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रहस्य-रोमांच >> घर का भेदी

घर का भेदी

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : ठाकुर प्रसाद एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :280
मुखपृष्ठ : पेपर बैक
पुस्तक क्रमांक : 12544
आईएसबीएन :1234567890123

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अखबार वाला या ब्लैकमेलर?


"इसलिये कांच का वो टुकड़ा आज भी आपके स्पोर्ट्स शूज़ में पैवस्त है।"
“और बियर की बोतल तो”-लेखक व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला “सारे शहर में एक ही थी जो कि एक ही जगह टूटी थी।"
“आप उन जूतों में पिछवाड़े के जंगल के रास्ते से यहां तक आये थे। और यहां से बंगले तक गये थे। बकौल खुद आपके, ये वो रास्ता है जो सिर्फ आपकी उधर से आवाजाही की वजह से वजूद में आया है, जो कि आपके अलावा और कोई इस्तेमाल नहीं करता। इस रास्ते में अगर कोई वियर की टूटी बोतल होगी। तो वो अभी भी वहीं होगी। आइए, चल के देख लेते हैं।"
"स्पोर्टस शज पर ऐसी कोई पाबन्दी नहीं होती कि वो खेलकूद के लिये या कसरत के लिए ही पहने जाते हों।"
“आप नाम लीजिये उस जगह का जहां कि आप वो जूते पहन कर गये थे और पैदल चले थे।"
"उन जूतों पर क्या मेरा नाम लिखा है? मैं इसी बात से  इनकार कर सकता हूं कि वो जूते मेरे हैं।"
“आप कर सकते हैं। लेकिन इस वात से इनकार नहीं कर सकते कि आपके पास स्पोर्ट्स शुज का एक जोड़ा उपलब्ध है जो कि आप एक्सरसाइज के वक्त पहनते हैं। उन जूतों की मिल्कियत से इनकार करने के बाद क्या आप अपने जूते पेश कर सकेंगे?"
"इस आदमी को कैसे मालूम है कि मेरे बंगले में ऐसे कोई स्पोर्ट्स शूज़ मौजूद हैं?" ... "बता भई, कैसे मालूम है?" .
"क्योंकि"-अर्जुन बोला-"अभी थोड़ी देर पहले मैंने अपनी आंखों से उन्हें वहां इनके पलंग के नीचे पड़े देखा था।"
"लिहाजा"-लेखक बोला-"तुमने जबरन वहां का ताला खोला और बिना इजाजत मेरे बंगले में घुसे?". ...
“दरवाजा खुला था।"-अर्जुन बोला--"इसलिये मैंने समझा था आप भीतर थे। इसलिये मैं भीतर घुसा था।"
"क्यों? तुम्हारा मेरे से क्या लेना देना था? क्यों ढूंढ रहे थे तुम मुझे?"
“क्योंकि मैं आपका फैन हूं और आपके आटोग्राफ हासिल करना चाहता था।"
“तुम एक चोर हो जिसने मेरे स्पोर्ट्स शूज़ मेरे बंगले से चोरी कर लिये और उनकी जगह पता नहीं कौन से स्पोर्ट्स शूज़ रख दिये।"
“काफी ढीठ हैं आप।" --सुनील बोला--"और जुबानदराज भी लेकिन ये पुड़िया चलने वाली नहीं है क्योंकि आपके स्पोर्ट्स शूज़ की शिनाख्त करने वाले यहां बहत लोग निकल आयेंगे।"
लेखक उपेक्षा पूर्ण भाव से मुंह बिचकाते हुए हंसा।
“अपनी बात भुकम्मल करो।"-चानना गम्भीरता से बोला। ...
