शब्द का अर्थ
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ते :
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अव्य० [सं० तृस् (प्रत्यय)] १. द्वारा। २. से अधिक या बढ़कर। उदाहरण–चपला तें चमकत अति पारी, कहा करौगी श्यामहिं।–सूर। ३. किसी समय या स्थान से।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) |
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ते :
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विभ० [हिं०] से। सर्व०=[सं० तद् का बहु०] वे ( वे लोग)। |
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तेइ :
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सर्व० [सं० ते] वे लोग ही।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) |
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तेइस :
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वि० पुं०=तेईस। |
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तेइसवाँ :
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वि०=तेईसवाँ। |
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तेईस :
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वि० [सं० त्रिविंशति; पा० तेवीसति, प्रा० तेवीस] गिनती में बीस से तीन अधिक। बीस और तीन। पुं० उक्त की सूचक संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती है।–२३। |
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तेईसवाँ :
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वि० [हिं० तेईस+वाँ (प्रत्यय)] गिनती के क्रम में बाईस के बाद तेईस पर स्थान पर पड़नेवाला। |
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तेखना :
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अ० [हिं० तेहा] क्रुद्ध होना।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) |
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तेखी :
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वि०=क्रोधी। |
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तेग :
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स्त्री० [अ० तेग] तलवार। |
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तेगा :
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पुं० [अ० तेग] १. खड्ग या खाँड़ा नाम का अस्त्र। २. दरवाजे, मेहराब आदि के बीच का खाली स्थान बन्द करने या भरने के लिए उसमें ईंट, पत्थर आदि की जोड़ाई करके भरने की क्रिया। ३. दे० ‘कमरतेगा’। (कुश्ती का पेंच)। |
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तेज :
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पुं० [सं० तेजस्] १. पाँच महाभूतों में से अग्नि या आग नामक महाभूत। २. गरमी। ताप। ३. कोई ऐसी तीव्रता या प्रभाव कारक विशेषता जिसके सामने ठहरना या जिसे सहना कठिन हो। जैसे–महात्माओं के चेहरे पर एक विशष प्रकार का तेज होता है। ४. प्रताप। ५. पराक्रम। बल। ६. कांति। चमक। ७. तत्त्व। सार। ८. वीर्य। ९. पित्त। १॰. लज्जा। ११. सत्त्व गुण से उत्पन्न लिंग शरीर। १२. घोड़ों आदि के चलने की तेजी या वेग। १३. सोना। स्वर्ण। १४. नवनीत। मक्खन। वि० [सं० तेजस् से फा० तेज] १. ऐसा उग्र प्रबल या विकट जिसे सहना कठिन हो। जैसे–तेज धूप। २. जिसकी गति में बहुत अधिक वेग हो। शीघ्रगामी। जैसे–तेज घोड़ा, तेज हवा। ३. जिसकी धार बहुत चोखी या पैनी हो। जैसे–तेज चाकू। ४. जिसका स्वाद बहुत चरपरा, झालदार या तीखा हो। जैसे–तेज मिर्च। ५. जिसमें कोई काम बहुत अच्छी तरह और जल्दी करने की विशेष बुद्धि, योग्यता या सामर्थ्य हो। जैसे–पढ़ने-लिखने में तेज लड़का। ६. बहुत जल्दी या यथेष्ट प्रभाव उत्पन्न करनेवाला। जैसे–तेज दवा। ७. बहुत अधिक या बढ़-चढ़कर बोलनेवाला। जैसे–उनकी औरत बहुत तेज है। ८. जिसमें चंचलता या चपलता की अधिकता हो। जैसे–यह बच्चा अभी से बहुत तेज है। ९. जिसका दाम या भाव अपेक्षया अधिक हो या पहले से बढ़ गया हो। जैसे–आज-कल अनाज और कपड़ा बहुत तेज हो गया हो। |
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तेजक :
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पु० [सं०√तिज् (क्षमा करना)+ण्वुल्–अक] १. मूँज। २. सरपत। |
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तेजग :
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वि०=तेज।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) |
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तेजधारी :
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वि० [सं० तेजोधारिन्] (व्यक्ति) जिसके चेहरे पर तेज हो। तेजस्वी। |
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तेजन :
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वि० [सं०√तिज्+णिच्+ल्यु-अन] १. तेज उत्पन्न करनेवाला। २. दीप्त करनेवाला। ३. जल्दी जलने या जलानेवाला। पुं० १. बाँस। २. सरपत। ३. मूँज। |
