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इतिहास और राजनीति >> ताजमहल मन्दिर भवन है ताजमहल मन्दिर भवन हैपुरुषोत्तम नागेश ओक
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पी एन ओक की शोघपूर्ण रचना जिसने इतिहास-जगत में तहलका मचा दिया...
कौलिंगवुड* इतिहासकार की पद्धति की तुलना जासूस से करता है। प्रो. वाल्श आगे लिखता है-"इतिहासकार का विषय बिलकुल समानान्तर है, यदि आवश्यक हो तो उसको अपने दृढ़ विश्वास पर भी सन्देह करने के लिए तैयार रहना चाहिए।"
* दि आइडिया ऑफ हिस्ट्री : लेखक आर. जी. कौलिंगवुड, पृष्ठ १३
ठगे जाने के विरुद्ध इतिहासकारों को चेतावनी देते हुए प्रो. वाल्श लिखता* है-"हम विश्वास कर सकते हैं कि विगत के लिए हमारे पास पर्याप्त प्रमाण हैं बिना यह विश्वास करते हुए कि इसके सम्बन्ध में कोई सुझाव सन्देह से परे 'प्रत्येक दशा में ऐतिहासिक तथ्यों की स्थापना होनी ही चाहिए। उनको यों ही नहीं छोड़ देना चाहिए।"
* प्रेक्टिसिंग हिस्टोरियन, पृष्ठ ८३
लौंग लोइस और सीनबौस* जैसे रीतिविद् इतिहाकारों को परामर्श देते हैं कि प्रत्येक स्वीकारोक्ति को देखने की प्रक्रिया मूलत: सन्देहात्मक होनी चाहिए। वे कहते हैं कि इतिहासकार को सन्देह से शुरू करना चाहिए। भारतीय ऐतिहासिक अनुसन्धान में स्पष्ट असंगतियाँ, अनियमितताएँ, विरोधाभास और भद्दापन तो बिना पूछे-ताछे छोड़ दिया जाता है या उस ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता। उदाहरणार्थ, इस प्रकार के दावे कि कुतुबमीनार को कुतुबुद्दीन ने बनवाया था, या अल्तमश ने, या अलाउद्दीन खिलजी ने, या फिरोजशाह तुगलक ने या फिर थोड़ा-थोड़ा उन सबने ही बनवाया था।
* हिस्ट्री-इट्स परपज एण्ड मैथड : ले. डॉ. जी. जे. रेनियर, पृष्ठ १३२
एक अन्य रीतिविद् एफ. सी. एस. शीलर* भी पुष्टि करता है। "सन्देह-शोध एवं अन्वेषण का मुख्य उत्तेजक भाव है, जबकि आरोपित सत्य हमें सन्तुष्ट करने में असमर्थ हो जाता है तो सन्देह उसमें प्रवेश करता है।"
* 'अवर ह्यूमन टूथ्स' : लेखक शीलर, पृष्ठ ७७-७८
इतिहास-शोधन की रीतिविदों द्वारा ऐतिहासिक अनुसंधान की प्रक्रिया के विषय में जबकि 'सन्देह' और 'शंका' तथा जासूसी पर इतना जोर दिया जाता भारतीय इतिहास, अविश्वसनीय मध्यकालीय इतिहासों, जो केवल संरक्षकों के स्तुतिपाठ-मात्र हैं, का अन्धानुकरण है। सर एच. एम. इलियट* उन्हें "धृष्ट और निहित स्वार्थ जालसाजी" कहता है। डॉ. टेसीटोरी उनको अविश्वसनीय मानता है। इसके बाद भी हमारे इतिहास तुगलकाबाद का दुर्ग तुगलक का बनाया हुआ मानते हैं, क्योंकि उसके साथ उसका नाम जुड़ा हुआ है, बिना यह सोचे-समझे कि प्रत्येक घुसपैठिया जिस स्थान पर अपना अधिकार जमा लेता है, उस पर अपना नाम अंकित कर देता है। और बिना यह पूछे कि क्या उसे बनाने के लिए उसके पास इतना समय, धन, इच्छा, ज्ञान, शान्ति और सुरक्षा के साधन थे? और यदि उसने उसे बनाया ही था तो फिर कुछ ही दिनों बाद उसका विध्वंस क्यों कर दिया? उसी मूर्खता के प्रवाह में अहमदाबाद को अहमदशाह द्वारा और फिरोजाबाद को फिरोजशाह द्वारा बसाया हुआ मान लिया जाता है। यदि हमारे ऐतिहासिक निष्कर्ष का यह आधार है तब तो यही समझना चाहिए कि अल्लाहाबाद निश्चय ही स्वयं अल्लाह ने बसाया होगा।
* इलियट और डौसन का इतिहास, प्राक्कथन।
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- प्राक्कथन
- पूर्ववृत्त के पुनर्परीक्षण की आवश्यकता
- शाहजहाँ के बादशाहनामे को स्वीकारोक्ति
- टैवर्नियर का साक्ष्य
- औरंगजेब का पत्र तथा सद्य:सम्पन्न उत्खनन
- पीटर मुण्डी का साक्ष्य
- शाहजहाँ-सम्बन्धी गल्पों का ताजा उदाहरण
- एक अन्य भ्रान्त विवरण
- विश्व ज्ञान-कोश के उदाहरण
- बादशाहनामे का विवेचन
- ताजमहल की निर्माण-अवधि
- ताजमहल की लागत
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- ताजमहल का निर्माण हिन्दू वास्तुशिल्प के अनुसार
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- शाहजहाँ का शासनकाल न स्वर्णिम न शान्तिमय
- बाबर ताजमहल में रहा था
- मध्ययुगीन मुस्लिम इतिहास का असत्य
- ताज की रानी
- प्राचीन हिन्दू ताजप्रासाद यथावत् विद्यमान
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- उत्कीर्ण शिला-लेख
- ताजमहल सम्भावित मन्दिर प्रासाद
- प्रख्यात मयूर-सिंहासन हिन्दू कलाकृति
- दन्तकथा की असंगतियाँ
- साक्ष्यों का संतुलन-पत्र
- आनुसंधानिक प्रक्रिया
- कुछ स्पष्टीकरण
- कुछ फोटोग्राफ











