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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
११. टैवर्नियर ताजमहल परिसर में छः आँगनों का उल्लेख करता है, जहाँ बाजार लगा करता था। यह सर्वविदित है कि मन्दिर के चारों ओर बाजार और मेलों का लगना परम्परागत है जो कि हिन्दू जीवन का प्रमुख लक्षण है।
१२. ताजमहल के संगमरमर के मुख्य द्वार की मेहराबों के ऊपरी भाग पर भगवान शिव का अनन्य अस्त्र त्रिशूल अंकित है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि शैव हिन्दू अपने मस्तक पर चन्दन धारण करते हैं, यह लाल और श्वेत रेखाओं से बना है। इसका मुख्य द्वार पर गुम्बद की महराबों के ऊपरी भाग पर अंकित होना सिद्ध करता है कि यह निर्धान्त रूप में शिवमन्दिर है और, इसीलिए ताजमहल मूलतया निश्चित ही शिवमन्दिर है।
१३. संगमरमर भवन के सम्मुख खड़े होकर जब हम उसकी ओर दृष्टिपात करते हैं तो हमें दिखाई देता है कि ताजमहल के दाईं ओर जो लाल पत्थर का भवन है उसके ऊपरी गुंबद पर भी पूर्ण त्रिशूल का चिह्न अंकित है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि इसका मूल हिन्दू ही था, क्योंकि हिन्दू शिल्पकला में यह परम्परा रही है कि प्रत्येक हिन्दू भवन में कहीं-न-कहीं उपयुक्त स्थान पर त्रिशूल के अंकन की व्यवस्था अवश्य होती है। जहाँ तक ताजमहल का सम्बन्ध है उसमें उसी अनुपात और प्रमाण में त्रिशूल का अंकन हुआ है जो कि शिवमन्दिर बनाने में प्रयुक्त किया जाता है।
ऐसा कहा जाता है कि ताजमहल के गुम्बद पर जो स्वर्णिम त्रिशूल कलश है उस पर अरबी लिपि में 'अल्लाहो अकबर' अर्थात् 'ईश्वर महान् है' अंकित है। शाहजहाँ द्वारा हिन्दू मन्दिर को मुसलमानी प्रयोग के लिए हथियाये जाने के उपरान्त ही त्रिशूल पर ये शब्द अंकित कराये गए हैं। यह इस बात से सिद्ध होता है कि दाहिनी ओर लाल पत्थर के आँगन में जो त्रिशूल पर रेखाचित्र है उस पर यह अंकित नहीं है।
संगमरमर के चबूतरे के पीछे लाल पत्थर के कगार के नीचे, नदी की ओर उन्मुख विशाल एवं सज्जित कक्षों की पंक्ति है और उन कक्षों के सम्मुख एक लम्बा बरामदा है। यदि ताजमहल इस्लामी मकबरा होता तो भूगर्भीय कक्षों में स्थित कब्रों के नीचे भी इतने सुसज्जित कमरे एवं बरामदे के होने का कोई प्रयोजन नहीं था। मुमताज़ का शव, यदि वह ताजमहल में ही दफन है तो, न तो निचली मंजिल पर अष्टकोणीय कक्ष में है और न ही भूगर्भीय कक्ष में।
तथाकथित कब्र के ठीक नीचे के कक्ष जिन्हें ईंट और गारे से यों ही बेतरतीब पाट दिया गया है, सम्भवतया उनमें हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ और शिलालेख रखे हैं। और संगमरमर के चबूतरे के पूर्व और पश्चिम में लाल पत्थर के कगार के नीचे जो बरामदे हैं वे भी बन्द कर दिए गए प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार वे ऊँचे द्वार और गवाक्ष भी, जो कि उन कक्षों की पंक्ति में लाल पत्थर के कगार के नीचे नदी की ओर उन्मुख हैं, बड़ी निर्दयता से बन्द कर दिये गये हैं। यदि इन सबको बन्द करनेवाले मलबे को निकलवाकर उन सबकी सफाई की जाए तो ताजमहल के इन भूगर्भीय कक्षों का वास्तविक सौंदर्य प्रकट हो और यमुना नदी से आनेवाला शीतल वायु भी प्रवाहित होने लगे तथा सूर्य- किरणें भी उसको प्रकाशमान कर सकें। तब अनेक रंगों से सज्जित इन कक्षों की चित्रकारी एक बार दर्शकों को उसी प्रकार मोहित करने लगी जिस प्रकार शाहजहाँ द्वारा इसे विकृत किए जाने से पूर्व मोहित किया करती थी। इस प्रकार यह भी सम्भव है कि संगमरमर के चबूतरे से यमुना नदी की सतह पर नीचे की ओर चार मंजिलें और भी हों।