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तेजनक :
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पुं० [सं० तेजन+कन्] शर। सरपत। |
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तेजना :
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स० [हिं० तजना] छोड़ देना। त्यागना। उदाहरण–तेजि अहं गुरु-चरन गहु जम से बाचें जीव।–कबीर। |
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तेजनाख्य :
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पुं० [सं० तेजन-आख्या, ब० स०] मूँज। |
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तेजनी :
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पुं० [सं० तेजन+ङीष्] १. मूर्वा। लता। २. मालकंगनी। ३. चव्य। चाब। ४. तेजबल। |
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तेजपत्ता :
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पुं० [सं० तेजपत्र] १. दारचीनी की जाति का एक पेड़ जिसकी पत्तियाँ दाल, तरकारी आदि में मसाले की तरह डाली जाती हैं। २. उक्त वृक्ष का पत्ता जो वैद्यक में बवासीर हृदयरोग, पीनस आदि को दूर करनेवाला माना गया है। |
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तेजपत्र :
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पुं० [सं०√तिज् (सहना)+णिच्+अच्, तेज-पत्र, ब० स०] तेजपत्ता। तेजपात। |
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तेजपात :
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पुं०=तेजपत्ता। |
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तेजबल :
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पुं० [सं० तेजोबत्ती] १. एक तरह की छाल जिसकी छाल लाल रंग की होती है और बीज काली मिरच की तरह के होते है जों दवा के काम आते हैं। २. उक्त वृक्ष की छाल और बीज जो सुगंधित होते हैं। |
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तेजल :
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पुं० [सं०√तिज् (सहना)+कलच्] चातक। पपीहा। |
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तेजवंत :
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वि०=तेजवान्। |
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तेजवान् :
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वि० [सं० तेजोवान्] [स्त्री० तेजवत्ती] १. जिसमें तेज हो। तेज से युक्त। तेजस्वी। २. वीर्यवान्। ३. बलवान। शक्तिशाली। ४. कांतिमान्। चमकीला। |
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तेजसी :
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वि० [हिं० तेजस्वी] जिसमें तेज हो तेजस्वी। |
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तेजस् :
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पुं० [सं०√तिज् (सहना)+असुन्] दे० ‘तेज’। |
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तेजस्-चिकित्सा :
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स्त्री० [तृ० त०] दे० रश्मि चिकित्सा। |
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तेजस्कर :
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वि० [सं०तेजस्√कृ(करना)+ट] तेज को प्रदीप्त करने या बढ़ानेवाला। तेज उत्पन्न करनेवाला। |
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तेजस्काम :
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वि० [सं० तेजस्√कम्(चाहना)+अण्] शक्ति या प्रताप की कामना करनेवाला। |
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तेजस्क्रिय :
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वि० [सं० ब० स०] (वह पदार्थ) जिसमें से तेज निकलकर दूसरे पदार्थों प्रभावित करता है। (रेडियो एक्टिव)। |
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तेजस्क्रियता :
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स्त्री० [सं० तेजस्क्रिय+तल्–टाप्] कुछ विशिष्ट मौलिक तत्त्वों या पदार्थों में निहित वह विद्युत शक्ति जो विशेष अवस्थाओं में तेज या रश्मि के रूप में बाहर निकलकर दूसरे पदार्थों पर प्रभाव डालती है। (रेडियो एक्टिविटी)। |
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तेजस्वत् :
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वि० [सं० तेजस्+मतुप् (वत्व)] तेजस्वी। |
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तेजस्वान् :
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वि० [सं० तेजस्वत्] तेजस्वी। |
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तेजस्विता :
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स्त्री० [सं०तेजस्विन्+तल्-टाप्] तेजस्वी होने की अवस्ता, गुण या भाव। |
