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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
जैसे ही कोई व्यक्ति नगर से ताज की ओर प्रस्थान करता है ताज परिसीमा यद्यपि बाहरी प्रवेश-द्वार से भी आधा मील दूर रहती है तदपि उसे मार्ग से दाईं ओर केवल दस गज की दूरी पर लाल पत्थर का स्तम्भ पृथ्वी में आधा गड़ा हुआ स्पष्ट दिखाई पड़ता है। पाषाण-स्तम्भ से ऊँचे उठते हुए भू-भाग पर उभरती हुई एक दीवार देखी जा सकती है जो डामर की सड़क के साथ विषम कोण पर ओझल हो जाती है। दोनों ओर आसपास बने घास से दबे मिट्टी के अनेक टीले आज भी अपनी कथा कहते हुए दीख पड़ते हैं। जिस समय ताज राजप्रासाद के रूप में था और उसे मकबरे के रूप में परिणत नहीं किया गया था, उस समय ये टीले स्पष्टतया सुरक्षात्मकता के प्रतीक थे।
उक्त स्तम्भ यह प्रकट करता है कि बुों से युक्त एक अन्य सुरक्षात्मक दीवार से ताज के चारों ओर का विस्तृत क्षेत्र परिवेष्टित था। यह दीवार ताज के चारों ओर खवासपुरा और जयसिंहपुरा बस्तियों से लगी हुई होगी। कहने का अभिप्राय है कि ताज तो शासक का प्रासाद था और उसके चारों ओर नागरिकों के आवास थे। स्तम्भ के दोनों ओर मलबा, जिससे कि यह दीवार दब गई है, साफ करवाकर इस क्षेत्र में खुदाई होनी चाहिए।
बाहरी प्रवेश-द्वार पर नगर से डामर के मार्ग द्वारा जैसे ही कोई व्यक्ति स्वागत-आयतन पर पहुंचता है, वहाँ पर लाल पत्थर के अनेक मण्डप हैं। यह सब यह प्रकट करता है कि मकबरे के रूप में निर्माण से दूर ताज प्राचीन आगरा नगरी का केन्द्रीय प्रासाद था।
शाहजहाँ स्वभावतया इस भव्य भवन को राजपूती आवास के रूप में सहन न कर सका तो उसने निश्चय किया कि उसे आवासीय प्रयोजन के लिए सर्वथा अनुपयुक्त बना दिया जाए और उसने इसको मकबरे के रूप में परिवर्तित कर दिया, अतः राजपूत प्रासादों एवं मन्दिरों को मकबरों में बदल देने की भारत में मध्यकालीन १०० वर्ष की पुरानी परम्परा में ही ताजमहल भी एक कड़ी है। यही सब निकटतम फतेहपुर सीकरी में भी दोहराया गया।
प्रचलित ताज-कथा में कुछ लोगों के मस्तिष्क इतनी बुरी तरह भ्रमित हो चुके हैं कि वे शाहजहाँ के मुमताज़ के प्रति प्रेम को ही ताज के निर्माण का कारण मानकर आत्मतुष्ट रहना चाहते हैं, अपेक्षया इसके कि ताज के मूल के सम्बन्ध में वास्तविक विवरण को स्वीकार करें। वास्तव में ताज का मूलतया राजप्रासाद होना अधिक शोभनीय और सम्भाव्य है अपेक्षया शोकजनक मकबरे के। किन्तु जो इतिहास की अपेक्षा भ्रम को तथा सत्य की अपेक्षा रूढ़ि को अधिक श्रेयस्कर समझते हैं उनका न कोई उपचार है और न उनसे कुछ कहा जा सकता है। ऐसे लोगों में सामान्य पाठक तथा वे जो स्वयं को इतिहास का अध्येता, विशेषज्ञ और विद्वान् मानते हैं, सम्मिलित हैं। अन्य उन्मुक्त मस्तिष्कवाले व्यक्ति तो पिछले पृष्ठों में दिए गए साक्ष्य पर अवश्य ही गम्भीरतापूर्वक विचार करेंगे।
किन्तु प्रस्तुत पुस्तक को उस भवन के इतिहास के सम्बन्ध में जिसे वर्तमान में ताजमहल कहा जाता है, अन्तिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। वास्तव में नई दिशा की ओर यह प्रथम प्रयास है। जो खोजने में हम सफल होने का दावा करते हैं वह यह कि ताजमहल सत्रहवीं शती का मुस्लिम मकबरा नहीं अपितु प्राचीन हिन्दू भवन है। इसका निर्माण मूलतया मन्दिर अथवा प्रासाद अथवा मन्दिर-प्रासाद परिसर के रूप में हुआ इस विषय में हम स्पष्ट नहीं हो पाए, क्योंकि इन भव्य भवन के प्रत्येक कोने को देखने के लिए न तो हमारे पास साधन थे और न ही अधिकार।
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