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रहस्य-रोमांच >> घर का भेदी घर का भेदीसुरेन्द्र मोहन पाठक
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अखबार वाला या ब्लैकमेलर?
उपसंहार
सागर संतोषी ने गलत नहीं कहा था कि उसके खिलाफै कोई पुख्ता सबूत उपलब्ध नहीं
था। किसी खास,अन्दाजेबयां को सबूत नहीं माना जा सकता था क्योंकि किसी खास
अन्दाजेबयां की कोई भी नकल कर सकता था। वारदात के वक्त मौकायवारदात पर उसकी
मौजूदगी महज इत्तफाक हो सकती थी। पिछले दरवाजे की चाबी उसके पास होना कोई
बड़ी बात थी ही नहीं क्योंकि ये बात जगविदित थी कि वो चाबी खुद बतरा ने उसे
दी थी। मर्डर वैपन चुराने की या खिड़की की चिटकनी कमज़ोर करने की सहूलियत उसे
थी लेकिन उस सहूलियत को उसने कोई अमली जामा भी पहनाया था, इसे साबित करना
मुहाल था। जूतों की बावत उसने फिर वही बात दोहराई कि किसी ने उसे फंसाने के
लिये उन्हें उसके बंगले में प्लांट किया था। ऐसा कोई वाकया संजीव सूरी के साथ
रिवॉल्वर के मामले में हो सकता था तो जूतों के मामले में उसके साथ भी हो सकता
था।
जिसने ऐसा किया-पुलिस का एतराज था-उसने रिवॉल्वर भी जूतों के साथ क्यों न
प्लांट की?
उसी से पूछो।-लेखक का जबाब था।
बहरहाल जिन दो बातों ने लेखक को फंसाया और उसके कसबल निकाले, वो ये थीं :
पहली बात थी कि पुलिस ने उस छोकरे को खोज निकाला जो कि दस हजार रुपये के
नोटों वाला मोटा लिफाफा मजूमदार को पहुंचा कर आया था।
वो छोकरा एक नजदीकी रेस्टारेंट का वेटर था जहां कि लेखक गाहे बगाहे चाय-वाय
पीता था। उसने दो टूक कहा कि वो लिफाफा और उसके गन्तव्य स्थान तक पहुंचाने की
फीस के तौर पर सौ रुपये उसे सागर संतोषी साहब से हासिल हुए थे। उस छोकरे की
गवाही इतनी मजबूत थी कि लेखक उससे मुकर न सका। न ही वो उसके लिये एक नितान्त
अजनबी को दस हजार रुपये भेजने की कोई वजह पेश कर सका । फिर इस बात का तो उसके
पास कतई कोई जवाब नहीं था कि उसने अपने हरकारे की मार्फत मजूमदार को ये क्यों
कहलवाया था कि वो लिफाफा संजीव सूरी ने भेजा था?
दूसरी बात ये थी कि पुलिस के अनथक प्रयत्नों से गोपाल बतरा की स्टडी के
कागजात में से वो कागज बरामद हो गया था जिसकी कि कत्ल के बाद से लेखक को भी
तलाश थी। उससे साफ सिद्ध हुआ कि लेखक के तमाम उपन्यास उसके लिये किये गये भूत
लेखन का नतीजा थे और उसमें भूत लेखक का नाम पता भी दर्ज था। पुलिस ने उस भूत
लेखक को खोज निकाला और कत्ल का एक उद्देश्य स्थापित हो गया। दूसरा उद्देश्य
सुनील और भावना की गवाहियों से पूर्वस्थापित था।
लेखक को ये कैसे मालूम था कि संजीव सूरी का रेडियो प्रोग्राम कभी-कभी उसका
छोटा भाई भी ब्राडकास्ट करता था?
इस सवाल का जवाब पुलिस को खुद छोटे भाई से हासिल हुआ।
वो सागर संतोषी का फैन था और इसी नाते कई बार उसके बंगले पर जाकर उससे मिल
चुका था। तब एक बार उसी ने नादानी में शेखी बघारते हुए ये बात लेखक को बतायी
थी।
वैसे ये राज लेखक को खुद 'घोड़े के मुंह से' मालूम होना भी कोई बड़ी बात नहीं
थी क्योंकि वो संजीव सूरी का दोस्त था और खुद अपनी जुबानी कुबूल कर चुका था
कि उसने कई मर्तबा उसके प्रोग्राम की स्क्रिप्ट लिखी थी। ,
उसने सूरी के फ्लैट का ताला कैसे खोला? वो मैजेस्टिक सर्कल पर पटड़ी पर बैठकर
तालों की चाबियां लगाने वाले एक कारीगर को ये कह कर लिंक रोड साथ लाया था कि
वो फ्लैट उसका था जिसके प्रवेशद्वार की इकलौती चाबी उसकी बेध्यानी में भीतर
बन्द हो गयी थी। कारीगर ने सौ रुपये की फीस में वो ताला कथित
फ्लैट मालिक के लिये चुटकियों में खोल दिया था।
लेखक पर लम्बा मुकद्दमा चला जिसके दौरान उसके फाजिल वकील ने उसे इमोशनली
डिस्टर्ब्ड व्यक्ति स्थापित कर दिखाया और इसी वजह से लेखक फांसी की सजा पाने
से बच गया।
उसे उम्रकैद की सजा हुई।
रिहाई के बाद संजीव सूरी भावना के पास भी न फटका। गिरफ्तारी ने उसे ऐसा सबक
सिखाया कि उसने अपना मुकम्मल लाइफ स्टाइल तब्दील कर लिया और वो अपनी विधिवत्
ब्याहता बीवी के साथ एक अच्छा पति' बन कर रहने लगा।
तानिया चटवाल दो महीने डिएडिक्शन सेंटर में रही और नशे से पूरी तरह से मुक्त
और स्वस्थ होकर वहां से बाहर निकली। फिर दोबारा कभी वो ड्रग्स के करीब भी न
फटकी।
पंकज सक्सेना ने संचिता से शादी कर ली।
लेखक की गिरफ्तारी के तुरन्त बाद जगतसिंह और नीना मैनझुल बतरा के घर की नौकरी
छोड़ गये-जगतसिंह के भाई की मौत का बदला चुक गया था और नीना को दिवंगत बतरा
से भी ज्यादा बड़ा कद्रदान मेहरबान मिल गया था।
सारे केस में फायदे में रहा तो मजूमदार जिस को हासिल हुए दस हजार रुपये उससे
वापिस क्लेम करने कोई न आया।
और घाटे में रही मिसेज भावना बतरा जो तकदीर के एक ही वार से चार मेहरबान
मर्दों से महरूम हो गयी-एक का कत्ल हो गया, दूसरा उस कत्ल के इलजाम में सजा
पा गया, तीसरा विरक्त हो गया और चौथे को अक्ल आ गयी।
और कहना न होगा कि इतने बड़े केस का प्रामाणिक विवरण सुनील की बाईलाइन के साथ
केवल 'ब्लास्ट' में छपा।
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