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तेजस्विनी :
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स्त्री० [सं० तेजस्विन्+ङीष्] मालकंगनी। |
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तेजस्वी (स्विन्) :
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वि० [सं० तेजस्+विनि] [स्त्री० तेजस्विनी] १. जिसमें यथेष्ट तेज हो। २. जिसके बल, बुद्दि वैभव आदि का दूसरों पर यथेष्ट प्रभाव पड़ता हो। प्रतापी। पुं० इंद्र के एक पुत्र का नाम। |
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तेजा :
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पुं० [फा० तेज] १. एक प्रकार का काला रंग जिसमें कपड़ा रंगनेवाले रंगरेज मोरपंखी रंग बनाते हैं। २. चीजों का दाम तेज या बढ़ा हुआ होने की अवस्था या भाव। तेजी। |
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तेजाब :
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पुं० [फा०] [वि० तेजाबी] एक तरह के रासयनिक खट्टे तरल पदार्थ जो जल में घुलनशील होते है और जो नीले शेवल पत्र को लाल कर देते हैं। अम्ल। (एसिड)। |
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तेजाबी :
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वि० [फा०] १. तेजाब संबधी। २. जिसमें तेजाब मिला हुआ हो। ३. तेजाब की सहायता से तैयार किया बना या साफ किया हुआ। जैसे–तेजाबी सोना। |
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तेजाबी सोना :
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पुं० [फा० तेजाबी+हिं० सोना] वह सोना जो पुराने गहनों को गलाकर और तेजाब की सहायता से अच्छी तरह साफ करके तैयार किया जाता है। |
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तेजायन :
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पुं० [सं० तेज+आयतन] तेज का भंडार। परम तेजस्वी। उदाहरण–घोर तेजायतन घोर राशी।–तुलसी। |
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तेजारत :
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स्त्री०=तिजारत।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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तेजारती :
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वि०=तिजारती।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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तेजिका :
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स्त्री० [सं० तेजक+टाप्, इत्व] मालकंगनी। |
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तेजित :
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वि० [सं०√तिज्(सहना)+णिच्+क्त] १. तेज से युक्त किया हुआ। २. उत्तेजित। |
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तेजिनी :
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स्त्री० [सं०√तिज्+णिच्+णिनि-ङीष्] तेजबल। |
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तेजिष्ठ :
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वि० [सं० तेजस्विन्+इष्ठन्] तेजस्वी। |
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तेजी :
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स्त्री० [फा० तेजी] १. तेज होने की अवस्था, क्रिया गुण या भाव। २. उग्रता। प्रचंडता। ३. तीव्रता। प्रबलता। ४. गति आदि में होनेवाली शीघ्रता। ५. चीजों की दर या भाव में होनेवाली असाधारण या विशिष्ट वृद्धि। मँहगी। ‘मन्दी’ का विपर्याय। |
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तेजोज :
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पुं० [सं० तेजस√जन् (उत्पन्न होना)+ड] रक्त। खून। |
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तेजोजल :
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पुं० [सं० तेजस्+जल, ष० त०] आँख का वह ऊपरी अर्द्ध गोलाकार भाग जो शीशे के ताल की तरह जान पड़ता है। (लेंस)। |
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तेजोन्वेष :
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पुं० [सं० तेजस्-अन्वेष, ष० त] एक प्रकार का बहुत बड़ा वैज्ञानिक यंत्र जिसकी सहायता से परावर्तित ध्वनि तरंगों के आधार पर यह जाना जाता है कि आकाश अथवा स्थल में किस दिशा में और कितनी दूरी पर शत्रु आकाशयान जल-यान अथवा सैनिक महत्त्व के संघटन स्थित हैं, अथवा कोई आकाशयान या जलयान किधर से आ रहा है या किधर जा रहा है। (राडार)। |
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तेजोबल :
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पुं० [सं० तेजस्-बल, ब० स०] एक तरह का कँटीला जंगली पेड़ जिसका छिलका दवा और मसाले के काम आता है। |
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तेजोभंग :
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पुं० [सं० तेजस्-भंग, ष० त०] अपमान। बेइज्जती। |
