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गीता प्रेस, गोरखपुर >> संत महिमा

संत महिमा

जयदयाल गोयन्दका

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :49
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1116
आईएसबीएन :00000

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संत महिमा ...

Sant Mahima -A Hindi Book by Jaydayal Goyandaka - संत महिमा - जयदयाल गोयन्दका

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सन्त-महिमा

संतभाव की प्राप्ति भगवत्कृपा से होती है


संसार में संतों का स्थान सबसे ऊँचा है। देवता और मनुष्य, राजा और प्रजा—सभी सच्चे संतों को अपने से बढ़कर मानते हैं। संत का ही जीवन सार्थक होता है। अतएव सभी लोगों को संत भाव की प्राप्ति के लिये भगवान् के शरण होना चाहिये। यहाँ एक प्रश्न होता है कि ‘संतभाव की प्राप्ति प्रयत्न से होती है या भगवत्कृपा से अथवा दोनों से ? यदि यह कहा जाय कि वह केवल प्रयत्न-साध्य है तो सब लोग प्रयत्न करके संत क्यों नहीं बन जाते ? यदि कहें कि भगवत्कृपा से होती है तो भगवत्कृपा सदा सबपर अपरिमित है ही, फिर सबको संतभावकी प्राप्ति क्यों नहीं हो जाती ? दोनों से कही जाय तो फिर भगवत् कृपा का महत्त्व ही क्या रह गया, क्योंकि दूसरे प्रयत्नों के सहारे बिना केवल उससे भगवत्प्राप्ति हुई नहीं ?’ इसका उत्तर यह है कि भगवत्प्राप्ति यानी संतभाव की प्राप्ति भगवत्कृपा से ही होती है। वास्तव में भगवतप्राप्त पुरुषको ही, संत कहा जाता है। ‘सत्’ पदार्थ केवल परमात्मा है और परमात्मा के यथार्थ तत्त्व को जो जानता है और उसे उपलब्ध कर चुका है वही संत है। हाँ गौणी वृत्ति से उन्हें भी संत कह सकते हैं जो भगवत्प्राप्ति के पात्र हैं,
क्योंकि वे भगवत्प्राप्तिरूपी लक्ष्य के समीप पहुँच गये हैं और शीघ्र उन्हें भगवत्प्राप्ति की सम्भावना है। इसपर यह शंका होती है कि जब परमात्मा की कृपा सभीपर है, तब सभी को परमात्मा की प्राप्ति हो जानी चाहिये; परंतु ऐसा क्यों नहीं होता ? इसका उत्तर यह है कि ‘यदि परमात्मा की प्राप्ति की तीव्र चाह हो और भगवत्कृपा में विश्वास हो तो सभी को प्राप्ति हो सकती है। परंतु परमात्मा की प्राप्ति चाहते ही कितने मनुष्य हैं, तथा परमात्मा की कृपा पर विश्वास ही कितनों को है ? जो चाहते हैं और जिनका विश्वास है उन्हें प्राप्ति होती ही है।

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