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विविध उपन्यास >> शिकस्त की आवाज

शिकस्त की आवाज

कृष्ण बलदेव वैद

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :231
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1515
आईएसबीएन :81-7028-647-6

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प्रस्तुत है शिकस्त की आवाज....

Shikast ki Aavaj

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह पुस्तक एक तरह से लेखक का आत्म-साक्षात्कार है। इस पुस्तक में लेखक ने अपनी पहचान की है, साथ ही अपने समकालीन साहित्यकारों, चित्रकारों, अलोचकों की भी-अपनी विशिष्ट शैली में, अपने ही अंदाज़ में।
लेखक अपनी रचनाओं में जीता है, उन्हीं से पहचाना जाता है। इस पुस्तक में वैद जी ने अपनी विशिष्ट कृतियों के बारे में लिखा हैं। पुस्तक कब लिखी, क्यों लिखी, कहां लिखी, किसकी प्रेरणा से-ये सब दिलचस्प पहलू हैं जिन्हें पाठक जानना चाहेंगे। पढ़िए और सराहिए।

प्रसिद्ध उपन्यासकार कृष्ण बलदेव वैद की गणना आज के सबसे महत्त्वपूर्ण लेखकों में की जाती है। उपन्यास तथा कहानियों के अतिरिक्त नाट्य लेखन और अनुवाद के क्षेत्र में भी उन्होंने अपना अप्रितम स्थान बना लिया है। अपनी कृतियों में उन्होंने सदा नवीन प्रयोग किए हैं जो चमत्कृत करने के साथ विशिष्ट अर्थपूर्ण भी सिद्ध हुए हैं।
‘शिकस्त की आवाज़’  वैद जी की नवीनतम कृति है।

 तस्वीरों का स्वामी/ स्वामी की तस्वीरें


बरसों पुरानी एक तरोताजा प्यारी तस्वीर से शुरू करता हूँ।
एक दोपहर की चिलचिलाहट और अपनी बेचैनी से बेहाल मैं उस ज़माने के एक अज़ीज़ दोस्त के साथ स्वामी के उस करोलबागी कमरे में जा खड़ा होता हूँ  जहाँ कुछ अफवाहों के अनुसार स्वामी कभी-कभी कुछ काम किया करता है। शायद हम उन अफ़वाहों को झुठलाने वहाँ पहुँच गए हैं। कमरा नंगा है, स्वामी आधा नंगा-जैसे कई दिनों तक भूखा कोई नौजवान भिखारी हो, उसकी सोई-खोई आँखों से धुँधला आलोक फूट रहा है। कुछ वैसा ही जैसा उसके आखिरी दौरे की पागल पहुँची हुई तस्वीरों से फूटता है। नंगे फर्श पर एक कुँवारी कैनवस करवटें बदल रही है। स्वामी उसे घूर रहा है और उसी चिथड़े से चाकू साफ कर रहा है जिन्हें बाद में आक्तावियो पाज़ ने अपनी एक आबदार कविता में कायम और दायम कर दिया था।

With a rag and a knife
like a toreador
Against the idee-fixe
The bull of terror
Against the canvas and the void
The uprushing spring
 
The canvas a body
Dressed in its own naked enigma

स्वामी के संगीन चेहरे को देख मुझे दहशत होती है। महसूस होता है सामने एक ऐसा क़ातिल खड़ा हो जो कोई ख़ून करने से फ़ौरन पहले या बाद अपना ख़ंज़र साफ़ कर रहा है। कुछ क्षण बाद स्वामी के होठों पर जो मुस्कराहट उतर आती है उसमें भी ख़ून की खूबसूसत ख़ौफनाक ख़ामोश सुर्ख़ी है।
उन दिनों स्वामी के चेहरे पर दाढ़ी की झाड़ी नहीं थी, साल्वाडोर जैसी ढीली-सी मूँछ थी। जिसमें बाद की दाढ़ी-झाड़ी की सम्भावना मचलती रहती थी।
उन दिनों भी वह थोड़ा झुककर चलता था, मानो ज़मीन से पूछ रहा हो आसमान कहाँ है, या कोई गिरी पड़ी चीज़ उठाकर अपनी किसी ज़ेब की तस्वीर में गुम कर देने की सोच रहा हो, या यूँ ही किसी सोच में डूबा हुआ शायद किसी सोच के लिए कोई कबर खोज रहा हो।
उन दिनों भी वह काम कम किया करता था, काम की तैयारी ज़्यादा। उन दिनों भी उसकी आवाज़ में गर्म कँकरीली खरज सुनाई दिया करती थी।
मुझे इस कल्पना में अजीब सा आनन्द मिलता है वह आवाज़ स्वामी को गंगूबाई हंगल से मिली थी या शायद गंगूबाई हंगल को स्वामी से।