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तेजोभीरु :
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स्त्री० [सं० तेजस्-भीरु, पं० त०] छाया। |
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तेजोमंडल :
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पुं० [सं० तेजस्-मंडल, ष० त०] सूर्य, चंद्रमा आदि आकाशीय पिंडों के चारों ओर का मंडल। छटा मंडल। भा-मंडल। |
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तेजोमंथ :
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पुं० [सं० तेजस्√मन्थ् (मथना)+अण्] गनियारी का पेड़। |
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तेजोमय :
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वि० [सं० तेजस्-मयट्] १. तेज से परिपूर्ण। २. शक्ति से परिपूर्ण। ३. तेजस्वी। |
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तेजोमूर्ति :
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वि० [सं० तेजस्-मूर्ति, ब० स०] तेजस्वी। पुं० सूर्य। |
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तेजोरूप :
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वि० [सं० तेजस्-रूप, ब० स०] जो अग्नि या तेज के रूप में हो। पुं० ब्रह्म। |
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तेजोवती :
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स्त्री० [सं० तेजस्-मतुप्+ङीप्] १. गजंपिप्पली। २. बाच। चव्य। ३. माल-कंगनी ४. तेजबल। |
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तेजोवान्(वत्) :
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वि० [सं० तेजस्+मतुप्] [स्त्री० तेजोवती] तेजवाला। तेजस्वी। |
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तेजोवृक्ष :
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पुं० [सं० तेजस्-वृक्ष, मध्य० स०] छोटी अरणी का वृक्ष। |
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तेजोहत :
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वि० [सं० तेजस्-हत, ब० स०] जिसका तेल नष्ट हो चुका हो। |
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तेजोह्व :
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स्त्री० [सं० तेजस्√ह्रे (स्पर्धा करना)+क] १. तेजबल। २. चाब। चव्य। |
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तेड़ना :
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स० टेरना। (पुकारना)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
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तेणि :
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अव्य० [सं० तेन] से। उदाहरण–वैदे कहियौ तेणि विसखि।–प्रिथीराज। |
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तेतना :
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वि०=तितना (उतना)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
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तेतर :
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वि० [हिं० तोतला] (व्यक्ति) जो तुतला कर बोलता हो। |
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तेंतरा :
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पुं० [देश] बैलगाड़ी में फड़ के नीचे की लकड़ी। |
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समानार्थी शब्द-
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तेता :
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वि० [स्त्री० तेती]=तितना (उतना)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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उपलब्ध नहीं |
तेतालिस :
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वि० पुं०=तेतालिस।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
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तेंतालिसवाँ :
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वि० [हिं० तेंतालिस+वाँ (प्रत्यय)] क्रम में तेंतालिस के स्थान पर पड़ने या होने वाला। |
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समानार्थी शब्द-
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तेंतालीस :
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वि० [सं० त्रिचत्वारिंशत्, प्रा० तिचत्तालीसा] जो गिनती या संख्या में चालिस से तीन अधिक हो। पुं० उक्त के सूचक अंक या संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती है।४३। |
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समानार्थी शब्द-
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तेतिक :
