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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :390
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1530
आईएसबीएन :9788128812453

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my experiment with truth का हिन्दी रूपान्तरण (अनुवादक - महाबीरप्रसाद पोद्दार)...


हममें बहस होने लगी।

आखिर साहब ने कहा, 'अच्छी बात है, यदि आपको विश्वास हो जाये कि लोग आपकीशिक्षो को समझे नहीं है, तो आप क्या करेगे?'

मैंने उत्तर दिया, 'यदि मुझे इसका विश्वास हो जाय तो मैं इस लड़ाई कोमुलतवी कर दूँगा।'

'मुलतवी करने का मतलब क्या? आपने तो मि. बोरिंग से कहा है कि मुक्त होनेपर आप तुरन्त वापस पंजाब जाना चाहते है!'

'हाँ, मेरा इरादा तो लौटती ट्रेन से ही वापस जाने का था, पर अब आज तो जानाहो ही नहीं सकता।'

'आप धैर्य से काम लेगे तो आपको और अधिक बाते मालूम होगी। आप जानते है,अहमदाबाद में क्या हो रहा है? अमृतसर में क्या हुआ है? लोग सब कहीं पागल से हो गये है। कई स्थानो में तार टूटे है। मैं तो आपसे कहता हुँ कि इससारे उपद्रव की जवाबदेही आपके सिर पर है।'

मैंने कहा, 'मुझे जहाँ अपनी जिम्मेदारी महसूस होगी, वहाँ मैं उसे अपने ऊपर लिये बिना नहींरहूँगा। अहमदाबाद में तो लोग थोडा भी उपद्रव करे तो मुझे आश्चर्य और दुःख होगा। अमृतसर के बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता हूँ कि पंजाब की सरकारमें मुझे वहाँ जाने से रोका न होता, तो मैं शान्ति रक्षा में बहुत मदद कर सकता था। मुझे रोक कर तो सरकार ने लोगों को चिढाया ही है।'

इस तरह हमारी बातचीत होती रही। हमारे मन को मेंल मिलने वाला न था। मैं यहकहकर बिदा हुआ कि चौपाटी पर सभा करने और लोगों को शान्ति रखने के लिए समझाने का मेरा इरादा है।

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