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रहस्य-रोमांच >> घर का भेदी घर का भेदीसुरेन्द्र मोहन पाठक
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अखबार वाला या ब्लैकमेलर?
"सिवाय पंकज सक्सेना के।"
पंकज बुरी तरह से चौंका। बाकी सब लोग भी चौंके । सबकी सशंक निगाहें पंकज पर
पड़ी।
तुम्हारा मतलब है कि" -संचिता अप्रसन्न भाव से बोली-“कि..."
“अभी मेरा कोई मतलब नहीं। मेरा जो मतलब है, वो जल्दी ही सामने आ जायेगा। अभी
आप मेरा कहना मान कर एक अच्छी मेजबान बनिये और सब को नीचे लेकर जाइये।"
"लेकिन.....”
"सुना नहीं!" -सुनील चिल्ला कर बोला।
तत्काल सब लोग वहां से बाहर को चल दिये। पंकज ने भी उठने का उपक्रम किया तो
सुनील के इशारे पर अर्जुन ने उसे कंधों से थाम लिया और कुर्सी से उठने न
दिया।
हाल खाली हो गया तो सुनील उसके करीब पहंचा। उसने मेज को पकड़ कर यूं परे
सरकाया कि उसकी कुर्सी के सामने का लकड़ी का फर्श नंगा हो गया।
उसने घूर कर पंकज को देखा।
"क....क्या है?" -वो बोला।
“क्या मेरे मुंह पर नहीं है। फर्श पर है। नीचे देखो।"
"क...क्या देखूं?"
“लकड़ी के फर्श पर आड़ी तिरछी खिंची कुछ महीन लकीरें दिखाई दे रही हैं। ?"
"हां।"
"कैसे बनी ये लकीरें?"
"मुझे क्या पता कैसे बनी?"
"इस कुर्सी पर उस रोज भी तुम ही बैठे हुए थे, इसलिये तुम्हारे बनाये बनीं।
कुर्सी पर बैठा आदमी अपने सामने फर्श पर जूते घिसता ही रहता है। ये फर्श
लकड़ी की टाइलों का है इसलिये ये लकीरें तुम्हारे जूते में पैवस्त किसी तीखी
चीज़ की खरोंचों से बनीं। यही जूते तुम उस रोज भी पहने हुए थे?"
"हां।" "उतारो।" "लेकिन....”
“इन्स्पेक्टर चानना नीचे पहुंचा हुआ है। हुज्जत करनी है तो मैं उसे बुलाता
हूं।"
"मैं....मैं उतारता हूं।"
"गुड।"
उसने जूते उतारे तो सुनील ने उन्हें अपने अधिकार में ले लिया। उसने उन्हें
उलट कर उनके सोल का मुआयना किया तो पाया कि वे रबड़ सोल था और दोनों तलों के
अग्रभाग में कांच की महीन किंचें पैवस्त थीं। उसने उनकी तरफ पंकज का ध्यान
आकर्षित किया और बोला- “फर्श की खरोंचें तुम्हारे जूतों में पैवस्त कांच से
बनीं।"
"तो क्या हुआ?"-वो दिलेरी से बोला।
"कांच का रंग शर्बती है जैसा कि वियर की बोतल का होता है।"
"तो भी क्या हुआ? मेरा कहीं किसी टूटी बोतल पर पांव पड़ गया होगा।"
“दोनों पांव?"
"दोनों सही।"
"बियर की चकनाचूर बोतल के कांच के छोटे-छोटे टुकड़े नीचे स्टडी की खिड़की के
बाहर उसके ऐन नीचे मौजूद हैं। तुम्हारे जूतों में वहां से कांच के टुकड़े तब
पैवस्त हुए थे, जब कि तुमने वहां खड़े होकर भीतर मौजूद बतरा को शूट किया था।"
"नहीं।"
“वहां से तुम सीधे यहां लौटे थे और अपनी सीट पर बैठ गये थे। तब अभी तुम चंद
ही कदम चले थे-वो भी ज्यादातर घास पर-इसलिये जूतों पर बदन के भार का दबाव
पड़ने की वजह से ये कांच के टुकंड़े पूरे ही सोल में नहीं घुस गये थे और यूं
तुम्हारे वापिस आकर बैठने के बाद लकड़ी के फर्श पर ऐन तुम्हारी कुर्सी के
सामने खरोंचे बन गयी थीं। ये खरोंचें परसों मुझे दिखाई दी थीं, मैं तभी समझ
गया था कि जो कोई भी इस कुर्सी पर बैठा था, वो कातिल था।"
"तो खामोश क्यों रहे?"
"इस इन्तजार में खामोश रहा कि जो कुछ मुझे दिखाई दिया वो पुलिस को भी दिखाई
देता। लेकिन वो क्योंकि किसी और को ही कातिल साबित करने की जिद ठाने हुए थे
इसलिये उनकी सारी तवज्जो कहीं और ही थी। सूरी की गिरफ्तारी के बाद तो
उन्होंने मौकायवारदात की कोई अतिरिक्त जांच पड़ताल बिल्कुल ही गैरजरूरी मान
ली थी। इसलिये जो मैंने देखा, वो पुलिस ने न देखा। दूसरे, पार्टी के तमाम
मेहमानों को यहां इकट्ठा करना जहमत का काम था लेकिन आज बतरा के चौथे और उठाले
वाले रोज सबने वैसे ही आना था इसलिये मैंने अपने तजुर्बे के लिये आज का दिन
चुना और यूं कातिल की शिनाख्त हुई।"
"मैं कातिल नहीं हूं। पार्टी के तमाम मेहमान मेरे गवाह हैं कि मैं यहां से उठ
के नीचे नहीं गया था।"
"तुम गये थे। तभी खिड़की के करीब से ये कांच तुम्हारे जूतों में चुभे।"
'"उस वारदात को हुए चार दिन हो गये हैं। पिछले चार दिनों में ये कांच मेरे
जूतों में कहीं से भी चुभे हो सकते हैं।"
“कुबूल लेकिन ये फर्श पर खरोंचें नहीं बना सकते थे। तले पर हाथ फेर कर देखो।
अब ये कांच सोल में यूं पैवस्त हैं कि इनकी कोई नोक सोल से बाहर नहीं है जो
कि होती तो आज तम्हारे सामने के फर्श पर फिर ताजा खरोंचें बन गयी होतीं। कोई
ताजा खरोंच फर्श पर मौजूद नहीं है और न ही पार्टी की रात के बाद से तुमने
वापिस यहां कदम रखा है। इससे साबित होता है कि खरोंचे तभी बनीं जबकि कांच
तुम्हारे जूतों में ताजा ताजा पैवस्त हुए थे और चलने फिरने की वजह से अभी वो
बिल्कुल ही सोल में नहीं धंस गये थे। प्यारेलाल, ये खरोंचें तुम्हारे जूतों
से बनी और कत्ल की रात को तब बनीं जब कि तुम कत्ल करके लौटे ही थे।"
"बिल्कुल झूठ। में फिर कहता हूं कि पार्टी के तमाम मेहमान मेरे गवाह हैं कि
मैं यहां से उठकर नीचे नहीं गया था।"
"क्या बाथरूम में भी नहीं गये थे?"
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