|
जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग सत्य के प्रयोगमहात्मा गाँधी
|
160 पाठक हैं |
||||||
my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...
रौलट एक्ट और मेरा धर्म-संकट
मित्रों ने सलाह दी कि माथेरान जाने से मेरा शरीर शीध्र ही पुष्ट होगा। अतएव मैंमाथेरान गया। किन्तु वहाँ का पानी भारी था, इसलिए मेरे सरीखे रोगी के लिए वहाँ रहना कठिन हो गया। पेचिश के कारण गुदाद्वार इतना नाजुक हो गया था किसाधारण स्पर्श भी मुझ से सहा न जाता था और उसमें दरारे पड़ गयी थी, जिससे मलत्याग के समय बहुत कष्ट होता था। इससे कुछ भी खाते हुए डर लगता था। एकहफ्ते में माथेरान से वापस लौटा। मेरी तबीयत की हिफाजत का जिम्मा शंकरलाला बैंकर ने अपने हाथ में लिया था। उन्होंने डॉ. दलाल से सलाह लेने का आग्रहकिया। डॉ. दलाल आये। उनकी तत्काल निर्णय करने की शक्ति ने मुझे मुग्ध कर लिया। वे बोले, 'जब तक आप दूध न लेगें, मैं आपके शरीर को फिर सेहृष्ट-पुष्ट न बना सकूँगा। उसे पुष्ट बनाने के लिए आपको दूध लेना चाहिये और लोहे तथा आर्सेनिक की पिचकारी लेनी चाहिये। यदि आप इतना करे, तो आपकेशरीर को पुनः पुष्ट करने की गारंटी मैं देता हूँ।'
मैंने जवाब दिया, 'पिचकारी लगाइये, लेकिन दूध मैं न लूँगा।'
डॉक्टर ने पूछा, 'दूध के सम्बन्ध में आपकी प्रतिक्षा क्या है ?'
'यह जानकर कि गाय-भैस पर फूंके की क्रिया की जाती है, मुझे दूध से नफरत हो गयीहै। और, यह सदा से मानता रहा हूँ कि दूध मनुष्य का आहार नहीं है। इसलिए मैंने दूध छोड़ दिया है।'
यह सुनकर कस्तूरबाई, जो खटिया के पास ही खडी थी, बोल उठी, 'तब तो आप बकरीका दूध ले सकते है।'
डॉक्टर बीच में बोले, 'आप बकरी का दूध ले, तो मेरा काम बन जाये।'
|
|||||










