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रहस्य-रोमांच >> घर का भेदी

घर का भेदी

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : ठाकुर प्रसाद एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :280
मुखपृष्ठ : पेपर बैक
पुस्तक क्रमांक : 12544
आईएसबीएन :1234567890123

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अखबार वाला या ब्लैकमेलर?


"ब... बाथरूम में?"
"हां। बाथरूम में। जो कि बगल के कमरे के साथ-संचिता के बेडरूम के साथ-अटैच्ड है। वो वैट पार्टी थी। तुम हैवी ड्रिंकर हो। ढेर विस्की पीने से बाथरूम जाने की जरूरत पड़ ही जाती है। किसी दारू मास्टर के गाहे बगाहे बाथरूम जाने की तरफ कौन ध्यान देता है! बाथरूम मैंने देखा है। उसमें कोठी के पहलू में खुलने वाली एक खिड़की है जिसके करीब से ड्रेन पाइप गुजरता है। तुम्हारे जैसे किसी नौजवान आदमी के लिये उस पाइप के जरिये नीचे उतर जाना और फिर वापिस चढ़ आना क्या बड़ी बात थी! संचिता से आशनाई की वजह से तुम इस हाउसहोल्ड में पूरी तरह से स्थापित हो, तुम्हारे लिये बतरा की स्टडी से उसका एक रिवॉल्वर चुरा लेना क्या बड़ी बात थी!"
“मैंने स्टडी में कदम रखा होता तो किसी ने मुझे जरूर देखा होता।" ". “वारदात की रात को। क्योंकि तब यहां बहुत लोग जमा थे और बाहर कारीडोर में और सीढ़ियों पर भी खूब आवाजाही थी लेकिन गुलेगुलजार, मैंने ये कब कहा कि रिवॉल्वर भी तुमने कत्ल की रात को ही चोरी की?"
"तो....तो...."
"वो तो तुम कभी भी चोरी कर सकते थे और आइन्दा इस्तेमाल के लिये अपने पास रख सकते थे। इसलिये वारदात की रात को तुम्हारा स्टडी में जाना जरूरी नहीं था। ऐसे ही तुम ड्राईंगरूम की खिड़की की चिटकनी की आंख भी भीतर की तरफ से कभी भी कमजोर कर सकते थे। प्यारेलाल, तुमने वारदात से पहले ही उस खिड़की को यूं सैट किया हुआ था कि बाहर से धक्का देने पर वो खुल सकती थी। यानी कि तम्हारे कत्ल के इरादे में बंद खिड़की विघ्न नहीं बन सकती थी। वो तुम्हें खुली मिलती तो बात ही क्या थी! बन्द मिलती तो तुम जानते थे कि वो बाहर से धक्का देने पर खुल सकती थी।"
उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी।
“अब इजाजत हो तो मैं इंस्पेक्टर चानना को यहां बुलाऊं ताकि वो तुम्हारा इकबालिया बयान दर्ज कर ले और तुम्हारी जगह गिरफ्तार एक बेगुनाह पुलिस कस्टडी से निजात पाये।"
"मैंने कत्ल नहीं किया।"-वो कंपित स्वर में बोला।
"हा हा हा। जोक बढ़िया है। एक और सुनाओ।"
"मेरी बात सुनो। प्लीज, मेरी बात सुनो।"
“क्या सुनूं?"
"मैंने कत्ल नहीं किया।" "अरे! तुमने तो सच में ही एक जोक और सुना दिया।"
"पहले मेरी पूरी बात सुन लो, फिर जो मर्जी कहना।"
"ठीक है। सुनाओ।"
"मैंने उस रात बतरा के कत्ल का सामान किया था लेकिन मेरे किये उस की जान जाने की नौबत नहीं आयी थी।"
"तुमने क्या किया था?”
"मैंने एक प्रोफेशनल असासिन को, एक किराये के कातिल को, बतरा के कत्ल के लिये तैयार किया था। इस काम के लिये मैंने उसकी मोटी फीस भरी थी और उसे समझाया था कि उसने कब यहाँ पहुँचना था और किधर से बतरा पर गोली चलानी थी। ड्राइंगरूम की खिड़की के साथ, मैं कबूल करता हूं कि, छेड़छाड़। मैंने की थी। वो खिड़की अमूमन खुली रहती थी लेकिन मुझे इस बात का अहसास था कि खास इस बार ही वो बन्द हो सकती थी। इसलिये मैंने वारदात से दो दिन पहले ही उसकी चिटकनी को यूं कमजोर बना दिया था कि बाहर से धक्का दिये जाने पर वो खिड़की खुल सकती थी।"
