|
गीता प्रेस, गोरखपुर >> शरणागतिरहस्य शरणागतिरहस्यमथुरानाथ शास्त्री
|
40 पाठक हैं |
||||||
हम जब तक अपने अंहकार में विश्वास रखते हैं, तब तक हमें अपनी क्षुद्रता लगातार व्यथित करती है। पर एक बार जब हम इस पंचतत्त्व शरीर और त्रिगुणातीत मन, बुद्धि को छोड़कर भगवान की शरणागति में जाते हैं, तब हमें ऐसे रहस्य उद्घाटित होते हैं जिनका रोमाञ्च कुछ विशेष ही होता है।
A PHP Error was encountered
Severity: Notice
Message: Undefined offset: -106
Filename: books/book_info.php
Line Number: 553
|
|||||
अन्य पुस्तकें
लोगों की राय
No reviews for this book