उन दिनों स्वामी ने कम्युनिस्ट पार्टी की ‘होलटाइमरी’ तो शायद छोड़ दी थी लेकिन कला की अभी शुरू नहीं की थी।
उन दिनों वह कुर्ता-लुंगी नहीं, क़मीज़, कोट, पतलून पहना करता था।
उस दोपहर अपना ख़ंज़र साफ़ कर लेने के बाद स्वामी अपनी उस मौसी के बारे में रुक-रुक कर काफ़ी देर तक जाने क्या-क्या बोलता बताता रहा था जिसे बरसों बाद मैंने भोपाल में स्वामी की प्यार भरी देख रेख में अपने आख़िरी दिनों में एक अनवरत आलाप प्रलाप में मग्न देखा था।
मुझे यह कल्पना करते हुए कुछ संकोच होता है कि स्वामी के आख़िरी दौर की पागल पहुँची हुई तस्वीरों के गम्भीर मौन में उस मौसी का अनवरत आलाप प्रलाप भी रचा बसा हुआ है।
उन दिनों स्वामी बीड़ी यूँ पिया करता था जैसे बेचारी का खून पी रहा हो।
स्वामी एक सोचता हुआ कलाकार नहीं। एक ऐसा कलाकार जिसकी तस्वीरें सोचती हुई दिखाई देती हैं। नहीं। एक ऐसा कलाकार जो बहुत कुछ सोच विचार चुका हो। नहीं। एक ऐसा कलाकार जिसने अपनी सोच को अपनी तस्वीरों में घोल मोल दिया हो।

स्वामी चिन्तनग्रस्त कलाकार नहीं। स्वामी सीधे सरल तरीक़े से सोचने वाला चित्रकार नहीं। स्वामी की सोच छालाँगें मारती हैं, कभी इधर, कभी उधर, किसी चीते या हिरन की तरह या अँधेरे में किसी जुगनू की तरह। स्वामी की सोच बीच-बीच में काफ़ी काफ़ी देर के लिए सो जाती है, शायद हमें लगता है कि वह सो गई है। लेकिन वह आँखें मूँदे चुप मार कर पड़ी हुई होती है।
स्वामी गम्भीर तो है, गाम्भीर्यग्रस्त नहीं। उसकी कई तस्वीरें कई तरह की शरारतों और शैतानियों से खेलती हुई महसूस होती है स्वामी रंगों और रेखाओं से उसी तरह खेलता है, जिस तरह कुछ लेखक अपने शब्दों और प्रतीकों से कुछ गायक अपने स्वर ताल से, कुछ अभिनेता अपनी मुद्राओं से।

मुझे उसके पहले दौर की एक तस्वीर याद आती है जिसमें पीपल का एक पेड़ है और नीचे लिखा हुआ हैः We the Pepul  या शायद ऐसा ही कुछ। मेरी याद निर्दोश नहीं। स्वामी की तस्वीरें निर्दोंष नहीं। स्वामी की तस्वीरों के सामने खड़े-खड़े मैं अक्सर कुमार गन्धर्व और मल्लिकार्जुन मन्सूर का गायन सुनने लगता हूँ। इन तीनों असाधारण कलाकारों का साम्य असाधारण है। ये तीनों कलाकार निर्दोंष नहीं। निर्दोषता का आभाव इन तीनों का एक असाधारण गुण है।
स्वामी एक डूबा हुआ कलाकार है। नहीं डूबता हुआ। ऐसा जिसे किसी तिनके का सहारा न हो, जो खुद किसी तिनके सा हो, जो इसलिए डूबता हुआ भी तैरता दिखाई देता है। अपने उन बाल-पर-हीन परिन्दों की तरह जो खुद कभी-कभी तिनकों से नज़र आते हैं। हवा में तैरते हुए तिनके। पहाड़ों को उड़ा ले जाते हुए तिनके, डूबते हुओं के सहारे तिनके।
स्वामी निर्दोष नहीं। खतरे मोल लेनेवाला कोई कलाकार निर्दोष नहीं होता। अपने माध्यम से खेलनेवाला कोई कलाकार निर्दोष नहीं होता। अपने माध्यम की सम्भावनाओं का विस्तार करनेवाला, उन्हें उनके अन्तिम छोर से भी आगे ले जाने की कोशिश करने वाला कोई कलाकार निर्दोष नहीं होता। उसके दोष भी देखनेवालों को उसके गुण दिखाई देते हैं।
 