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वि० [हिं० तेता] उस मात्रा या मान का। उतना।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
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तेंतिस :
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वि० [सं० त्रयस्त्रिशंत्, प्रा० तितिसति, प्रा० तितीसा] जो गिनती में तीस से तीन अधिक हो। पुं० उक्त की सूचक संख्या जो अंकों में इस प्रकार लिखी जाती है।–३३। |
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समानार्थी शब्द-
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तेंतिसवाँ :
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वि० [हिं० तेंतिस+वाँ (प्रत्यय)] जो क्रम या गिनती में तेंतिस के स्थान पर पड़ें। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेती :
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वि० स्त्री० हिं० तेता (उतना) का स्त्री रूप।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेतो :
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वि०=तेता। (उतना)।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेंदुआ :
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पुं० [देश०] चीते की जाति का एक हिंसक पशु। |
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समानार्थी शब्द-
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तेंदुस :
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पुं० [सं० टिडिश] डेंडसी नामक पौधा और उसका फल। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेंदू :
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पुं० [सं० तिंदुक] १. ऊँचे कद का एक प्रसिद्ध वृक्ष जिसके पत्ते शीशम की तरह गोल नोकदार और चिकने होते है और लकड़ी काली और मजबूत होती है। आबनूस। २. उक्त पेड़ का फल जो नीबू के आकार का होता है और वैद्यक में वातकारक माना गया है। ३. एक तरह का तरबूज। (पश्चिम)। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेन :
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पुं० [सं० ते=गौरी+न-शिव, ब० स०] गीत का आरंभिक स्वर। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेम :
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पुं० [सं०√तिम्(गीला होना)+घञ्] आर्द्ध होने की अवस्था या भाव। आर्द्रता। अव्य०=तिमि (उस प्रकार)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेमन :
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पुं० [सं०√तिम्+ल्युट्-अन] १. आर्द्रता। २. चटनी। ३. व्यंजन। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेमनी :
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स्त्री० [सं० तेमन+ङीष्] चूल्हा। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेमरू :
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पुं० [देश०] १. तेदूं का पेड़। आबनूस। २. उक्त पेड़ की लकड़ी। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेरज :
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पुं० [देश०] वह लेखा जिसमें आय-व्यय की विभिन्न मदों का उल्लेख हो। खतियौनी का गोशवारा। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेरवाँ :
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वि०=तेरहवाँ।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेरस :
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स्त्री० [सं० त्रयोदश] चांद्रमास के किसी पक्ष की तेरहवीं तिथि या दिन। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेरह :
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वि० [सं० त्रयोदस, प्रा० तेद्दह, अर्द्धमा, तेरस] जो गिनती या संख्या में दस से तीन अधिक हो। पं० उक्त की सूचक संख्या और अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है।–१३। मुहावरा–तीन तेरह होना–दे० तीन के अन्तर्गत मुहा। तेरह बाइस करना–टाल-मटोल या बहानेबाजी करना। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेरहवाँ :
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वि० [हिं० तेरह+वाँ (प्रत्यय)] क्रम या संख्या के विचार से तेरह के स्थान पर पड़ने या होनेवाला। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेरहीं :
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स्त्री० [हिं० तेरह+ई(प्रत्यय)] हिंदुओं में, किसी के मरने के दिन से तेरहवाँ दिन। विशेष–इसी दिन अनेक प्रकार के कृत्य औ पिंडदान आदि कराकर मृतक से संबंधी शुद्ध होते हैं। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेरहुत :
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पं०=तिरहुत।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेरा :
