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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
साक्ष्यों का संतुलन-पत्र
प्रस्तुत अध्याय में हम ताजमहल सम्बन्धी प्रचलित कथा के पक्ष एवं विपक्ष में प्रमाणों का संक्षिप्तीकरण प्रस्तुत करेंगे जिससे कि पाठक प्रचलित ताज-कथा की निस्सारता एवं असत्यता को समझ वास्तविकता को जान सकें। हमने ताजमहल के सम्बन्ध में जो प्रमाण प्रस्तुत किए हैं उनसे वह प्राचीन हिन्दू प्रासाद था और उसे शाहजहाँ ने अधिग्रहण करके उसमें कुछ व्यर्थ के परिवर्तन कर उसको अपनी एक रखेल के मकबरे के रूप में प्रवर्तित किया, उनकी शक्ति और मात्रा का लेखा- जोखा प्रस्तुत करेंगे।
प्रचलित धारणा, कि यह शाहजहाँ था जिसने ताजमहल बनवाया, के पक्ष में हम तीन प्रमाण प्रस्तुत करेंगे और वे भी बिना किसी पुष्ट प्रमाण के नहीं:
(१) हम स्वीकार करते हैं कि ताज के केन्द्रीय कक्ष में कब्रों जैसे दो मिट्टी के स्तूप हैं जिनमें से एक शाहजहाँ की सहस्रों रखेलों में से एक मुमताज़ का होगा, और दूसरा स्वयं शाहजहाँ का। इसे स्वीकार करने के बाद अब हम अपनी बात की ओर संकेत करेंगे। यह भली भाँति विदित है कि ऐसे अनेक स्तूप जाली है। ऐसे स्तूप कभी-कभी ऐसे ऐतिहासिक भवनों के बरामदों में भी प्राप्त हुए हैं, जहाँ किसी मृतक को नहीं दफनाया जा सकता। दूसरी बात यह है कि मुमताज़ के दफन किए जाने की कोई तिथि उल्लिखित नहीं है, इसलिए यह सन्देहास्पद है कि उसको वहाँ दफनाया भी गया है कि नहीं। उसके दफन के समय भी उसकी मृत्यु से ६ मास और नौ वर्ष के मध्य बताया जाता है यहाँ तक कि उसके शव के लिए ऐसा विशिष्ट भव्य प्रासाद स्मारक बनाने की बात के बाद भी इस प्रकार की अस्पष्टता नितान्त सन्देह का कारण है। औरंगजेब के शासनकाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी का एक अधिकारी मनूची ने लिखा है कि अकबर का मकबरा खाली है। कौन जानता है कि तब इसी प्रकार मुमताज का मकबरा भी खाली न हो। इतने सुस्पष्ट प्रमाणों के होने पर भी हम यह अनुमान लगाने के लिए तैयार हैं कि वे दो मकबरे मुमताज़ और शाहजहाँ के हो सकते हैं।
(२) प्रचलित ताज-कथा के पक्ष में दूसरी बात है, मकबरे और कुछ मेहराबों के बाहरी भागों में कुरान की आयतें खुदी हुई हैं। हमारा इस बात पर प्रबल कथन यह है कि अजमेर स्थित 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' और दिल्ली की तथाकथित कुतुबमीनार पर भी ऐसी आयतें खुदी हुई हैं, किन्तु उन सब को छलना माना जाता है। इसलिए ताज पर की गई खुदाई तो हमारे सन्देह को पुष्ट करनेवाला वाली है।
(३) प्रचलित विवरण के पक्ष में तीसरी बात है कि कुछ इतिहास ताज के निर्माण का श्रेय शाहजहाँ को देते हैं। इस बात पर हमारी आपत्तियाँ अनेक हैं। इतिहासकारों में मुल्ला अब्दुल हमीद जैसे व्यक्ति तो केवल अपने संरक्षक की प्रशंसा और प्रसन्नता द्वारा सरलता से अपनी आजीविका अर्जन करनेवालों में हैं। द्वितीयतः, शाहजहाँ का अपना दरबारी इतिहास-लेखक मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है कि अर्जुमन्दबानो बेगम उर्फ मुमताज़ को मानसिंह के प्रासाद में दफनाया गया।
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