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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
प्रख्यात मयूर-सिंहासन हिन्दू कलाकृति
हम पिछले अध्याय में बता चुके हैं कि ताज हिन्दू प्रासाद का भूगर्भ-कक्ष और पहली मंजिल का केन्द्रीय कक्ष किस प्रकार अत्यधिक सुसज्जित थे। पहली मंजिल के कक्ष में चाँदी के द्वार, सोने की रेलिंग और एक बरामदा जिसे संगमरमर की रत्नजड़ित जाली से ढका गया था, ऐसे बरामदे में क्या होगा? निश्चित ही इसमें भी वैसी ही अत्यधिक आकर्षक वस्तु होगी। स्वर्णिम चौखटा यों ही साधारण चित्र धारण नहीं करता। उसी प्रकार चमकदार पहली मंजिल जिसमें मूल्यवान् धातु और बहुमूल्य रत्न जड़ित हों और ऐसी आकर्षक सज्जा जो कि हिन्दू मयूर-सिंहासन के गौरव के अनुरूप हो। हम इस निष्कर्ष पर इस कारण पहुंचते हैं क्योंकि ताजमहल और मयूर-सिंहासन दोनों ही लगभग एक साथ ही शाहजहाँ शासन के कल्पित लेखे-जोखे से अंकित हैं।
मध्ययुगीन धर्मान्ध मुस्लिम शासक, उसमें जो भी अधिक धर्मान्ध मौलवियों से घिरा हुआ हो वह मयूर-सिंहासन के निर्माण का आदेश नहीं दे सकता। अपने दशाब्दियों के भारत में शासन की अवधि में उनका एक उद्देश्य था मूर्ति-भंजन न कि मूर्ति-निर्माण।
वास्तव में हिन्दू ताजमहल को अपने अधिकार में लेने का शाहजहाँ का केवल यही उद्देश्य नहीं था, एक शक्तिशाली और समृद्ध गृहस्वामी को गृहविहीन कर दिया जाए और ताजमहल की अपार सम्पत्ति को हथियाकर स्वयं समृद्ध बन जाए। ताजमहल को हथियाने के बाद शाहजहाँ ने उसके चाँदी के द्वार, सोने के खम्भे उखड़वा दिए, सुन्दर संगमरमर की रत्नजड़ित जालियों में से रत्नों को निकलवा दिया (अब उसमें केवल छिद्र ही दिखाई देते हैं) और सर्वाधिक प्रसिद्ध मयूर-सिंहासन को उसने अपने अधिकार में कर लिया।
मयूर-सिंहासन केवल किसी हिन्दू प्रासाद का ही सज्जा-उपकरण हो सकता है, क्योंकि परम्परा से हिन्दू सिंहासनों में किसी-न-किसी सुन्दर पक्षी अथवा पशु की आकृति अनिवार्य रूप से बनाई जाती रही है। हिन्दू पारिभाषिक शब्दावली के अनुसार राजा के आसन को 'सिंहासन' कहा जाता है।
हिन्दू देवी-देवता और राजाओं के सिंहासनों पर उनके प्रिय पशु-पक्षी की आकृति अंकित होती थी। हिन्दू पुराणों में गरुड़, सिंह, व्याघ्र, मयूर तथा अन्य अनेक पशु और पक्षियों का सम्बन्ध विभिन्न देवी-देवताओं के सिंहासनों या उनके वाहनों से स्थापित किया जाता है। इसके विपरीत मुस्लिम धार्मिक परम्परा में किसी भी प्रकार की आकृति और प्रतिमा-निर्माण का सर्वथा निषेध किया गया है। इन सब पर विचार करते हुए इतिहास के गहन अध्येता को यह अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा कि शाहजहाँ के आदेशानुसार मयूर-सिंहासन बनाए जाने की अतिरंजित कल्पना शाहजहाँ के निर्माण कार्यों में चालाकी से केवल यह छिपाने के लिए जोड़ दी गई है कि ताजमहल को उसके स्वामी जयसिंह से हथियाने के बाद शीघ्र ही शाहजहाँ ने हिन्दू मयूर-सिंहासन भी उस राजभवन से हटवाकर अपने अधिकार में ले लिया था।
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- प्राक्कथन
- पूर्ववृत्त के पुनर्परीक्षण की आवश्यकता
- शाहजहाँ के बादशाहनामे को स्वीकारोक्ति
- टैवर्नियर का साक्ष्य
- औरंगजेब का पत्र तथा सद्य:सम्पन्न उत्खनन
- पीटर मुण्डी का साक्ष्य
- शाहजहाँ-सम्बन्धी गल्पों का ताजा उदाहरण
- एक अन्य भ्रान्त विवरण
- विश्व ज्ञान-कोश के उदाहरण
- बादशाहनामे का विवेचन
- ताजमहल की निर्माण-अवधि
- ताजमहल की लागत
- ताजमहल के आकार-प्रकार का निर्माता कौन?
- ताजमहल का निर्माण हिन्दू वास्तुशिल्प के अनुसार
- शाहजहाँ भावुकता-शून्य था
- शाहजहाँ का शासनकाल न स्वर्णिम न शान्तिमय
- बाबर ताजमहल में रहा था
- मध्ययुगीन मुस्लिम इतिहास का असत्य
- ताज की रानी
- प्राचीन हिन्दू ताजप्रासाद यथावत् विद्यमान
- ताजमहल के आयाम प्रासादिक हैं
- उत्कीर्ण शिला-लेख
- ताजमहल सम्भावित मन्दिर प्रासाद
- प्रख्यात मयूर-सिंहासन हिन्दू कलाकृति
- दन्तकथा की असंगतियाँ
- साक्ष्यों का संतुलन-पत्र
- आनुसंधानिक प्रक्रिया
- कुछ स्पष्टीकरण
- कुछ फोटोग्राफ











