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जीवनी/आत्मकथा >> राजा बीरबल

राजा बीरबल

कैलाशचन्द्र भाटिया

प्रकाशक : विद्या विहार प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :108
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2577
आईएसबीएन :81-88140-56-2

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बीरबल के साहित्यिक स्वरूप व बहुआयामी व्यक्तित्व का वर्णन.....

Raja birbal

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कुछ अपनी

आज से लगभग अर्द्धशताब्दी पूर्व ही मन में यह विचार आया कि मात्र चुटकुलेबाजी से कोई व्यक्ति अकबर जैसे महान् शासक के दरबार में नवरत्नों में कैसे स्थान पा सकता है। अवश्य ही उस व्यक्ति में अन्य गुण होंगे। बंधुवर डॉ. सरयू प्रसाद अग्रवाल के शोधग्रंथ ‘अकबरी दरबार के हिंदी कवि’ (सं. 2007) पढ़कर यह स्पष्ट हो गया कि बीरबल मूलतः कवि थे और ‘ब्रह्म’ नाम से काव्य रचना करते थे। निश्चित रूप से उनमें सर्जनात्मक प्रतिभा थी।

आठवें दशक के अंत और नौवें दशक के प्रारंभ में लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी की शीतकालीन अध्ययन-यात्राओं में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के साथ राजस्थान के विविध क्षेत्रों का संदर्शन किया तो पता चला कि कॉकरौली के विद्याभवन (द्वारकेश पुस्तकालय-सरस्वती भंडार) में काफी ग्रंथ ऐसे हैं, जिनमें बीरबल रचित काव्य के अंश हैं। यह बात अग्रज डॉ. अग्रवाल ने भी अपने शोध प्रबंध में व्यक्त की है। फिर इस संबंध में मैंने अपने प्रिय चि. मनोहर कांत, आई.ए.एस. (उ जिलाधीश, उदयपुर) को लिखा। आंशिक सफलता ही मिली। बहुत प्रयास करने पर भी वांछित साहित्य उपलब्ध नहीं हो सका। कुछ वर्ष बाद तो वहाँ का सरस्वती भंडार तितर-बितर हो गया। अब भी कहीं किसी अभेद्य किले में बंद (हस्तलिखित ग्रंथों का बस्ता) सं. 50 तथा 51 प्राप्त हो जाएँ तो बीरबल (ब्रह्म) के कुछ छंद और मिल सकते हैं।

कुछ वर्ष बाद ही बीकानेर के कलेक्टर श्री आर.एन. मीणा के प्रयास से बीकानेर स्थित अनूप पुस्तकालय में प्राप्त ‘सुदामाचरित’ की पांडुलिपि की प्रतिलिपि सन् 1986 में प्राप्त हुई। फोटो प्रति की सुविधा तब उतनी सहज नहीं थी। एक नई कृति के मिल जाने से उत्साहित हुआ। ‘सुदामाचरित’ की स्वच्छ प्रति बनाने का कार्य अपने मित्रवर ब्रजभाषा के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. मोतीलाल चतुर्वेदी तथा शिष्य डॉ. प्रेमदत्त मिश्र को सौंपा। कृति को पठनीय व बोधगम्य रूप देने में जो अथक श्रम अपने अनन्य साथी प्रो. गोविंद शर्मा, निदेशक वृंदावन शोध संस्थान, वृंदावन ने किया उसके लिए धन्यवाद देकर अपनी निकटता में दूरी नहीं बनाना चाहता हूँ। भविष्य में जब कुछ और प्रतियाँ मिल जाएँगी तो पाठालोचन के आधार पर इस कृति का पाठ निश्चित करना होगा।

इसी बीच अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के डॉ. शैलेश जैदी ने भरतपुर की शोध पत्रिका ‘समितिवाणी’ में बीरबल कृत गीता के तत्कालीन भाषा में अनुवाद (फारसी लिपि) की पांडुलिपि पर शोध पत्र प्रकाशित किया। भूषण के काव्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. राजमल बोरा (औरंगाबाद), हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रंथों के समीक्षक श्री वेदप्रकाश गर्ग (मुजफ्फरनगर), मध्यकाल के विशेषज्ञ डॉ. नरेश चंद्र बंसल (कासगंज), तथा डॉ. आनंद बल्लभ शर्मा (गोकुल) से भी इस संबंध में पत्राचार हुआ।
जालौन जिले के गजट का अध्ययन भी किया गया।
आश्चर्य है कि इतने प्रसिद्ध व्यक्ति के संबंध में उनके जन्म, जन्म-स्थान, नाम आदि सबकुछ विवाद के घेरे में है, जबकि आइने अकबरी में उनका विस्तृत परिचय भी मिलता है।