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सर्व० [सं०तव] [स्त्री०तेरी] मध्यम पुरूष एकवचन संबध कारक अर्थात् षष्ठी का सूचक सर्वनाम। तू का संबंधकारक रूप। जैसे–तेरा नाम क्या है। मुहावरा–तेरा मेरा करना-यह कहना कि यह तुम्हारा और वह हमारा है,अर्थात् दूजायगी या पार्थक्य के भाव से युक्त बातें करना।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेरुस :
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पुं०=त्यौरूस।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) स्त्री०=तेरस। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेरे :
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सर्व० [हिं० तेरा] १. हिं० तेरा का बहुवचन रूप। जैसे–तेरे बाल-बच्चे। २.हिं०तेरा का वह रूप जो उसे विभक्ति लगने पर प्राप्त होता है। जैसे–तेरे सिर पर। अव्य० [हिं० ते० या ते] १. से। २. तुझसे।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेरो :
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सर्व०=तेरा।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेल :
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पुं० [सं०तैल] १.तिल अथवा किसी तेलहन के बीजों अथवा कुछ विशिष्ट वनस्पतयों को पेरकर निकाला हुआ प्रसिद्ध स्निग्ध दह्म तरल पदार्थ जो खाने-पकाने, जलाने, शरीर में मलने अथवा औषध आदि के काम में आता है। चिकना। स्नेह० जैसे–तिल नीम बदाम या सरसों का तेल। मुहावरा–तेल में हाथ डालना-अपनी सत्यता प्रमाणित करने के लिए खौलते हुए तेल में हथ डालना। (मध्य युग की एक प्रकार की परीक्षा) आँखों का तेल निकालना-ऐसा परिश्रम करना जिससे आँखों को बहुत अधिक कष्ट हो। २.विवाह की एक रीति जो साधारणतः विवाह से दो दिन और कहीं-कहीं चार-पाँच दिन पहले भी होती है और जिसमें वर अथवा वधू के शरीर में हल्दी मिला हुआ तेल लगाया जाता है। मुहावरा–तेल उठना या चढ़ना-विवाह से पहले उक्त रीति का सम्पादन होना। तेल चढ़ाना-उक्त रीति का संपादन करना। ३.पशुओं के शरीर से निकलनेवाली पतली चरबी जो सहज में जल सकती और दवा रंगाई आदि के काम में आती है। जैसे–मगर या साँड़े का तेल। ४.कुछ विशिष्ट प्रकार के खनिज द्रव्य पदार्थ जो सहज में जल सकते है। जैसे–मिट्टी का तेल। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेलंग :
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पुं०=तैलंग।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेलगू :
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पु०स्त्री०=तेलुगू। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेलचलाई :
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स्त्री० [हिं०तेल+चलाना] दे०मिडा़ई (छींट की छपाई की)। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेलवाई :
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पुं० [हिं० तेल+वाई(प्रत्यय)] १. शरीर में तेल मलने या लगाने की क्रिया, भाव या मजदूरी। २. विवाह की एक रसम जिसमें कन्या |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेलसुर :
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पुं० [१] एक तरह का लंबा वृक्ष जिसकी नावें आदि बनाने के काम आती है। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेलहड़ा :
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पुं० [हिं० तेल+डंडा] [स्त्री० अल्पा० तेलहँड़ी] १. मिट्टी की वह हाँड़ी जिसमें तेल रखा जाता हो। २. तेल रखने का कोई पात्र। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेलहन :
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पुं० [सं०तैल धान्य] कुछ वनस्पतियों के वे बीज जिन्हें पेरने से उनमें से चिकना और तरल पदार्थ (अर्थात् तेल) निकलता हो। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
तेलहा :
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वि० [हिं० तेल] [स्त्री० तेलही] १. जिसमें तेल हो (बीज या पौधा) २. तेल के योग से बना या पका हुआ। जैसे–तेल ही जलेबी। ३. जिस पर तेल गरा या लगा हो। ४. जिसमें तेल की सी गंध या चिकनाहट हो। |
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तेला :
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पुं० [हिं० तीन] वह उपवास जो तीन दिनों तक बराबर चलें। |
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तेलिन :
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स्त्री० [हिं० तेली का स्त्री] १. तेंली की या तेली जाति की स्त्री। २. एक प्रकार का छोटा बरसाती कीड़ा जिसके स्पर्श से शरीर में जलन होने लगती है। |
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तेलियर :
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पुं० [देश०] एक तरह का पक्षी जिसके काले रंग के शरीर पर सफेद रंग की बहुत सी चित्तियाँ होती है। |
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तेलिया :