१४. ताजमहल शब्द का फारसी भाषा से दूर का भी नाता नहीं है। यह संस्कृत के 'तेज-महा-आलय' शब्द, जिसका अभिप्राय है 'देदीप्यमान मन्दिर', का अपभ्रंश रूप है। यह देदीप्यमान मन्दिर इसीलिए कहा जाता था, क्योंकि सूर्य एवं चन्द्र के प्रकाश में यह अद्भुत प्रभा विकीर्ण करता था। इस नाम का इससे यों भी सम्बन्ध स्थापित हो जाता है कि भगवान् शिव के तृतीय नेत्र से तेज की ज्वाला प्रभासित होती थी। गहन परीक्षण से यह प्रचलित अनुमान कि मुमताज महल के नाम पर इसका नाम ताजमहल पड़ा, निराधार सिद्ध होता है। प्रथमतः, शाहजहाँ के दरबारी इतिहास में, जो महिला यहाँ दफन की गई समझी जाती है उसका नाम मुमताजुल जमानी है न कि मुमताज़ महल। द्वितीयतः, प्रथम उपसर्ग 'मुम' को भवन के नामकरण के लिए त्याग कर मात्र निरर्थक 'ताजमहल' नहीं रखा जा सकता। तृतीयतः, यदि कोई "ताजमहल' शब्द से किसी प्रकार का अर्थ भी निकालना चाहे तो वह "राजकीय आवास' ही निकालेगा, मकबरा नहीं। चतुर्थतः, समस्त मुस्लिम कथानकों और इतिहास में कहीं भी 'ताजमहल' का पर्यायवाची शब्द उपलब्ध नहीं है। यदि 'ताजमहल' शब्द सामान्यतया प्रचलित होता तो संसार के अन्य भागों में मुसलमानी मकबरे या प्रासादों के लिए कहीं-न-कहीं इसका उल्लेख अवश्य उपलब्ध होता।
१५. बटेश्वर शिलालेख हमको कम-से-कम ८१८ वर्ष से आज तक के ताजमहल के इतिहास को खोजने में सहायता देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ताजमहल उर्फ तेज-महा-आलय ११५५ में मूलतया शिवमन्दिर था। शिव-प्रतिमा की स्थापना आश्विन शुक्ला पंचमी को रविवार के दिन उसी वर्ष की गई थी। सन् १२०६ के बाद कभी जब मूर्तिभंजक विदेशी मुसलमान शासन दिल्ली में स्थापित हुआ उस समय इस मन्दिर पर अधिकार कर लिया गया तथा उसमें स्थापित प्रतिमाओं को फेंक दिया गया और भवन का प्रासाद के रूप में दुरुपयोग किया गया। हम इस निष्कर्ष पर प्रथम मुगल बादशाह बाबर के अपने संस्मरणों में ३७१ (१५२६) वर्ष बाद यह संकेत करने, कि उसने इसे अपने पूर्ववर्ती इब्राहीम लोदी से छीना था, के आधार पर पहुंचे हैं। जब बाबर के पुत्र हुमायूँ की पराजय पर पराजय होती रही तो सन् १५३८ के आसपास ताजमहल अर्थात् तेज-महा-आलय को हिन्दुओं ने पुन: जीत लिया। हम इस निष्कर्ष पर इस आधार पर पहुंचे हैं, क्योंकि ५ नवम्बर, १५५३ को हुमायूं के पुत्र अकबर ने दिल्ली, आगरा, फतेहपुर सीकरी को पानीपत के युद्ध में हिन्दू योद्धा हेमू को पराजित कर, अपने अधिकार में कर लिया किन्तु अकबर ने ताजमहल से जयपुर के राजघराने को अपदस्थ इसलिए नहीं किया, क्योंकि उसके हिन्दू समर्थकों में जयपुर राजघराना प्रबल था और उसके वंशज भगवानदास और मानसिंह उसके अत्यन्त विश्वस्त सेनापति थे। वे मुगल शासक के नातेदार भी थे। शाहजहाँ के इतिहास से यह स्पष्ट है कि हुमायूँ की पराजय के बाद ताजमहल जयपुर राजघराने के अधिकार में था और वह स्वीकार करता है कि ताजमहल को जयपुर राजवंश के तत्कालीन उत्तराधिकारी जयसिंह से हथियाया गया। इस प्रकार हमारे पास सन् ११५५ से अब तक का क्रमिक एवं सुसंगत उल्लेख प्राप्त होता है। अपने आठ सौ अठारह वर्ष के काल में ताजमहल को मूलतया शिव मन्दिर के रूप में बनाया गया और वह सौ वर्ष तक इसी रूप में विद्यमान रहा। उसके बाद लगभग ३०० वर्ष तक इसका प्रासाद के रूप में दुरुपयोग किया गया किन्तु इसे पुनः मन्दिर के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। सन् १६३० से आगे यह देदीप्यमान भवन (तेज-महा-आलय) दफ्नगाह के परिवर्तित रूप में स्थिर है।
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