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रहस्य-रोमांच >> घर का भेदी

घर का भेदी

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : ठाकुर प्रसाद एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :280
मुखपृष्ठ : पेपर बैक
पुस्तक क्रमांक : 12544
आईएसबीएन :1234567890123

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अखबार वाला या ब्लैकमेलर?


“आप वहां कहां जायेंगे?"
"गोपाल बतरा की कोठी पर। उसके चौथे में शामिल होने।"
"आप बतरा को जानते थे?"
"बाखूवी। वो मेरा तब से वाकिफकार था जब कि वो एक. मामूली क्राइम रिपोर्टर के तौर पर जूतियां चटकाता फिरता था।"
“आप को मालूम है न कि आपका जिगरी यार उसी के कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार है?"
"हां। मालूम है। बुरे कामों के नतीजे बुरे ही होते हैं। सूरी को ये बात समझनी चाहिये थी।"
"बाज लोग आसानी से कुछ नहीं सीखते। आइये चलें।"
मजूमदार के साथ सुनील बतरा की कोठी पर पहुंचा।
तव दिवंगत गोपाल बतरा के उठाले के निर्धारित वक्त में अभी पौना घंटा बाकी था लेकिन काफी लोग वहां पहुंच चुके थे। पहुंचे हुए लोगों में सुनील को गुजश्ता पार्टी के नौजवान मेहमानों का जमघट-जिन में कि अर्जुन भी था-लेखक सागर संतोषी, तीन-चार पत्रकार और घर के लोग बाग दिखाई दिये। कोठी के सामने लॉन में एक शामियाना खड़ा था जिसके नीचे दरियां बिछी हुई थीं लेकिन फिलहाल वहां कोई भी नहीं बैठा हुआ था। सब लोग या कोठी के सामने बरामदे में थे या भीतर हाल में थे और या ड्राईंगरूम में थे।
“जल्दी पहुंच गये।"-सुनील बोला।
मजूमदार ने अनमने भाव से सहमति में सिर हिलाया और फिर एकाएक बोला- “वो तो सागर संतोषी जान पड़ता है।"
सुनील ने उसकी निगाह का अनुसरण किया और फिर बोला-“वो ही है।"
“बहुत बड़ा लेखक है। मैं इसके नावल रेगुलर पढ़ता हूं।"
"फिर आप का तो बन गया काम । जाकर उससे गपशप कीजिये. बताइये कि आप उसके फैन हैं. खुश हो जायेगा। अच्छा टाइम पास हो जायेगा आपका।"
"मैं क्या गपशप करूंगा उससे?"
"कुछ भी। लेखक तारीफ का भूखा होता है। जरा सी हवा दीजियेगा उसे, फिर देखियेगा, उसी की वाणी ऐसी मुखर होगी कि आपको कुछ कहना ही नहीं पड़ेगा।"
वो मुस्कराया और फिर सहमति में सिर हिलाता लेखक की तरफ बढ़ चला।
सुनील अर्जुन के पास पहुंचा।
"क्या खबर है?"वो बोला।
"अच्छी खबरियां हैं। पहले घर वाली सुनाऊं या बाहर वाली?"
"घर वाली?"
“मैंने बहुत मेहनत कर के एक वीडियो लायब्रेरी में से 'खून खिलाड़ी का' की कैसेट खोज निकाली थी। गुरु जी, वो फिल्म वाकई देखने लायक है।"
"तू बस ये बताने के लिये उस फिल्म का जिक्र कर रहा है?"
"नहीं। ये बताने के लिये कर रहा हूं कि उसके क्रेडिट्स में गोपाल कृष्ण बतरा मरहूम का नाम कहीं नहीं था लेकिन सागर संतोषी का नाम स्टोरी, स्क्रीनप्ले और डायलाग्ज़ जैसे तीन महत्वपूर्ण डिपार्टमेंट्स में था।"
"फिर तो वो ही फिल्म का लेखक हुआ, भले ही उसमें बतरा ने कितना भी काम क्यों न किया हो।"
"बिल्कुल।"
“अब बाहर वाली बोल।"
“यहां सोमवार वाली पार्टी के सब मेहमान मौजूद हैं। आप की ताकीद के मुताबिक मैंने खुद इस बात का खयाल रखा है कि उस रात की संचिता की पार्टी का कोई भी मेहमान यहां से गैरहाजिर न हो। तानिया तक मौजूद है।"
"अरे! वो तो डिएडिक्शन सेंटर में भरती थी।"
"वापिस वहीं पहंच जायेगी। उसका डॉक्टर उसे नहीं जाने दे रहा था लेकिन वो ही बोली कि अगर आपने उसे बुलाया था तो वो जरूर जायेगी।"
"कमाल है!"
"गुरु जी, क्या जादू करते हो लड़कियों पर? मुझे भी तो सिखाओ।"
"सिखाऊंगा। कभी गुड़ की भेली और पगड़ी लेकर आना। अभी मेन लाइन पर ही रह ब्रांच लाइन पर मत जा।"
“आज्ञा शिरोधार्य, गुरु जी।"
“पंकज नहीं दिखाई दे रहा।"
“संचिता भी नहीं दिखाई दे रही होगी।"
"वजह?"
"बड़े कमीने हैं ये लोग, गुरु जी। पुच पुच का कोई मौका नहीं छोड़ते। मैं संचिता की तलाश में पिछवाड़े में गया था तो दोनों पैन्ट्री में मुझे एक दूसरे की बांहों में दिखाई दिये थे।"
“ओह! सब को ये कहा था कि वो उन्हीं पोशाकों में यहां पहुंचें जिन्हें पहन कर वो पार्टी के रोज यहां आये थे?"
"हां". "जूतों समेत?" "हां" "सब मान गये?"
"मान ही गये। जो मेरे कहे नहीं माने थे, उन्हें संचिता ने मना लिया था।"
“गुड। अब सब को ऊपर वाले हाल कमरे में जमा कर।" “वो तो मैं करता हूं लेकिन इरादा क्या है, गुरु जी?" ।

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