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वि० [हिं० तेल] १. जो तेल की तरह चमकीला और चिकना हो। २. तेल की तरह हलके काले रंगवाला। ३. जिसमें तेल होता या रहता हो। तेल से युक्त। पुं० १. तेल की तरह का काला और चमकीला रंग। २. उक्त रंग का घोड़ा। ३. एक प्रकार का कीकर या बबूल। ४. कोई ऐसा पक्षी या पशु जिसका रंग तेल की तरह काला और चिकना हो। ५. सींगिया नामक विष। स्त्री० एक प्रकार की छोटी मछली। |
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तेलिया गर्जन :
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पुं० [सं०]=गर्जन। |
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तेलिया-कत्था :
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पुं० [हिं० तेलिया+कत्था] एक तरह का कत्था या खैर जो तेल की तरह कुछ काला पन लिये होता है। |
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तेलिया-कंद :
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पुं० [सं० तैल+कंद] एक प्रकार का कंद। विशेष–यह कंद जिस भूमि में होता है वह तेल से सीची हुई जान पड़ती है। |
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तेलिया-काकरेजी :
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पुं० [हिं० तेलिया+काकरेजी] कालापन लिये गहरा ऊदा रंग। वि० उक्त प्रकार के रंग का। |
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तेलिया-कुमैत :
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पुं० [हिं० तेलिया+कुमैत] १. घोड़े का एक रंग जो अधिक कालापन लिये लाल या कुमैत होता है। २. उक्त रंग का घोड़ा। |
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तेलिया-पाखान :
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पुं० [हिं० तेलिया+पखान] एक तरह का चिकना और मजबूत पत्थर। |
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तेलिया-पानी :
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पुं० [हिं० तेलिया+पानी] वह जल जिसमें कुछ चिकनाहट हो अथवा जिसका स्वाद तेल जैसा हो। |
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तेलिया-मुनिया :
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स्त्री० [हिं] मुनिया पक्षी की एक जाति। इस मुनिया के ऊपर और नीचे के पर बादामी रंग के सिर ठोड़ी तथा गला कत्थई रंग का होता है। |
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तेलिया-मैना :
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स्त्री० [हिं०] एक तरह की मैना। तिलारी। |
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तेलिया-सुरंग :
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पुं०=तेलिया कुमैत। |
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तेलिया-सुहागा :
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पुं० [हि० तेलिया+सुहागा] एक तरह का सुहागा जिसमें कुछ चिकनापन होता है। |
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तेली :
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पुं० [हिं० तेल+ई (प्रत्यय)] [स्त्री० तेलिन] १. वह जो तेलहन पेरकर तेल निकालता और बेचता हो। २. हिंदुओं में एक जाति जो उक्तकाम व्यवसाय के रूप में करती है। पद–तेली का बैल-वह जो अपना अधिकतर समय बहुत ही तुच्छ और परिश्रम के कामों में लगाता हो। |
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तेलुगू :
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पुं० [सं० तैलंग] १. तैलंग देश का आधुनिक नाम। २. उक्त देश का निवासी। स्त्री० तैलंग देश का भाषा। |
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तेलौंची :
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स्त्री० [हिं० तेल+औंची (प्रत्यय)] तेल रखने की प्याली। |
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तेलौना :
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वि० [हिं० तेल+औना (प्रत्यय)] [स्त्री० तेलौनी] दे० ‘तेलहा’। |
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तेवई :
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स्त्री०=तिरिया (स्त्री)। |
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तेवट :
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स्त्री० [देश०] संगीत में सात दीर्घ अथवा चौदह लघु मात्राओं का एक ताल जिसमें तीन आघात और एक खाली रहता है। |
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तेवड़ा :
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पुं० [?] एक तरह का ताल। |
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तेवन :
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पुं० [सं०√तेव् (खेलना)+ल्युट्-अन] १. महल के आगे का एक छोटा बाग। नजरबाग। २. आमोद-प्रमोद,क्रीड़ा आदि करने का वन। ३. आमोद-प्रमोद। क्रीड़ा।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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तेवर :
