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रहस्य-रोमांच >> घर का भेदी

घर का भेदी

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : ठाकुर प्रसाद एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :280
मुखपृष्ठ : पेपर बैक
पुस्तक क्रमांक : 12544
आईएसबीएन :1234567890123

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अखबार वाला या ब्लैकमेलर?


“इरादा कातिल को पकड़ने का ही है।" . “जो कि मौजूद लोगों में से कोई है?"
"हो सकता है। एक तजुर्बा है मेरी निगाह में जिसका कोई माकूल नतीजा निकला तो ठीक, नहीं तो कोई और घर तलाशेंगे।"
“ठीक है। मैं इन्तजाम करता हूं।"
अर्जुन चला गया।
पीछे सुनील ने एक सिगरेट सुलगा लिया और प्रतीक्षा करने लगा।
थोड़ी देर बाद सीढ़ियों के ऊपरले दहाने से अर्जुन ने उसे इशारा किया।
सुनील ने सिगरेट फेंक दिया और लापरवाही से टहलता सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।
तभी एक जीप बाहर पहुंची जिसमें से उसने सादे कपड़े पहने इन्स्पेक्टर चानना को बाहर कदम रखते देखा।
वो ऊपर पहुंचा।
सब हाल कमरे में जमा थे। कुछ कुर्सियों पर बैठे हुए थे तो कुछ दो-दो तीन-तीन के ग्रुपों में खड़े थे। वहां अर्जुन के अलावा जो पहचानी सूरतें सुनील को दिखाई दीं, वो संचिता, पंकज और तानिया की थीं।
“हैल्लो, एवरीबाड़ी।" --सुनील संजीदा लहजे में बोला-. . “आप सब लोग संचिता के दोस्त हैं इसलिये उम्मीद करता हूं कि उसके हितचिन्तक भी होंगे। संचिता के जीजा के कत्ल की वारदात से आप सब लोग वाकिफ हैं और आप जरूर-जरूर चाहते होंगे कि कातिल पकड़ा जाये और उसे उसकी करतूत की सजा मिले।"
“वो तो हम चाहते हैं।"--कोई बोला- "लेकिन कातिल का यहां क्या काम? वो हम लोगों में से कोई कैसे हो सकता है, हम में से किसी ने तो वारदात के वक्त तक नीचे कदम भी नहीं रखा था।"
“ये बात सच नहीं है। तानिया इस बात की तसदीक करेगी कि ये बात सच नहीं है। खुद ये ही पार्टी छोड़ कर नीचे गयी थी और किसी को भनक तक नहीं लगी थी।"
सब की निगाहें तानिया की तरफ उठीं। तानिया का सिर सहमति में हिला।
"ऐसा इसने क्यों किया था"-सुनील बोला- “कैसे किया था, ये बात इस वक्त अहम नहीं। अहम बात ये है कि जब प्रत्यक्षतः न हो सकने वाला काम कोई एक जना कर सकता था तो कोई दूसरा जना भी कर सकता था। आप लोगों के सहयोग से मैं यहां एक तजुर्बा करना चाहता हूं जो ये स्थापित करेगा कि ऐसा कोई दूसरा शख्स असल में था या नहीं!"
"हम लोगों में?" पंकज बोला। "जाहिर है।"
"हम लोगों में ही क्यों?"
"क्योंकि आप ही लोगों का ये दावा है कि आप लोगों में से कोई वारदात के वक्त से पहले नीचे नहीं गया था।"
"ये तो साफ-साफ इलजाम लगाना हुआ कि कातिल हम में से कोई है।"
हो सकता है। है या नहीं है, इसी बात को तो मेरा तजुर्बा स्थापित करेगा।".
"कैसा तजुर्बा? क्या करोगे तुम?"
"मैं कुछ नहीं करूंगा। जो करेंगे, आप लोग ही करेंगे।"
“क्या?"
“यहां इन साथ-साथ लगी दो मेजों के गिर्द उतनी ही कुर्सियां मौजूद हैं जितने कि आप सब लोग हैं। आपने सिर्फ याद करना है कि उस रात कौन किस कुर्सी पर विराजमान था!"
"मुझे तो याद नहीं" -संचिता बोली-“कि मैं कौन सी कुर्सी पर बैठी थी।"
“कोई बड़ी बात नहीं। ऐसा औरों के साथ भी हो सकता है लेकिन एक की याददाश्त कोई दूसरा तरोताजा कर सकता है।"
"क्या मतलब?"
"तुम्हें ये जरूर याद होगा कि तुम्हारे दायें-बायें कौन बैठे थे। तुम्हें नहीं तो उन्हें याद होगा कि उनके बीच में तुम कहां बैठी थीं?"
“ओह!"
“कहने का मतलब ये है कि आप अपने अपने नोट्स एक्सचेंज कीजिये, आपस में निर्धारित कीजिये कि कौन कहां था, और फिर अपनी कुर्सी पर विराजिये।"
“बस!" --पंकज.बोला। .
"हां। मामूली जहमत है ये।"
"इतने से पता चल जायेगा कि कातिल कौन है?"
"कुछ तो पता चलेगा ही।”
“ये बेकार की ड्रिल है।"
"तुम्हें इस ड्रिल से ऐतराज है?"
“हरगिज नहीं। ऐतराज क्यों होगा? अगर इतने से कातिल का कोई अता पता चल सकता है तो ... तो आई कैन डू इट फार ए काज़।"
“गुड। नाओ गो अहेड ऐवरीबाडी।"
तत्काल सब व्यस्तता दिखाने लगे और हाल में, 'मैं यहां था, तू वहां थी। मेरे दायें पहलू में तू था, तेरे बाजू में मैं थी' जैसी आवाजें गूंजने लगीं।
आखिर में जब माहौल शान्त हुआ तो सब बैठे हुये थे और केवल सुनील खड़ा था।
“आप लोग गारन्टी करते हैं" -सुनील बोला-"कि उस रात भी आप ऐसे ही बैठे हुए थे जैसे कि इस वक्त बैठे हुए हैं?"
सबने सम्वेत स्वर में हामी भरी।
“गुड। मेरा तजुर्बा खत्म हुआ। आप सब लोग नीचे जा सकते हैं।"
सब उठने लगे।

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