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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
शाहजहाँ द्वारा अपने अधिकार में लिये जाने से पूर्व 'ताज'-सम्पत्ति पर जयसिंह का निर्विवाद स्वामित्व नितान्त निर्णयात्मक विवरण है। वास्तव में विशाल रूप में हमारे सम्मुख उपस्थित प्रमाणों में 'ताज'-सम्पत्ति पर जयसिंह का स्वामित्व सबसे बड़ी मेखला अथवा धुरी है जिस पर सारा मामला प्रचलित धारणानुसार शाहजहाँ द्वारा मूल रूप में बदलकर पूर्वकालिक राजपूत उद्गम की ओर उन्मुख हो जाता है।
कोई भी न्यायाधिकरण जहाँ सांसारिक ज्ञानवान् व्यक्ति पीठासीन हों और जो अपने निर्णय को मनगढन्त कल्पनाओं से प्रभावित नहीं होने देते हों, वे ताज- सम्पत्ति पर जयसिंह के स्वामित्व की सर्वसम्मत बात को तुरन्त ही अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रूप में देखेंगे। इतिहास के विद्वानों ने इसी स्थल पर विशेष रूप से भूल की है। यह मानते हुए कि शाहजहाँ ने वास्तव में ही मकबरा बनवाया था, तब वे पूर्णतया कल्पना करते गए कि उसने केवल जयसिंह से भूमि का एक खाली टुकड़ा ही लिया था। किन्तु अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन के आधार पर हम जान चुके हैं कि ताज की कथा आदि से अन्त तक मनगढन्त है। इसलिए इसका एकमेव निष्कर्ष यही है कि शाहजहाँ ने पूर्वनिर्मित प्रासाद को अधिकृत कर मकबरे के रूप में उसका दुरुपयोग किया।
यद्यपि हम यह पर्यवेक्षण कर चुके हैं कि जयसिंह का स्वामित्व इस विषय का समाधान कर देता है तदपि ऐसे अनेक अन्य प्रमाण भी हैं जो हमारी इस धारणा को निश्चित बल प्रदान करते हैं कि ताजमहल का निर्माण राजपूत प्रासाद के रूप में हुआ था। ताजमहल के भीतर की सारी चित्र-यवनिका भारतीय पुष्प शैली के आधार पर है।
यदि शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया होता तो उसने कभी यह अनुमति नहीं दी होती कि जिस मकबरे में उसकी पत्नी दफन है, उसकी चित्र-यवनिका प्रमुख रूप से भारतीय पुष्प-शैली पर आधारित हो। यह तर्क नितान्त असंगत है कि ताजमहल पर कार्यरत कर्मचारी हिन्दू थे। अत: इसकी सजावट में हिन्दू पुष्प शैली सम्मिलित हो गई। यह स्मरण रखना चाहिए कि वादक सदा गृहस्वामी की आज्ञानुसार ही अपनी धुनें बजाया करता है। इससे भी बढ़कर बात यह है कि जब दिवंगत आत्मा की शान्ति का प्रश्न है तब ताजमहल के रूपांकन में तिरस्कृत सम्प्रदाय के लक्षणों तथा पुष्पों का ताज की अलंकृत सजावट में समावेश कभी भी अपेक्षित नहीं हो सकता था। वास्तव में मकबरे को सजावट के साथ बनवाने तथा उसमें शानदार नमूने बनाने का सम्पूर्ण विचार ही इस्लामी सम्प्रदाय तथा परम्परा के अनुसार घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। किन्तु शाहजहाँ के सम्मुख इनको उनमें बने रहने देने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प ही नहीं रह गया था, क्योंकि उसने तो 'मूर्तिपूजक' का महल अपने अधीन किया था।
जो लोग यह तर्क देते हैं कि मुसलमान शासकगण अपने स्मारकों में हिन्दू शैली और कला को स्वतन्त्रतापूर्वक अपनाने देते थे, उनको यह अवश्य विचार करना चाहिए कि बीसवीं शताब्दी में भी जबकि रूढ़िवादिता की धार कुन्द हो गई है, मुस्लिमों का कोई भी वर्ग अपना मकबरा या मस्जिद मन्दिर की शैली में बनाने की कल्पना अथवा साहस नहीं करेगा।
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