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पुं० [सं० त्रिकुटी, पुं० हिं० तिउरी] १. किसी विशिष्ट उद्देश्य या भाव से किसी की ओर फेरी जानेवाली या किसी पर डाली जानेवाली दृष्टि त्योरी। जैसे–उनके तेवर देखकर ही मैंने उनके मन का भाव समझ लिया था। मुहावरा–तेवर चढ़ना-भौंहों का इस प्रकार ऊपर की ओर खिंचना कि उनसे कुछ-कुछ क्रोध या नाराजगी झलकने लगे। केवर बदलना या बिगड़ना-व्यवहार में क्रोध या रूखाई प्रकट करना। २. भौंह। भुकुटी। पुं० [हिं० तीन] स्त्रियों के पहनने के तीन कपडों (साड़ी, ओढ़नी और चोली) की सामूहिक संज्ञा। |
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तेवरसी :
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स्त्री० [देश०] १. ककड़ी। २. खीरा। ३. फूट। |
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तेवरा :
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पुं० [देश०] दून में बजनेवाला रूपक ताल। |
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तेवराना :
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अ० [हिं० तेवर+आना (प्रत्यय)] १. तेवर का इस प्रकार ऊपर की ओर खिंचना कि उससे कुछ आश्चर्य क्रोध या चिन्ता प्रकट हो। २. बेसुध या मूर्च्छित होना। |
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तेवरी :
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स्त्री०=त्योरी। |
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तेवहार :
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पुं०=त्योहार। |
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तेवान :
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पुं० [देश०] सोच-विचार। चिंता। फिक्र।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) |
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तेवाना :
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अ० [हिं० तेवान] चिंतित होना। फिक्र करना। उदाहरण–ठाढ़ि तेवानि टेकिकर लंका।–जायसी। |
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तेह :
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पुं० [सं० तस्-तिरस्कृत करना, दूर हटाना] १. क्रोध। गुस्सा। तेहा। २. अभिमान। घमंड। ३. तेजी। तीव्रता। ४. प्रचंडता।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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तेहर :
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स्त्री० [सं० त्रि+हिं० हार] तीन लड़ों की करधनी जो स्त्रियाँ कमर में पहनती है। |
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तेहरा :
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वि० [हिं० तीन+हरा] [स्त्री० तेहरी] १. तीन तहों या परतों में लपेटा हुआ। २. जिसमें तीन तहें या परतें हो। ३. जो दो बार हो चुकने के बाद फिर से तीसरी बार करना पड़े या किया गया हो। जैसे–तेहरा काम, तेहरी मेहनत। ४. जो एक साथ तीन हों। ५. तिगुना। (क्व०)। |
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तेहराना :
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स० [हिं० तेहरा] १. लपेटकर तीन तहों या परतों में करना। २. कोई काम दो बार कर चुकने के बाद कोर-कसर ठीक करने के लिए फिर से तीसरी बार करना, जाँचनाया देखना। |
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तेहवार :
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पुं०=त्योहार।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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तेहा :
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पुं० [सं० तस्-तिरस्कृत या दूर करना] १. अपने अभिमान, बड़प्पन, महत्त्व आदि की भावना से उत्पन्न होनेवाला ऐसा हलका क्रोध या गुस्सा हो २. क्रोध। गुस्सा। ३. अभिमान। घमंड। |
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तेहि :
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सर्व० [सं० ते] उसे। उसको।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) |
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तेही :
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पुं० [हिं० तेह+ई (प्रत्यय)] १. जिसमें तेहा हो या जो तेहा दिखलाता हो। क्रोधी। २. अभिलाषा घमंडी। |
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तेहेदार :
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पुं०=तेही। |
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तेहेबाज :
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पुं०=तेही। |
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