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ताजमहल मन्दिर भवन है

पुरुषोत्तम नागेश ओक

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2022
पृष्ठ :270
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15322
आईएसबीएन :9788188388714

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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...

दन्तकथा की असंगतियाँ


परम्परागत विश्वास के विपरीत, मध्ययुगीन मुस्लिम शासकों के दरबार दुष्कृत्यों, षड्यन्त्रों, दुराचारों, क्रूरताओं और नृशंसताओं से भरपूर थे। ऐसे वातावरण में कला अथवा जीवन के अन्य उच्चादर्शों की प्रगति के लिए वहाँ कोई अवसर नहीं था, इसलिए नृत्य, चित्रकारी, संगीत और भवन-निर्माण आदि कलाओं के प्रोत्साहन की सब बातें निराधार हैं। वास्तव में मुस्लिम घुसपैठ के प्रारम्भ होते ही सारी प्रगति अवरुद्ध हो गई, क्योंकि अधिकांश जन अपने तथा अपने बाल-बच्चों के जीवन की सुरक्षा के लिए चिन्तित रहते थे। इस प्रकार के अत्यन्त भयावह वातावरण में कुछ भी पनपना सम्भव नहीं था। ताजमहल जैसा भव्य भवन तो सुदीर्घ शान्ति और सम्पन्नता के समय का आभास देता है।

श्री केशवचन्द्र मजूमदार* कहते हैं-"एतमाद-उद-दौला, नूरजहाँ का पिता, हमें बताता है कि ५,००० के लगभग औरतें मुगलों के हरमों में छटपटाती रहती थीं उनमें से कुछ के पुत्रों को आजीवन एकान्त बन्दीगृह में रहना पड़ता था। " जब शासक की अपनी सन्तान का ही अन्त हो तो जन-साधारण, जिनमें अधिकांश वे तिरस्कृत हिन्दू होते थे जो अपना धर्म और संस्कृति शासकों से श्रेष्ठ समझते थे, की दुर्दशा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त हम भली प्रकार जानते हैं कि राजघरानों और नवाबों में कितना यौनाचार होता था, यही कारण था कि असंख्य नपुंसक मुस्लिम दरबार का अनिवार्य अंग बन गए थे। क्या इस प्रकार का वातावरण विविध कलाओं के मूलोच्छेदन के लिए पर्याप्त नहीं था?
१. के. सी. मजूमदार लिखित 'इंपीरियल आगरा ऑफ दि मुगल्स', पृष्ठ ५

निरन्तर युद्ध की तैयारी, नौकरों की विशाल सेना, नवाबों का धन के लिए लालायित रहना, हरमों का रख-रखाव, इन सबको देखते हुए भारत में मुसलमान शासकों के पास सदा धन की कमी ही रही। जन-साधारण की भाषा में कहा जाए तो यही कि वे दो समय तक का भोजन भी नहीं जुटा पाते थे। इसलिए, इस्लामी दरबारों में अपार सम्पत्ति बखान करनेवाले सभी विवरण असत्य हैं। इसमें सन्देह नहीं कि धन आता था, निस्सहाय जनता को लूटकर धन एकत्रित होता था और जैसे ही वह एकत्रित होता था वैसे ही वह तुरन्त खर्च करना पड़ता था। इस प्रकार दरबार में धन एकत्रित होता और हड़प लिया जाता। वास्तव में इस लालच की पूर्ति के लिए शासक द्वारा निस्सहाय प्रजा पर अत्याचार करना आवश्यक हो गया था। और ज्यों ही लूट की सम्पत्ति एकत्रित होती उसे तुरन्त बाँट दिया जाता था। इस प्रकार करोड़ों रुपए खर्च कर मृत महारानी के शव को दफनाने के लिए इतने बड़े ताजमहल के निर्माण के लिए शासकीय कोष में धन था ही नहीं। विपरीत इसके मध्ययुगीन मुसलमान इतिहासकारों द्वारा लिखित दरबार की सम्पत्ति और वैभव के असंगत वर्णन का उद्देश्य शासकों की चापलूसी करके स्वयं वैभवशाली बनना था। वे तथाकथित इतिहासकार शाही कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी चापलूसी करते हुए उनके वैभव का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन कर लूट के हिस्से में स्वयं भागीदार बनने के यत्न में लगे रहते थे।

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    अनुक्रम

  1. प्राक्कथन
  2. पूर्ववृत्त के पुनर्परीक्षण की आवश्यकता
  3. शाहजहाँ के बादशाहनामे को स्वीकारोक्ति
  4. टैवर्नियर का साक्ष्य
  5. औरंगजेब का पत्र तथा सद्य:सम्पन्न उत्खनन
  6. पीटर मुण्डी का साक्ष्य
  7. शाहजहाँ-सम्बन्धी गल्पों का ताजा उदाहरण
  8. एक अन्य भ्रान्त विवरण
  9. विश्व ज्ञान-कोश के उदाहरण
  10. बादशाहनामे का विवेचन
  11. ताजमहल की निर्माण-अवधि
  12. ताजमहल की लागत
  13. ताजमहल के आकार-प्रकार का निर्माता कौन?
  14. ताजमहल का निर्माण हिन्दू वास्तुशिल्प के अनुसार
  15. शाहजहाँ भावुकता-शून्य था
  16. शाहजहाँ का शासनकाल न स्वर्णिम न शान्तिमय
  17. बाबर ताजमहल में रहा था
  18. मध्ययुगीन मुस्लिम इतिहास का असत्य
  19. ताज की रानी
  20. प्राचीन हिन्दू ताजप्रासाद यथावत् विद्यमान
  21. ताजमहल के आयाम प्रासादिक हैं
  22. उत्कीर्ण शिला-लेख
  23. ताजमहल सम्भावित मन्दिर प्रासाद
  24. प्रख्यात मयूर-सिंहासन हिन्दू कलाकृति
  25. दन्तकथा की असंगतियाँ
  26. साक्ष्यों का संतुलन-पत्र
  27. आनुसंधानिक प्रक्रिया
  28. कुछ स्पष्टीकरण
  29. कुछ फोटोग्राफ

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