अब भी विश्वास है कि अलीगढ़ मु. विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध इतिहास विभाग में बीरबल के संबंधित कुछ और प्रामाणिक तथ्य मिल सकते हैं। यह शुभ संकेत है कि विश्वविद्यालय में इस वर्ष के डेस्क कैलेंडर में आजाद लाइब्रेरी में प्रदर्शित बीरबल के हस्तलिखित ग्रंथ (गीता का अनुवाद) का एक पृष्ठ ‘नवादेरात’ (विश्वविद्यालय की कला विरासत) में दिया है।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि बीरबल को ‘राजा’ और ‘बीरबल’ की उपाधियाँ तो बाद में मिलीं, पर सबसे पहले अकबर जैसे सम्राट् ने उनको ‘कविराय’ की उपाधि से विभूषित किया।
बिलासपुर (हिमाचल प्रदेश) के रम्य वातावरण में इस पुस्तक की पांडुलिपि तैयार हुई। आशा है, पुस्तक पाठकों का अपेक्षित ज्ञानवर्द्धन करेगी तथा उपयोगी सिद्ध होगी।

कैलाशचंद्र भाटिया

राजा बीरबल (ब्रह्म)


जीवन-परिचय

अकबर के प्रसिद्ध मंत्रियों में ‘बीरबल’ का नाम विख्यात है। यह निर्विवाद है कि अकबर के दरबार के नवरत्नों में से वे एक हैं और वाक्यचातुर्य तथा विनोदप्रियता में विख्यात। तलीफों के क्षेत्र में उनकी प्रसिद्धि उनके इस गुण के कारण हुई होगी। यह बात दूसरी है कि उनके नाम से प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य के चुटकुले वस्तुतः उनके द्वारा कहे गए अथवा लिखे गए।
कालांतर में इतनी अधिक प्रसिद्धि पाने पर भी उनके जीवन चरित्र के कहीं प्रामाणिक आधार नहीं मिलते और विशेष रूप से जीवन की प्रारंभिक अवस्था के बारे में। अबुल फजल ने ‘आइने अकबरी’ में उनके विषय में पर्याप्त लिखा है, लेकिन प्रारंभिक जीवन के विषय में कोई संकेत नहीं दिया।


नाम

इनका मूल नाम ‘महेशदास’ बताया जाता है। ‘शिवसिंह सरोज’ में इनका उल्लेख दो बार क्रमांक 497 तथा 589 में हुआ है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि ‘सरोज’ के प्रथम तथा द्वितीय संस्करण में इनका कोई उल्लेख नहीं मिलता है। तीसरे संस्करण में इसको बढ़ाया गया है। शुक्लजी ने भी हिंदी साहित्य के इतिहास में इनके इस नाम (महेशदास की पुष्टि की है। इनको ही अकबर ने ‘वीरवर’ की उपाधि से विभूषित किया था। इस संबंध में ‘अकबरी दरबार के हिंदी कवि’ शोध ग्रंथ में भाषाविद् डॉ. सरयू प्रसाद अग्रवाल ने अपने विचार प्रकट करते हुए लिखा-‘‘किंतु उसकी इस उपाधि ने मुख्य रूप धारण कर उसके वास्तविक नाम में ही संदेह उत्पन्न कर दिया है। भाषा विकास के विषमीकरण ध्वनि नियम में दो समान ध्वनि ध्वनिएँ पास-पास नहीं आतीं। उनमें से एक का परिवर्तन हो जाता है। इसी प्रकार ‘वीरवर’ शब्द के दो ‘र’ से एक के स्थान पर ‘ल’ प्रचलित हो जाना स्वाभाविक ही है। अतः ‘वीरवर’ अब ‘बीरबल’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। (पृ. सं. 76-77)

उपर्युक्त दो नामों के अतिरिक्त तीसरे नाम ‘ब्रह्म’ का भी उल्लेख पर्याप्त स्थानों में मिलता है। वस्तुतः काव्य रचना इस नाम की छाप से ही मिलती है। संभवतः इस बात को ध्यान में रखकर ही कई विद्वानों ने इस ‘नाम’ के उद्घाटन करने की चेष्टा की, जिनमें से कुछ उल्लेखनीय इस प्रकार है।
1.    सरोज :ब्रह्म कवि, राजा बीरबल ब्राह्मण। (शिवसिंह सरोज)
2. मुंशी देवी प्रसाद : ब्रह्मदास और ब्राह्मण जाति।  (राजा बीरबल)
3.बदायूँनी :ब्रह्मदत्त। (मुंतरवबु तवारीख)
4. ग्रियर्सन : ब्रह्म। (इतिहास)
5. मुआसिरुल उमरा : ब्रह्म। (महेशदास) (अनु. ब्रजरत्न दास)

इस प्रकार इतना निश्चयात्मक रूप से कहा जा सकता है कि कवि रूप में इनका प्रचलित नाम ‘ब्रह्म’ ही रहा होगा। बीरबल कवि भी थे, इस संबंध में विवाद नहीं है, क्योंकि स्वयं अकबर ने इन्हें ‘कविराय’ की उपाधि से विभूषित किया था।...


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