स्वामी की कई तस्वीरों को देख मुझे लगता है जैसे वे अपूर्ण हों, जैसे स्वामी उन्हें बीच में ही छोड़कर ख़ुद कहीं और जा बैठा हो, अपने किसी अड्डे पर, अपने किसी यार दोस्त के पास, या कोई जासूसी नावल पढ़ने लेट गया हो, या अपना कोई क़िस्सा सुनाने कहीं निकल गया हो। अपूर्णता का यह आभास अद्भुत है। दीदा दानिस्ता अपर्णाता का भी और दूसरी निरीह अपूर्णता का भी।

वैसे स्वामी मासूम और निरीह कम ही होता है, कभी ऐसा होने का भ्रम भले ही पाले या पैदा करे। स्वामी जैसा दिमागी कलाकार मासूम और निरीह नहीं हो सकता। यह अलग कमाल है कि उनके दिमाग़ में दिल मौजूद रहता है, और दिल में दिमाग़। कभी-कभी कहीं दिल और दिमाग की पारस्परिकता दख़लअन्दाज़ी स्वामी की तस्वीरों को दो परस्पर विरोधी दिशाओं में धकेलती हुई नज़र आती है। वे तस्वीरें निर्दोष नहीं, अति महत्त्वपूर्ण हैं। कई बार निर्दोष तस्वीरें महत्त्वपूर्ण नहीं होतीं।

स्वामी को रूपानियत से मोह था। उसे जिगर बहुत प्रिय था। कभी-कभी वह अपने कुछ दोस्तों को चिढ़ाने के लिए भी अपने आपको एक रूमानी कलाकार घोषित किया करता था। लेकिन वह रूमानी कलाकार नहीं। उसमें कला का संयम हैं, इन्तहाई austerity है। अपनी तस्वीरों का स्वामी है। ऐसा नहीं कि उसमें उबाल नहीं ख़तरे मोल लेने वाले कलाकार का संयम खतरों से कतराने वाले कलाकार के संयम से भिन्न तो होगा ही।
नहीं, स्वामी रूमानी कलाकार नहीं। उसकी तस्वीरों में सौन्दर्य तो है, सुन्दरता नहीं, सुन्दरता से परहेज है। स्वामी कहा करता था, कला को सुन्दरता से कोई वास्ता नहीं। या ऐसा ही कुछ। मेरी याद निर्दोष नहीं।
स्वामी की तस्वीरों का सौंन्दर्य सुन्दरता का मोहताज नहीं। स्वामी की तस्वीरों की कोमलता भी कठोर है, खुरदरी है, कँकरीली है, उसकी आवाज़ की ही तरह। स्वामी के रंगों में रेत मिली महसूस होती है। रेत ही क्यों, गोबर और मल भी, मिट्टी और मूत भी। उसकी कैनवस दानेदार होती है।
थोड़ी देर के लिए मैं उसके दूसरे दौरे की-पहाड़, परिन्दा, पेड़-तस्वीरों को ताक पर रख रहा हूँ, उन्हें कुछ देर के बाद उठाऊँगा।

स्वामी के रंगों में बहुत कुछ ऐसा होता है जो दूसरों के रंगों से ग़ायब रहता है, जो बाज़ार में नहीं, मिलता, जो स्वामी ने अपनी प्रयोगशाला में खुद तैयार किए हैं, जो ‘सुन्दर’ नहीं, जिनमें खुरदुरापन है, वैसा ही जैसा स्वामी के कुरतों में होता था। स्वामी के रंगों में आलोक तो है, बहुत है, चमक-दमक नहीं। उनके पीले को उसका काला आलोकित करता है काले को पीला, दोनों को उसका लाल, तीनों को उसका भगवा, चारों को उसका भूरा जो दरअसल भूरा नहीं पाँचों को उसका नीला जो दरअसल नीला नहीं और छहों को उसका सफ़ेद जो दरअसल सफ़ेद नहीं।

