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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है

ताजमहल मन्दिर भवन है

पुरुषोत्तम नागेश ओक

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2022
पृष्ठ :270
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15322
आईएसबीएन :9788188388714

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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...


ऐसा प्रतीत होता है कि सुसज्जित सिंहासन के चारों ओर मूल्यवान् मोतियों की लड़ियाँ जड़ी हुई थी और इस पर मूल्यवान् छत्र था। ताजप्रासाद को इस प्रकार की असीम सम्पत्ति से नग्न करने के लिए शाहजहाँ ने अपने कोष को रत्नागार बना दिया और मात्र पत्थरों का भवन मुमताज तथा हरम की अन्य बेगमों को दफनाने के लिए छोड़ दिया।

वह मयूर-सिंहासन कालान्तर में मुस्लिम आक्रमणकर्ता नादिरशाह फारस ले गया, जो अब नष्ट हो गया है। उसको तोड़कर या तो आपस में बाँट लिया गया या लूट लिया गया, क्योंकि मूर्तिभंजक मुसलमानों की धर्मान्धता में मूर्तियुक्त अपवित्र सिंहासन की विद्यमानता उनके लिए अभिशाप-रूप थी।

मयूर-सिंहासन का उल्लेख शाहजहाँ के दरबारी इतिहासकार मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ने शाहजहाँ के शासन के आठवें वर्ष* के विवरण में जो कि १६३४ के लगभग होता है, किया है। यह ध्यान देने योग्य है कि मुमताज़ की मृत्यु लगभग १६३० में हुई और ताजमहल से सम्बन्धित कल्पित विवरण के अनुसार इस व्ययसाध्य स्वप्नलोकीय स्मारक का निर्माण उसकी मृत्यु के एक वर्ष के भीतर आरम्भ हो गया था।
* इलियट एण्ड डौसन का इतिहास, भाग ७, पृष्ठ ४५

यह भी कहा जाता है कि यह कार्य १० से २२ वर्ष तक चला। यह भी स्मरण रखना चाहिए कि* ६ फरवरी, १६२८ को सिंहासनारूढ़ होने के तुरन्त बाद आरम्भ के कुछ वर्ष शाहजहाँ ने अपने विरोधियों की हत्या करने में लगाए। जब १६३० और १६३१ के मध्य मुमताज़ मरी तो कहा जाता है कि शाहजहाँ ने फकीरों और जरूरतमंदों को बहुत सारा धन दिया जैसा कि प्रस्तुत पुस्तक में बादशाहनामे के उद्धरणों से हमें ज्ञात होता है। बाद में, जैसा कि बताया जाता है, शाहजहाँ ने ताजमहल परिसर-निर्माण आरम्भ किया।
* इलियट एण्ड डौसन का इतिहास, भाग ७, पृष्ठ ६

कार्य प्रारम्भ ही हुआ था कि तब हमें बताया जाता है कि १६३५ के लगभग शाहजहाँ के पास हीरे-मोती के इतने अम्बार लग गए, शासनारूढ़ होने के ६ वर्ष के भीतर ही कि वह सोच ही नहीं पाया कि क्या किया जाए। तब उसने भव्य मयूर-सिंहासन बनाने का आदेश दिया। मुल्ला अब्दुल* कहता है-"वर्ष बीतते बीतते राजकीय रत्लागार में मूल्यवान् रत्न आ गए।" इस प्रकार की जालसाजी में विश्वास करने के लिए साधारण सहजता की भी आवश्यकता नहीं है। इन विवरणों की तर्कसंगतता के विषय में किसी ने भी किसी प्रकार की छानबीन, तुलना और प्रामाणिकता की ओर ध्यान देने की चिन्ता नहीं की। यदि हमें इस प्रकार की असंगत बातों पर विश्वास करना है तो कहना होगा कि मुगलों पर निरन्तर मुद्राओं और रत्नों की वर्षा होती रहती होगी।
* वही, पृष्ठ ४५

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    अनुक्रम

  1. प्राक्कथन
  2. पूर्ववृत्त के पुनर्परीक्षण की आवश्यकता
  3. शाहजहाँ के बादशाहनामे को स्वीकारोक्ति
  4. टैवर्नियर का साक्ष्य
  5. औरंगजेब का पत्र तथा सद्य:सम्पन्न उत्खनन
  6. पीटर मुण्डी का साक्ष्य
  7. शाहजहाँ-सम्बन्धी गल्पों का ताजा उदाहरण
  8. एक अन्य भ्रान्त विवरण
  9. विश्व ज्ञान-कोश के उदाहरण
  10. बादशाहनामे का विवेचन
  11. ताजमहल की निर्माण-अवधि
  12. ताजमहल की लागत
  13. ताजमहल के आकार-प्रकार का निर्माता कौन?
  14. ताजमहल का निर्माण हिन्दू वास्तुशिल्प के अनुसार
  15. शाहजहाँ भावुकता-शून्य था
  16. शाहजहाँ का शासनकाल न स्वर्णिम न शान्तिमय
  17. बाबर ताजमहल में रहा था
  18. मध्ययुगीन मुस्लिम इतिहास का असत्य
  19. ताज की रानी
  20. प्राचीन हिन्दू ताजप्रासाद यथावत् विद्यमान
  21. ताजमहल के आयाम प्रासादिक हैं
  22. उत्कीर्ण शिला-लेख
  23. ताजमहल सम्भावित मन्दिर प्रासाद
  24. प्रख्यात मयूर-सिंहासन हिन्दू कलाकृति
  25. दन्तकथा की असंगतियाँ
  26. साक्ष्यों का संतुलन-पत्र
  27. आनुसंधानिक प्रक्रिया
  28. कुछ स्पष्टीकरण
  29. कुछ फोटोग्राफ

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