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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद


एक बार फिर उस स्वरूप पर विचार कीजिए जिस पर हम कई बार पहले विचार कर चुके हैं, अर्थात् डेढ़ फ्लोरिन में थियेटर के तीन टिकटों वाला स्वप्न। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि इसे उदाहरण के रूप में रखने में मेरा कोई गुप्त उद्देश्य नहीं था। आप जानते हैं कि गुप्त विचार क्या थे : यह सुनने के बाद कि उसकी सहेली की सगाई अभी हुई है, यह परेशानी कि मैंने शादी करने में इतनी जल्दी क्यों की; अपने पति के प्रति आदर में कमी, और यह विचार कि यदि मैंने भी प्रतिज्ञा की होती तो मुझे अधिक अच्छा पति मिल सकता था। हम यह भी जान चुके हैं कि जिस इच्छा ने इन विचारों में स्वप्न बनाया वह 'देखने या ताकने' की इच्छा थी, अर्थात् थियेटर जा सकने की इच्छा थी-बहुत सम्भवतः इस पुरानी उत्सुकता की एक शाखा थी कि विवाह के बाद वास्तव में क्या होता है। यह सुविदित है कि बच्चों में यह कुतूहल माता-पिता के यौन जीवन की दिशा में होता है। कहने का आशय शायद यह है कि यह एक शैशवीय आवेग है, और बाद के जीवन में यह जहां कहीं कायम रहता है, वहां इसकी जड़ शैशवकाल में ही होती है, पर स्वप्न से पिछले दिन प्राप्त समाचार से यह दर्शनेच्छा जाग उठने का कोई कारण नहीं था। इससे सिर्फ परेशानी और अफसोस हुआ। (दर्शनेच्छा का) यह आवेग पहले स्वप्न-विचारों में जुड़ा हुआ नहीं था, और मनोविश्लेषण इसको अपने विचार के अन्तर्गत लिए बिना, स्वप्न-निर्वचनों के परिणामों का उपयोग कर सकता था, पर यहां भी परेशानी स्वयं स्वप्न पैदा नहीं कर सकती। इस विचार में से, कि 'विवाह करने में इतनी जल्दी करना मूर्खता थी, तब तक स्वप्न नहीं बन सकता था, जब तक उस विचार ने. बचपन की यह देखने की इच्छा को कि विवाह के बाद क्या होता है, न जगा दिया हो। इस प्रकार इस इच्छा ने स्वप्नवस्तु बनाई और उसमें विवाह के स्थान पर 'थियेटर जाना' ला दिया, और उसका रूप विवाह से पहले की इस इच्छापूर्ति का रूप था कि 'मैं अब थियेटर जा सकती हूं, और वे सब चीजें देख सकती हूं जो हमें कभी देखने नहीं दी गईं; और तुम नहीं देख सकतीं; मेरा विवाह हो चुका है, और तुम्हें प्रतिज्ञा करनी है।' इस प्रकार वास्तविक स्थिति विपरीत स्थिति में बदल गई, और पहले की जीत के स्थान पर हार की बेचैनी आ गई; और प्रसंगतः 'ताकने या देखने के आवेग और अहंकारपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता के आवेग, दोनों की सन्तुष्टि हो गई। यह पीछे वाला सन्तोष ही स्वप्न की व्यक्त वस्तु नियत या निर्धारित करता है, क्योंकि इसमें वह सचमुच थियेटर में बैठी है जबकि उसकी सहेली अन्दर नहीं आ सकती। स्वप्नवस्तु के अंश, जिनके पीछे गुप्त विचार अब भी अपने-आपको छिपाए हुए हैं, सन्तुष्टिकारक स्थिति के अनुचित और समझ में न आने वाले रूप-भेदों के रूप में प्राप्त होंगे। निर्वचन का काम यह है कि उन सारी बातों को अलग कर दे जो इच्छापूर्ति को निरूपित करती हैं, और इन संकेतों से कष्टकारक गुप्त विचारों की पुनः रचना करे।

