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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


अब्दुर्रहमानगली में से क्रॉफर्ड मारकेट की ओर जाते हुए जुलूस को रोकने के लिए घुडसवारो की एक टुकड़ी सामने से आ पहुँची। वे जुलूस को किले की ओर जाने सेरोकने की कोशिश कर रहे थे। लोग वहाँ समा नहीं रहे थे। लोगों ने पुलिस की पांत को चीर कर आगे बढ़ने के लिए जोर लगाया। वहाँ हालत ऐसी नहीं कि मेरीआवाज सुनायी पड़ सके। यह देखकर घुडसवारो की टुकड़ी के अफसर ने भीड़ को तितर-बितर करने का हुक्म दिया और अपने भालो को घुमाते हुए इस टुकड़ी नेएकदम घोडे दौडाने शुरू कर दिये। मुझे डर लगा कि उनके भाले हमारा काम तमाम कर दे तो आश्चर्य नहीं। पर मेरा वह डर निराधार था। बगल से होकर सारे भालेरेलगाड़ी की गति से सनसनाते हुए दूर निकल जाते थे। लोगों की भीड़ में दरार पड़ी। भगदड मच गयी। कोई कुचले गये। कोई घायल हुए। घुटसवारो को निकलने केलिए कोई रास्ता नहीं था। लोगों के लिए आसपास बिखरने का रास्ता नहीं था। वे पीछे लौटे तो उधर भी हजारों लोग ठसाठस भरे हुए थे। सारा दृश्य भयंकरप्रतीत हुआ। घुड़सवार और जनता दोनों पागल जैसे मालूम हुए। घुडसवार कुछ देखते ही नहीं थे अथवा देख नहीं सकते थे। वे तो टेढे होकर घोडो को दौड़ानेमें लगे थे। मैंने देखा कि जितना समय इन हजारों के दल को चीरने में लगा, उतने समय तक वे कुछ देख ही नहीं सकते थे।

इस तरह लोगों को तितर-बितर किया गया और आगे बढ़ने से रोका गया। हमारी मोटर को आगे जाने सेरोक दिया गया। मैंने कमिश्नर के कार्यालय के सामने मोटर रुकवाई और मैं उससे पुलिस के व्यवहार की शिकायत करने के लिए उतरा।

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