"आई सी। तुम बतरा का कत्ल करना या कराना चाहते क्यों थे?"
"क्योंकि वो मेरे और संचिता के बीच में दीवार बन के खड़ा था। घर का कर्ता होने की अपनी ताकत दिखाकर वो संचिता की अनड्यू एडवांटेज लेता था। मुझे उससे खुन्दक थी। वो खुन्दक निकालने के लिये ही मैंने उसकी मौत का सामान किया था।"
“सख्त बेवकूफी की थी। ये एक निष्ठाहीन परिवार है, बेवफाई जिस के हर मेम्बर के लिये एक रूटीन है। संचिता को तुम्हारे प्यार की कद्र होती तो वो ही इस मामले में अपने जीजा को दरकिनार कर सकती थी। औरत की मर्जी न हो तो मर्द कुछ नहीं कर सकता।"
"ये अक्ल मुझे वक्त रहते तो न आयी लेकिन आखिरकार आयी।"
"कब आयी?"
“पार्टी की रात को ही, जबकि अपनी यहां मौजूदगी के दौरान मुझे एकाएक लगने लगा कि मैं एक निहायत बचकाना और खतरनाक कदम उठाने जा रहा था। तब तक इतना टाइम हो चुका था कि मेरा किराये का कातिल किसी भी क्षण यहां पहुंच सकता था। मिस्टर, बतरा की कोई रिवॉल्वर मैंने नहीं चुराई थी-ऐसी किसी चोरी की जरूरत ही नहीं थी क्योंकि किराये के कातिल ने अपना खुद का हथियार इस्तेमाल करना था-अलबत्ता बाथरूम की खिड़की के रास्ते मैं यहां से बाहर जरूर निकला था ताकि किसी भी क्षण पिछवाड़े में पहुंचने वाले अपने आदमी को मैं बतरा पर गोली चलाने से रोक सकता। तब ड्राईंगरूम का माहौल जानने के लिये मैं एक बार खुली खिड़की के पास गया था तो मैंने बतरा को फर्श पर मरा पड़ा देखा था। मैं यही समझा था कि मेरा किराये का कातिल अपना काम पहले ही कर गया था। तत्काल मैं जिस रूट से वहां पहुंचा था, उसी रूट से पार्टी में वापिस लौट आया था।"
“ओह! तो कत्ल एक किराये के कातिल ने किया?"
"नहीं।"
"नहीं? क्या मतलब?”
"उसने कल नहीं किया था। वो तो वहां पहुंच ही नहीं पाया था।"
"क्यों?"
"क्योंकि यहां के रास्ते में वो गिरफ्तार हो गया था। वो आज भी गिरफ्तार है। अगले रोज मुझे इस बात की खबर लगी थी कि यहां पहंचते वक्त उसने एक रैडलाइट जम्प की थी जिसकी वजह से एक आदमी उसकी कार की चपेट में आ गया था। नतीजतन वो मौके पर ही गिरफ्तार हो गया था इसलिये कत्ल करने यहां , पहुंचा हो ही नहीं सकता था।"
"वो तुम्हारी बाबत मुंह नहीं फाड़ेगा?"
"नहीं फाड़ेगा। जिस बिचौलिये ने मुझे उससे मिलवाया था, उसकी गारन्टी है कि नहीं फाड़ेगा।"
"यानी कि कत्ल से तुम्हारा कोई लेना देना नहीं?"
“कतई नहीं। तकदीर से न बन सका। मेरा ठीक किया हुआ कातिल यहां पहुंच ही न सका।” ।
“वीर बालक, कहीं ये कहानी तुमने हाथ के हाथ ही तो नहीं गढ़ ली?"
"नहीं। मेरा ईश्वर गवाह है कि मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है। तसदीक के लिये मैं तुम्हें बिचौलिये के पास ले जा सकता हूं, बल्कि उस किराये के कातिल के पास भी ले जा सकता हूं।"
“आई सी। बहरहाल कत्ल तो हुआ। वो तुमने नहीं किया-या नहीं करवाया तो किसी ने तो किया।"
"जैसे तुम मेरे तक पहुंचे, वैसे अभी भी तो तुम कातिल तक पहुंच सकते हो?"

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