सुनील ने सहमति से सिर हिलाया और फिर लेखक से सम्बोधित हुआ- “आपकी ट्रेजेडी ये भी है, लेखक साहब, कि आप तो भावना पर दिल रखते थे लेकिन जानते थे कि भावना की पहली पसन्द संजीव सूरी बना हुआ था। यानी कि बतरा के रास्ते से हट जाने से ही वो आपके काबू में नहीं आ जाने वाली थी। लेकिन अगर सूरी का भी पुलन्दा बंध जाता तो आपके चान्सिज़ ब्राइट हो जाते। आखिर आप रुतबे, रसूख और पैसे वाले आदमी थे जबकि संजीव सूरी के पास खूबसूरत थोबड़े के अलावा कुछ भी नहीं था। ये आपकी बदकिस्मती थी कि भावना खूबसूरत थोबड़े पर ज्यादा लट्टू थी।"
"गोया मैं सूरी के कत्ल का भी इरादा रखता था।" ..
"कोई बड़ी बात नहीं कि आपका ऐसा इरादा रहा हो लेकिन उस रात एक ऐसा इत्तफाक हुआ कि उसके तहत आपको बिना कल के ही सूरी को रास्ते से हटाने की तरकीब सूझ गयो। कत्ल के बाद किसी वक्त सूरी पिछवाड़े के रास्ते यहां से खिसक रहा था जब कि जगतसिंह ने बतरा की कार में से उसकी हैडलाइट्स . . . की रोशनी में उसे देखा था, तानिया चटवाल ने ड्राईंगरूम की खुली खिड़की में से उसे देखा था और आपने ज़रूर कत्ल करके लौटते वक्त उसे देखा था। तब ये शैतानी खयाल आपके जेहन में आया कि अपनी करतूत को आप सूरी के मत्थे मंढ़ सकते थे। आपने ऐन ऐसा ही किया। मैं नहीं जानता आप कैसे वाकिफ थे लेकिन आप इस हकीकत से वाकिफ थे कि कभी-कभी सूरी का फेमस प्रोग्राम 'ए डेट विद यू' उसका छोटा भाई भी उसकी जगह ब्राडकास्ट करता था। और ऐसा साउन्ड इंजीनियर मजूमदार की सूरी के साथ मिलीभगत से होता था। लिहाजा उस रात आपने सूरी बन कर मिस्टर मजूमदार को फोन किया और ये गैरजरूरी हिदायत इन्हें दी कि पूछताछ होने पर मिस्टर मजूमदार इस बात से हरगिज न हिलें कि वो पिछली रात नौ से दस बजे तक साउन्ड स्टूडियो नम्बर पांच में था। अगले रोज किसी हरकारे के जरिये आपने मिस्टर मजूमदार को दस हजार रुपये भिजवा दिये ताकि सूरी की बदनसीवी के खाते में ये एक और डैमिजिंग वात दर्ज हो जाती कि उसने अपने लिये रिश्वत से एलीबाई खरीदी। फिर पिछले रोज ही आधी रात के बाद किसी वक्त-जबकि सूरी और उसका भाई दोनों ही वक्ती तौर पर गायब हो जाने की नीयत से अपनी राह लग चुके थे-या अगले रोज किसी वक्त आपने सूरी के फ्लैट में मर्डर वैपन प्लांट कर दिया। यूं आप ने पूरी तरह से एक हरामी लेकिन बेगुनाह शख्स का पुलन्दा बांध दिया। जनाब, ' लानत है आप पर।"
तब तक भावना समेत, उठाले के लिये वहां पहुंचे तमाम लोग उनके इर्द गिर्द इकट्ठे हो चुके थे और भौचक्के-से कभी सुनील का तो कभी लेखक का मुंह देख रहे थे।
"मैं कुछ और कहना चाहता हूं।"-एकाएक मजूमदार फिर बोला।
"वो भी कहिये।"
"मैंने तुम्हें बताया था कि वो अनपेक्षित रकम मिलते ही मैंने उस बाबत सूरी से बात करने की कोशिश की थी लेकिन टेलीफोन से सम्पर्क नहीं हो सका था इसलिये शाम को मैं लिंक रोड उसके घर गया था।"
"हां।"
"तब मुझे सूरी के फ्लैट का दरवाजा खुला मिला था।"
"खुला मिला था?"
