अपने निजी मामलों के अधिक महत्त्व की लगने लगती है, और उसके
रोग से उसका ध्यान हटाने लगता है। तब रोगी के सम्बन्ध कछ समय के लिए बड़े मधर
हो जाते हैं। यह बिलकुल आपकी इच्छा के अधीन चलने लगता है, जहां मौका मिले
वहीं अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करने की कोशिश करता है, चरित्र की निर्मलता और
अन्य ऐसे श्रेष्ठ गुण प्रदर्शित करता है, जिनकी हमने उसमें पहले शायद कल्पना
नहीं की थी। इस प्रकार, रोगी के बारे में विश्लेषक की राय बहुत अच्छी हो जाती
है और वह ऐसे गुणी व्यक्ति का सहायक बनने को अपना सौभाग्य समझने लगता है। यदि
डाक्टर को रोगी के रिश्तेदारों से मिलने का मौका पड़ता है, तो उनसे यह सुनकर
सन्तोष होता है कि यह समादर दोतरफा है। रोगी अपने घर पर विश्लेषक की प्रशंसा
करता और उसमें नये-नये गुण बताता हुआ कभी नहीं थकता। 'वह तो आपके पीछे पागल
हो गया है, उसे आप पर पूरा भरोसा है; आपकी कही हुई हर बात उसके लिए ईश्वर की
वाणी जैसी है'-ये बातें रिश्तेदार उसे बताते हैं। कोई अधिक तीव्र दृष्टि वाला
व्यक्ति यह भी कह देता है, 'वह आपके सिवाय और कोई बात ही नहीं करता, जिससे जी
बिलकुल ऊब जाता है; वह हर समय आपकी ही बातों के उद्धरण देता है।
हमें यही आशा करनी चाहिए कि डाक्टर में इतनी विनय होगी कि वह रोगी द्वारा की
हुई अपनी प्रशंसा का यह मतलब बताएगा कि रोगी को मेरे बताए हुए तरीकों से
स्वास्थ्य-लाभ की आशा हो गई है, और इस इलाज में होने वाले आश्चर्यजनक
रहस्योद्घाटनों और उनके मुक्तिकारक प्रभाव के परिणामस्वरूप रोगी का बौद्धिक
क्षितिज विस्तृत हो गया है। इन अवस्थाओं में विश्लेषण भी बड़े अच्छे ढंग से
आगे बढ़ता है। रोगी अपने सामने पेश किए गए सुझावों को समझता है इलाज के लिए
आवश्यक कार्यों पर ध्यान देता है, आवश्यक सामग्री-उसकी पुरानी स्मृतियां और
साहचर्य-बड़ी मात्रा में उपलब्ध हो जाती हैं। वह विश्लेषक को उसके निर्वचन की
निश्चितता और सत्यता से आश्चर्य में डाल देता है, और विश्लेषक को यह देखकर
बड़ा सन्तोष होता है कि रोगी व्यक्ति उन सारे नये मनोवैज्ञानिक विचारों को
कितनी आसानी से और तत्परता से स्वीकार कर लेता है, जिन पर बाहरी दुनिया में
स्वस्थ व्यक्ति इतना गरमागरम वाद-विवाद करते हैं। विश्लेषक के इस मधर सम्बन्ध
के साथ-साथ रोगी की दशा में भी सामान्य सुधार दिखाई देता है, जिसकी सब ओर से
वैज्ञानिक पुष्टि हो जाती है।
पर ऐसी बहार सदा नहीं रह सकती। एक दिन आता है, जबकि घटा घिर आती है, विश्लेषण
में कठिनाइयां पैदा होने लगती हैं। रोगी कहता है कि मुझे और कोई बताने लायक
बात नहीं सूझती। स्पष्ट यही दिखाई देता है कि अब उसे इस कार्य में दिलचस्पी
नहीं रही, और वह अपने को दिए गए इस आदेश की बीच-बीच में उपेक्षा कर रहा है कि
अपने मन में आने वाली प्रत्येक बात वह कह डाले, और अपने मन में आने वाले
आलोचनात्मक आक्षेपों में से किसी से न दबे। उसके व्यवहार का रूप इलाज की
स्थिति के कारण ऐसा नहीं होता। ऐसा लगता है कि जैसे उसने डाक्टर से उस आशय का
इकरार ही नहीं किया था। स्पष्टतः वह किसी और वात में व्यस्त है, और साथ ही यह
बात वह किसी से कहना भी नहीं चाहता। इस स्थिति में इलाज का खतरा है। साफ बात
यह है कि कोई बहुत प्रबल प्रतिरोध पैदा हो गया है। फिर, क्या बात हो सकती है?
