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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
१६. त्रिशूल-संयुत कलश के अतिरिक्त भी वहाँ इसके हिन्दू मूल के होने के अन्य प्रमाण–यथा स्वस्तिक, कमल और देवनागरी लिपि में अंकित पवित्र हिन्दू मन्त्र 'ॐ' भी उपलब्ध हैं।
ताजमहल के दर्शक उसकी संगमरमर की भीतरी दीवारों पर फूलों की नक्काशी में 'ॐ' अक्षर उभरा हुआ देख सकते हैं। भूगर्भ में उतरनेवाली सीढ़ियों के शिखर पर खड़े होकर (जिन्हें वास्तविक क कहते हैं) देखने से मकबरे की दीवारों पर गर्दन तक की ऊँचाई पर कोई भी उस गुप्त पवित्र हिन्दू अक्षर 'ॐ' को संगमरमर के नक्काशे हुए फूलों की प्रतिकृति में देख सकता है।
मकबरे के चारों ओर लगे जालीदार कठहरे के किनारों पर अंकित लाल कमल भी देखा जा सकता है।
'ॐ' अक्षर, त्रिशूल और संगमरमर के चबूतरे के नीचे कक्षों की पंक्तियों को देखते हुए अनुसन्धाता विचार कर सकते हैं कि मुसलमानों के अधिकार में आने से पूर्व ताजमहल कहीं किन्हीं महान् शैव हिन्दू तांत्रिक पंथ के अनुयायियों का केन्द्र तो नहीं था। जाट समुदाय जिसका आगरा क्षेत्र में बाहुल्य है, शिव के तृतीय नेत्र से विकसित होनेवाली ज्योति की आराधना के लिए परम्परागत रूप से तेज मन्दिरों की स्थापना के लिए प्रसिद्ध है।
जब कोई भूगर्भस्थ तथाकथित कब्रों को देखने के लिए उन सीढ़ियों से नीचे उतरता है तो सात सीढ़ियाँ उतरने के बाद उसे दोनों ओर दीवारों पर दो महराब दिखाई देती हैं। यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि दाई ओर की महराब को संगमरमर के विषम शिलाखण्डों से पाट दिया गया है। कहने का अभिप्राय है कि जिस आकार-प्रकार के शिलाखण्ड दाईं ओर लगे हैं बाई ओर वैसे नहीं हैं। यह इस बात का संकेत है कि संगमरमर के चबूतरे के नीचे स्थित, जिसके चारों ओर तथाकथित कनें हैं, उन कमरों की ओर जाने के लिए ये गलियारे शाहजहाँ ने उस समय बन्द करवा दिए जब उसने ताज मन्दिर को इस्लामी कब्रगाह में परिवर्तित करने के लिए उसी प्रकार जिस प्रकार कि फतेहपुर सीकरी का भवन समूह और जिन्हें आजकल भ्रमवशात् अकबर, हुमायू, सफदरजंग और अन्य अनेकों के मकबरे कहा जाता है, हथिया लिया था।
वास्तुविद्या के छात्र और विद्वान्, इसलिए तेज-महा-आलय अर्थात् ताजमहल को प्राचीन हिन्दू मन्दिर निर्माण कला के 'उत्तम पुष्प' के रूप में देखें और अध्ययन करें न कि मुस्लिम भवन-निर्माण कला के रूप में। मुस्लिम, भवन- निर्माण-कला, कम-से-कम भारत में तो कहीं भी अस्तित्व में नहीं है। सभी मध्ययुगीन तथाकथित मुस्लिम मकबरे और मस्जिद प्राचीन हिन्दू मन्दिर और प्रासाद हैं। ताजमहल इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है कि किस प्रकार सारे संसार को तीन शताब्दियों तक यह विश्वास करने के लिए भ्रम और धोखे में रखा गया कि ताजमहल का निर्माण मकबरे के रूप में किया गया था। आमेर (वर्तमान जयपुर) के किले के भीतर विद्यमान काली (भवानी) मन्दिर और आगरा के तेज महालय के संगमरमर और नक्काशी की सजावट में नितान्त सादृश्य है, जो इस बात का और भी प्रमाण है कि ताजमहल (तेज-महा-आलय) को पहले प्रासाद और फिर मकबरे में परिवर्तित करने से पूर्व वह हिन्दू मन्दिर था। विगत ३४ वर्ष से मूल ताजमहल शिव मन्दिर को मुसलमानी बेगम के स्मारक का खेल खेलना पड़ रहा । कौन जानता है ! हो सकता है कि भाग्य फिर पलटा खाए और प्रगति-उन्मुख भारत के हाथों ताजमहल पुन: अपने हिन्दू शिव मन्दिर के मूल गौरव को प्राप्त करे।
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