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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
हिन्दू कर्मचारियों की नियुक्ति के आधार पर ताज के अलंकृत नमूनों में हिन्दू रूपांकन एवं पुष्प-सजावट की विद्यमानता को तर्कसंगत ठहराना दूसरे आधार पर भी निरर्थक है। प्रचलित मुस्लिम अभिलेखों (जिन्हें हमने काल्पनिक सिद्ध कर दिया है) में ताज के डिजाइनर तथा कलाकारों के रूप में मुस्लिम नामों को भी सूची प्रस्तुत की है, हिन्दू कलाकृतियों के प्रति उनका प्रेम अथवा रुझान होने का तो प्रश्न ही नहीं। यह तो अवश्य स्मरण रखना चाहिए कि भारत के प्रत्येक मुस्लिम शासक का प्रथम एवं प्रमुख उद्देश्य भारतीय मन्दिर, कलाकृतियाँ, लेख, शास्त्र, संस्कृति और धर्म को नष्ट करना था। ऐसे शासक अपने स्मारकों में भारतीय कला के नमूनों और लक्षणों को किस प्रकार सहन कर सकते थे अथवा उनको प्रोत्साहन दे सकते थे? यह सब विचार हमको यह विश्वास दिलाने में समर्थ होने चाहिए कि इतिहासकारों तथा शिल्पज्ञों ने सामान्य रूप से ही व्यर्थ की धारणा पर मध्यकालीन मस्जिदों और मकबरों को मौलिक मुस्लिम निर्मिति समझकर उन भवनों के मूल को खोजने की आवश्यकता ही नहीं समझी।
जो सबसे बुरी बात है वह यह कि जब इन इतिहासज्ञों और शिल्पज्ञों को असंख्य उदाहरणों द्वारा अपनी भ्रान्ति का ज्ञान हुआ कि लिखित दावों के विपरीत ये भवन उन लोगों की मृत्यु से भी पहले विद्यमान थे, जिनके ये मकबरे समझे जाते हैं, तब उन्होंने अनुमानतया यह स्पष्टीकरण दे दिया कि मृतक ने स्वयं ही मरणपूर्व अपनी कब खुदवा ली थी, इस प्रकार माण्डू (मध्य भारत) में होशंगशाह का मकबरा, सिकन्दरा में अकबर का मकबरा और दिल्ली में गियासुद्दीन तुगलक का मकबरा-ये उन बादशाहों द्वारा स्वयं बनवाए कहे जाते हैं जो किसी को भी फांसी पर लटकाने के लिए कभी भी तैयार रहते थे, या जीवित रहने पर मनमर्जी करते थे तथा सोचते थे कि मैं ही एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो कभी मरनेवाला नहीं। यह विश्वास करना भद्देपन की पराकाष्ठा है कि मृतक बादशाह ने स्वयं अपने मकबरे बनवाए। इससे तुच्छ और उपहासास्पद और कुछ नहीं हो सकता। सीधा, सत्य और अकाट्य स्पष्टीकरण यह है कि राजपूतों के बनवाए हुए पुराने भवनों को मुस्लिम बादशाहों को दफनाने के उपयोग में लाया गया। क्योंकि यह व्यावहारिक दृष्टि से उचित नहीं मालूम होता था कि जो अपने जीवनपर्यन्त शासन करते रहे उनके उत्तराधिकारियों द्वारा कोई उचित स्थान उनके दफनाने के लिए नहीं दिया गया। इसलिए उन उत्तराधिकारियों ने झूठे विवरण लिखकर रख दिए कि उन्होंने अपने पूर्वजों के मकबरे बनवाए जैसा कि जहाँगीर दावा करता है कि उसने अकबर का मकबरा बनवाया। इतिहासज्ञों और शिल्पज्ञों को अब पता लग गया है कि वे उल्लेख जहाँगीर और उस जैसे अन्यों के कि उन्होंने अपने पूर्वजों के मकबरे बनवाए, झूठे हैं और अपनी ही कथा को सत्य सिद्ध करने के लिए स्वयं ही भ्रमपूर्ण मन्तव्य प्रस्तुत कर दिए। अब समय आ गया है कि ऐसी विकृतियों एवं दोषों को, वे चाहे जानबूझकर किए गए हों अथवा सहज ही बन पड़े हों, उनकी भारतीय इतिहास की पुस्तकों में से निकाल दिया जाना चाहिए।
ताजमहल की आलंकारिक रेखाओं में यत्र-तत्र कमल छितरे पड़े हैं, हिन्दुओं के लिए कमल न केवल परम पवित्र हैं अपितु हिन्दू आलंकारिक कला के अभिन्न अंग हैं। उनकी विद्यमानता इस बात पर पुनः बल प्रदान करती है कि ताजमहल का मूल राजपूती ही है।
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