यदि इस स्थिति को स्पष्ट किया जा सके तो यह पता चलता है कि इस गड़बड़ी का
कारण यह है कि रोगी ने अनुराग की कुछ तीव्र भावनाएं डाक्टर पर स्थानान्तरित
कर दी हैं, और इसका कारण न तो डाक्टर का व्यवहार है और न इलाज से पैदा होने
वाले सम्बन्ध। यह अनुरागपूर्ण भावना जिस रूप में प्रकट होती है और जिस लक्ष्य
पर पहुंचना चाहती है, वे स्वभावतः दोनों व्यक्तियों के बीच की स्थिति के
हालात पर निर्भर होते हैं। यदि उनमें से एक जवान लड़की हो और दूसरा अभी
नौजवान-सा ही हो, तो उनमें प्रकृत प्रेम की सी धारणा पैदा होती है। यह
स्वाभाविक लगता है कि कोई लड़की ऐसे आदमी के साथ प्रेम करने लगे जिसके साथ वह
बहुत समय एकान्त में रहती है और जिससे वह अपनी बहुत गुप्त बातें भी कह सकती
है, और जो अधिकारपूर्वक सलाह देने वाले की स्थिति में है-हम सम्भवतः इस तथ्य
को भूल जाएंगे कि स्नायु-रोग से पीड़ित लड़की में प्रेम करने की क्षमता में
कुछ गड़बड़ी की आशा करनी ही चाहिए। दोनों व्यक्तियों की बीच की स्थिति इस
कल्पित उदाहरण से जितनी अधिक भिन्न होगी, उतना ही कठिन यह बताना होगा कि अन्य
रोगियों में भी इस तरह की भावना क्यों दिखाई देती है। यदि कोई जवान स्त्री,
जो अपने विवाह से सुखी नहीं हुई अपने चिकित्सक के प्रति गम्भीर प्रेमावेश से
अभिभूत मालूम हो, जो कि अभी अविवाहित है, और वह तलाक लेने के लिए और अपने को
उसको अर्पित करने के लिए तैयार हो जाए, या जहां परिस्थितियों के कारण ऐसा
नहीं हो सकता हो, वहां उसके साथ गुप्त प्रेम-सम्बन्ध रखने लगे, तो यह बात फिर
भी समझ में आ सकती है। सच पूछिए तो इस तरह की बात मनोविश्लेषण से भिन्न
क्षेत्र में हो चुकी है, पर इस स्थिति में स्त्रियां और लड़कियां बड़े
आश्चर्यजनक रहस्य प्रकट करती हैं, जिनसे यह पता चलता है कि चिकित्सा की
समस्या पर उसका बड़ा
अजीब रुख है। वे सदा यह समझती रही हैं कि प्रेम के अलावा और किसी चीज़ से
उनका इलाज नहीं होगा, और इलाज के आरम्भ से उन्हें यह आशा थी कि जो चीज़
उन्हें अब तक जीवन में नहीं मिल सकी, वह अब आखिरकार इस सम्बन्ध से मिल जाएगी।
इस आशा से ही उन्होंने अपने सब विचार प्रकट करने में आने वाली सारी कठिनाइयों
को दर किया. और विश्लेषण के लिए इतना कष्ट उठाया। इतनी बात हम और जोड़ दें,
'और जिन बातों को समझना आमतौर से इतना कठिन है, उन्हें इतनी आसानी से समझ
लिया था।' पर इस तरह की स्वीकारोक्ति से हम अवाक रह जाते हैं। हमारे सब
हिसाब-किताब बेकार हो जाते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने सारी समस्या के
सबसे महत्त्वपूर्ण अंश को छोड़ दिया है?
