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ताजमहल मन्दिर भवन है

पुरुषोत्तम नागेश ओक

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2022
पृष्ठ :270
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15322
आईएसबीएन :9788188388714

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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...

आनुसन्धानिक प्रक्रिया


प्रसिद्ध इतिहासज्ञों के साथ अपने विचार-विमर्श के समय हमने पाया कि वे हमारी अनुसन्धान-प्रक्रिया पर सन्देह व्यक्त करते हुए हमारी अनुसन्धान की प्रबलता को टालने का यत्न करते हैं। इसलिए हम यहाँ पर उन प्रमुख इतिहास-शोधकों की प्रक्रिया का उल्लेख करते हैं जिन्हें संसार-भर के इतिहास के प्राध्यापकों में असीम आदर-भक्ति प्राप्त है।

उस सुखद आघात की कल्पना कीजिए जो हमें लगा है जब हमने पाया कि विषय के धुरन्धर विद्वानों ने उन्हीं सिद्धान्तों का पोषण किया है जिन्हें हम अपने ऐतिहासिक अनुसन्धान के लिए प्रयुक्त करते रहे हैं। विपरीत इसके वे ही इतिहास के अध्यापक और प्राध्यापक तथा अनुसन्धानकर्ता जो उन प्रमुख सिद्धान्तों की दुहाई देते हैं उन्होंने उन सभी सिद्धान्तों को तिलांजलि दे दी है जिन्हें उनके गुरु बड़ा महत्त्वपूर्ण बताते थे। इससे स्पष्ट होता है कि क्यों भारतीय इतिहास, जो आजकल पढ़ाया और प्रस्तुत किया जाता है, इतना अधिक भ्रान्त और गम्भीर गलतियों का भण्डार बना हुआ है ?

इन गलतियों के कुछ उदाहरण हैं-१. यह कि अकबर महान् और भद्र था, जबकि उसके कारनामे सिद्ध करते हैं कि वह औरंगजेब का प्रपितामह* था। २. शेरशाह और फिरोजशाह तुगलक जैसे शासकों को अनेक मार्गों, दुर्गों, प्रासादों और नगरों का निर्माता मानना और उन्हें आदर्श प्रशासक मानना जबकि उनका राज्य निरन्तर लूट-मार का राज्य था। ३. तथाकथित मध्यकालीन मुस्लिम मकबरों और मस्जिदों को जो हिन्दू पद्धति पर बने हैं उन्हें मुस्लिम-पूर्व हिन्दू भवन मानने में संकोच करना।
* 'इतिहास की भयंकर भूलें', में अकबर पर विशेष अध्याय सिद्ध करता है कि वह अधम था। इसके अतिरिक्त लेखक की पुस्तक 'कौन कहता है अकबर महान् था!' भी पठनीय है।

इन सब गलतियों के फलस्वरूप ऐतिहासिक अनुसन्धान-प्रक्रिया के आधारभूत सिद्धान्तों की पूर्ण उपेक्षा हो गई। इतिहास अन्वेषण का पहला तत्त्व है गुप्तचरी प्रकार की पहुँच। प्रो. डब्ल्यु. एच. वाल्श* कहता है-"जब कोई इतिहासकार किसी इस या उस 'मूल-स्रोत' से कोई वक्तव्य पढ़ता है तो वह उसे यों ही सहज में स्वीकार नहीं कर लेता, यदि वह अपना कार्य जानता है तो उसका उसके प्रति दृष्टिकोण सदा आलोचनात्मक होता है। उसको निश्चय करना होता है कि वह विश्वास करे अथवा नहीं।"
* प्रेक्टिसिंग हिस्टोरियन : ले. प्रो. एच. वाल्श, पृष्ठ १८

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    अनुक्रम

  1. प्राक्कथन
  2. पूर्ववृत्त के पुनर्परीक्षण की आवश्यकता
  3. शाहजहाँ के बादशाहनामे को स्वीकारोक्ति
  4. टैवर्नियर का साक्ष्य
  5. औरंगजेब का पत्र तथा सद्य:सम्पन्न उत्खनन
  6. पीटर मुण्डी का साक्ष्य
  7. शाहजहाँ-सम्बन्धी गल्पों का ताजा उदाहरण
  8. एक अन्य भ्रान्त विवरण
  9. विश्व ज्ञान-कोश के उदाहरण
  10. बादशाहनामे का विवेचन
  11. ताजमहल की निर्माण-अवधि
  12. ताजमहल की लागत
  13. ताजमहल के आकार-प्रकार का निर्माता कौन?
  14. ताजमहल का निर्माण हिन्दू वास्तुशिल्प के अनुसार
  15. शाहजहाँ भावुकता-शून्य था
  16. शाहजहाँ का शासनकाल न स्वर्णिम न शान्तिमय
  17. बाबर ताजमहल में रहा था
  18. मध्ययुगीन मुस्लिम इतिहास का असत्य
  19. ताज की रानी
  20. प्राचीन हिन्दू ताजप्रासाद यथावत् विद्यमान
  21. ताजमहल के आयाम प्रासादिक हैं
  22. उत्कीर्ण शिला-लेख
  23. ताजमहल सम्भावित मन्दिर प्रासाद
  24. प्रख्यात मयूर-सिंहासन हिन्दू कलाकृति
  25. दन्तकथा की असंगतियाँ
  26. साक्ष्यों का संतुलन-पत्र
  27. आनुसंधानिक प्रक्रिया
  28. कुछ स्पष्टीकरण
  29. कुछ फोटोग्राफ

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