"दरवाजा चौखट के साथ लगा नहीं मिला था जिसकी वजह से बिल्ट-इन लॉक काम नहीं कर सका था। घंटी का कोई जवाब न मिलने पर मैंने दरवाजे को जरा-सा धक्का दिया था तो वो खुल गया था। तब मैंने उसे सूरी की लापरवाही माना था और दरवाजा मैं मजबूती से बंद करता आया था।"
"लेकिन दरवाजा आप को खुला मिला था?"
"हां।"
“जो कि अपने आप में सबूत है कि किसी ने सूरी की गैरहाजिरी में मर्डर वैपन-वो बत्तीस कैलीवर की रिवॉल्वर-उसके फ्लैट में प्लांट की थी। उसका काम दरवाजा खोल लेने भर में ही हो गया था इसलिये उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उसके पीछे दरवाजा बदस्तूर बन्द हुआ था या नहीं।"
“दरवाजा सूरी से ही खुला छूट गया हो सकता है।"-लेखक के मुंह से बरबस निकला।
“घर के मालिक ऐसी लापरवाहियां नहीं करते-खासतौर से तब जबकि वो एक लम्बे अरसे के लिये पीछे घर खाली छोड़ कर जा रहे हों-यूं घर छोड़ के जाने वाला शख्स मुख्यद्वार तो क्या, बाकी खिड़की दरवाजे भी दस-दस बार चैक करके जाता है कि वो सब मजबूती से बन्द हैं लेकिन किसी चोर-उचक्के पर ऐसी कोई जिम्मेदारी आयद नहीं होती।"
लेखक खामोश हो गया। “अब क्या कहते हैं आप?"
“सब गैसवर्क है।" -लेखक बोला--"तुम्हारी कल्पना की उड़ान है। मैं भी अपने जासूसी उपन्यास की कहानी ऐसे ही बनाता हूं लेकिन मेरा हीरो जो कहता है, उसे साबित करके दिखाता है। तुम कुछ साबित नहीं कर पाओगे।"
"सब कुछ करने का ठेका मैंने ही नहीं लिया हुआ। संजीव सूरी की बेगुनाही की बाबत मुझे इन्स्पेक्टर साहब आश्वस्त दिखाई दे रहे हैं। लिहाजा अब वो आजाद हो जायेगा। वो आजाद हो जायेगा तो पुलिस को नये सिर से बतरा के कातिल की तलाश होगी। इंस्पेक्टर साहब को जब वो तलाश यहीं पूरी होती दिखाई देगी तो फिर उन्हें उसके लिये दर-दर भटकना भला क्योंकर मंजूर होगा?"
चानना ने सहमति में सिर हिलाया। "मिस्टर सागर संतोषी" फिर वो सख्ती से बोला-“मैं आपको गोपाल बतरा के कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार करता हूँ।
“आप इस शख्स की बेहूदा बातों में आ रहे हैं।"-लेखक शान्ति से बोला-“आप सात जन्म मुझे कातिल साबित नहीं कर पायेंगे। जो कुछ इसने कहा, वो सब लफ्फाजी है। मेरे खिलाफ कोई पुख्ता सबूत आपके पास नहीं है। कत्ल के केस में अहम बात ये नहीं होती कि किसी को क्या करने की सुविधा उपलब्ध थी, अहम बात ये होती है कि किसी ने क्या किया था? और 'क्या नहीं किया था'। सिद्ध करने के लिये गवाह जरूरी होते हैं, सबूत जरूरी होते हैं, जो कि आप के पास नहीं है। है कोई चश्मदीद गवाह आपके पास जो...."
सुनील को एक क्षण के लिये चानना विचलित होता दिखाई दिया लेकिन फिर वो तत्काल संभला और फिर लेखक की बात काटकर बोला-“वो हम देखेंगे। फिलहाल आप अपने आप को" गिरफ्तार समझिये।”
लेखक फिर न बोला।

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