और सचमुच यही बात है। हमें जितना अधिक अनुभव प्राप्त हो जाता है, हमारे लिए
इस नये कारक का, जिसने सारी समस्या को बदल दिया और हमारी वैज्ञानिक गणनाओं को
तुच्छ बना दिया, मुकाबला करना उतना ही कम सम्भव हो जाता है। शुरू में कुछ बार
तो आदमी यह सोच सकता है कि एक आकस्मिक घटना के रूप में, जो विश्लेषण के
प्रयोजन से असम्बन्धित है और जिसके पैदा होने का इसके साथ कोई सिलसिला नहीं
जुड़ता, एक बाधा आ गई है जिस पर आकर विश्लेषण का इलाज व्यर्थ हो गया है। पर
जब यह होता है कि चिकित्सा के प्रति इस तरह का अनुराग हर नये रोगी में सदा
दिखाई देता है और बहुत प्रतिकूल अवस्थाओं में भी, और बड़ी अटपटी परिस्थितियों
में भी सदा दिखाई देता है-जैसे बुजुर्ग स्त्रियों में सफेद दाढ़ी वाले लोगों
के प्रति, और ऐसे अवसरों पर भी जब हमें बुद्धि से यही निश्चय होता है कि वहां
कोई प्रलोभन नहीं है-तब हमें आकस्मिक घटना का विचार छोड़ देना पड़ता है और
यही मानना पड़ता है कि यह अपने-आपमें एक घटना है, जो रोग के स्वरूप में साथ
सारतः जुड़ी हुई है।
इस प्रकार जो नया तथ्य मानने की अनिच्छापूर्वक मजबूर होना पड़ता है, उसे हम
स्थानान्तरण कहते हैं। इससे हमारा आशय यह है कि भावनाएं डाक्टर के व्यक्तित्व
पर स्थानान्तरित कर दी जाती हैं, क्योंकि हम यह नहीं समझते कि इलाज की स्थिति
को ऐसी भावनाओं के जन्म का कारण कहा जा सकता है। हमें यह सन्देह करने की अधिक
गुंजाइश मालूम होती है कि भावना पनपने की इस सारी तत्परता का जन्म एक और जगह
होता है, कि यह रोगी के पहले ही बन चुकी थी और इलाज द्वारा प्रस्तुत अवसर का
लाभ उठाकर अपने-आपको डाक्टर के व्यक्तित्व पर स्थानान्तरित कर लिया गया है।
यह स्थानान्तरण या तो आवेशपूर्ण प्रेम-याचना के रूप में प्रकट होता है, या
इससे कुछ हलके रूप ग्रहण कर सकता है। जहां लड़की जवान और पुरुष बुजुर्ग हैं,
वहां पत्नी या रखैल बनने की इच्छा के स्थान पर लाड़ली पुत्री के रूप में
स्वीकार किए जाने की इच्छा प्रकट हो सकती है, या रागात्मक इच्छा अपने रूप में
थोड़ा परिवर्तन करके स्थायी और आदर्श आत्मिक1 मित्रता की इच्छा के रूप में
सामने आ सकती है। बहुत-सी स्त्रियां यह समझती हैं कि स्थानान्तरण को ऐसा
उदात्त रूप कैसे दिया जाए और इसको इस तरह कैसे ढाला जाए कि इसके अस्तित्व का
एक तरह से औचित्य सिद्ध होने लगे। कुछ स्त्रियां इसे इसके स्थूल मौलिक.
प्रायः असम्भव रूप में प्रकट करती हैं, पर साररूप में यह सदा एक ही चीज होती
है और इसका जन्म उसी स्रोत से होता है।
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1. Platonic
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