नहीं, स्वामी रूमानी कलाकार नहीं। उसकी रेखाएँ जानबूझ कर लड़खड़ाती हैं। उसके त्रिकोंण जानबूझकर टेढ़े हैं; फ्रेम जानबूझकर तिरछे हैं, उसकी बिन्दियाँ जान-बूझकर ख़ूनी धब्बे, उसके अक्षर, पाज़ के शब्दों में, नाराज़।
स्वामी का काम तीनो दौरों से गुज़रा, या कहूँ कि उस पर तीन दौरे पड़े।
उसके पहले दौरे का काम मैंने कम देखा है। जितना देखा है वह मुझे कुछ ज़्यादा कहने का आधार अधिकार नहीं देता। इतना आसान से कह सकता हूँ कि उसमें स्वामी अपने पर तोलता हुआ दिखाई देता है। यह बात शायद बहुत से कलाकारों के शुरू के काम के बारे में कही जा सकती है, इसलिए इसे भूल जाइए,
अनकही समझ लीजिए।

दूसरे दौरे में स्वामी उड़ना शुरू कर देता है।
परिन्दा। पहाड़। पेड़
परिन्दे और पहाड़ की युगलबन्दी के कमाल अजीबोग़रीब हैं।
इस युगलबन्दी को सुनता हुआ पेड़। और तुलसी का पौधा। और अथाह आकाश।
पहाड़ की पीड़ा में से फूटता हुआ पेड़।
पहाड़ को प्रतिबिम्बित करता हुआ पहाड़। परिन्दे से बरसता हुआ परिन्दा।
परिन्दे के पैरों को चूमता हुआ पहाड़। परिन्दे के पैरों को चूमने के लिए हुमकता हुआ पहाड़।
पहाड़ से पीछा छुड़ाता हुआ परिन्दा। परिन्दे का पीछा करता हुआ पहाड़।
पहाड़ को दुत्कारता हुआ परिन्दा, परिन्दे को पुचकारता हुआ पहाड़।
पहाड़ पर टूटता हुआ परिन्दा,
पहाड़ को ले उड़ता हुआ परिन्दा।
उड़ने से इनकार करता हुआ पेड़।

यह परिन्दा असल में पेड़ है। यह पेड़ असल में कुछ भी नहीं। ये दोनों असल में सब कुछ हैं। जड़ और चेतन। आत्मा और परमात्मा। धरती और आकाश। नर और नारी। तीसरे का क्या किया जाए ?
स्वामी के इस दौर के काम की कोमलता में भी कठोरता है, मुझे दिखाई देती है। हो सकता है यह मेरा ही दृष्टिकोण हो। मेरी दृष्टि निर्दोष नहीं। लेकिन मैं दुहराना चाहता हूँ कि इन तस्वीरों में भी स्वामी रूमानी नहीं पूरी तरह रूमानी नहीं।
इन तस्वीरों का कमाल यह है कि ये नंगी हैं, इनकी कमी यह है कि इन्हें देखकर महसूस होता है मानो स्वामी कोई या कई उपदेश दे रहा-वैराग्य का, उड़ने का, मोक्ष का, अद्वैत का। इनमें भी यह खूबी तो है कि ये हमारी आँखों में यह शक पैदा कर देती हैं कि उपदेश स्वामी नहीं दे रहा, हम ले रहे हैं।

इन तस्वीरों में स्वामी की ज़िद्द साफ़ दिखाई देती है, तुम इन्हें allegorical मानते हो तो मानों, मैं तो एक मथ रहा हूँ तुम इनसे ऊब गए हो तो तुम्हारी समस्या है, मैं जो करना चाहता हूँ तब तक करता रहूँगा जब तक मुझे खुद महसूस नहीं होता, अब और नहीं।
ये तस्वीरें तनावमुक्त भले ही नज़र आएँ हैं नहीं। इनसे हमें शान्ति भले ही मिले, ये खुद अशान्त हैं।
इनमें भी स्वामी अपनी क्षमताओं की अज़माइश कर रहा है, अपनी सीमाओं को तोड़ने की कोशिश कर रहा है।
इस दौर की सबसे कठिन और सश्कत कृति है।

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