मैंने आपके ध्यान में जो नई बात लाने के लिए कहा था वह यही थी कि आप इन गुप्त स्वप्न-विचारों पर, जो अब प्रमुख रूप से सामने आए हैं, ध्यान दें। मेरी यह प्रार्थना है कि आप ये बातें न भूलें : (एक) स्वप्नद्रष्टा को इनका ज्ञान या चेतना नहीं है; (दो) वे बिलकुल तर्कसंगत और सुसम्बद्ध हैं, और इसलिए हम उन्हें इस रूप में समझ सकते हैं कि वे उसी उद्दीपन की सुबोध प्रतिक्रिया हैं जिसने स्वप्न को जन्म दिया; और (तीन) उनका मूल्य किसी मानसिक आवेग या बौद्धिक व्यापार के मूल्य जितना हो सकता है। अब मैं इन विचारों को और भी दृढ़ता से पिछले दिन के अवशेष कहूंगा; स्वप्नद्रष्टा उन्हें माने या न माने। इसके बाद मैं इस 'अवशेष' और 'गुप्त स्वप्न-विचारों' में अन्तर करूंगा, और इस तरह, जैसे कि हम करते रहे हैं, स्वप्न के निर्वचन से ज्ञात हर बात को 'गुप्त-स्वप्न' कहूंगा जबकि 'पिछले दिन का अवशेष' गुप्त स्वप्न-विचारो का सिर्फ एक अंश है। तो, जो कुछ होता है उसके विषय में हमारा अवधारण यह है : पिछले दिन के अवशेष में कोई चीज़ और जुड़ गई है। यह चीज़ भी अचेतन से सम्बन्ध रखती है। यह एक प्रबल पर दमित, अर्थात् दबाया गया, इच्छा-आवेग है, और इसके होने पर ही स्वप्न का निर्माण हो सकता है। इच्छा-आवेग अवशेष पर क्रिया करके गुप्त स्वप्न-विचारों के उस दूसरे भाग की सृष्टि करता है जिसका हमारे जाग्रत जीवन के दृष्टिकोण से सब बुद्धिसंगत या सुबोध दिखाई देना आवश्यक नहीं रहता।

अवशेष और अचेतन इच्छा के आपसी सम्बन्ध को स्पष्ट करने के लिए मैंने कहीं एक दृष्टान्त दिया है, और उसी को मैं यहां दोहराना चाहता हूं। प्रत्येक कारबार के लिए उसके खर्चे उठाने वाले पंजीपति की, और एक ऐसे मालिक-प्रबन्धक की आवश्यकता होती है जिसे उस कारबार की जानकारी हो, और उसे चलाना आता हो। स्वप्न-निर्माण में पूंजीपति वाला कार्य सदा अचेतन इच्छा द्वारा, और इस इच्छा द्वारा ही, किया जाता है। यह ही इसके लिए आवश्यक मानसिक ऊर्जा-रूपी धन देती है; मालिक-प्रबन्धक पिछले दिन का अवशेष है जो खर्च करने का तरीका निश्चित करता है। निःसन्देह ऐसा हो सकता है कि स्वयं पूंजीपति को कारबार की सामान्य या विशेष जानकारी हो, या मालिक-प्रबन्धक के पास ही पूंजी हो। इससे व्यावहारिक स्थिति बड़ी सरल हो जाती है, पर उसका सिद्धान्तपक्ष अधिक कठिन हो जाता है। अर्थशास्त्र में हम पूंजीपति का कार्य करने वाले मनुष्य में और उसी मनुष्य की मालिक-प्रबन्धक की हैसियत में विभेद करते हैं, और इस विभेद से वह मूल स्थिति आ जाती है जिसके आधार पर हमारा दृष्टांत खड़ा है। स्वप्न के निर्माण में भी वे परिणमन या विविध रूप पाए जाते हैं-ये मैं आपके ढूंढ़ने के लिए छोड़ देता हूं।

इस प्रश्न पर अब हम और विचार नहीं करेंगे क्योंकि मुझे लगता है कि आपके मन में एक बाधक ख्याल बहुत समय से आया हुआ होगा, और यह विचारने योग्य है। आप पूछ सकते है, "क्या तथाकथित 'अवशेष उस अर्थ में वास्तव में अचेतन है जिसमें स्वप्न के निर्माण के लिए आवश्यक इच्छा अचेतन है?" आपकी शंका उचित है। यह सारे विषय की मुख्य समस्या है। वे दोनों एक ही अर्थ में अचेतन नहीं हैं। स्वप्न-इच्छा एक दूसरे प्रकार के अचेतन से सम्बन्ध रखती है। इस अचेतन की जड़ें, जैसा कि हम देख चुके हैं, शैशवकाल में होती हैं, और इसमें विशेष तन्त्र होते हैं। इन दोनों प्रकार के 'अचेतनों' में फर्क करने के लिए इन्हें अलग-अलग नाम देना सबसे अच्छा रहेगा। पर फिर भी हम तब तक इस मामले में रुके रहेंगे, जब तक कि हम स्नायुरोगों की घटनाओं से परिचित न हो जाएं। यदि किसी प्रकार के अचेतन के अस्तित्व की हमारी अवधारणा को पहले ही कल्पना-प्रसूत मान लिया जाए, तो हमारे यह कहने पर कि अपने उद्देश्य पर पहुंचने के लिए हमें दो प्रकार के अचेतन मानने पड़े हैं, लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

यह बात हम यहीं छोड़ते हैं। यहां फिर आपने अधूरी बात सुनी, परन्तु क्या यह विचार आशाजनक नहीं कि हमारी इस जानकारी को हम स्वयं या हमारे पीछे आने वाले आगे बढ़ाएंगे और क्या स्वयं हमने काफी नई और काफी चौंकाने वाली बातें नहीं जानी हैं?

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