उपनिषदों की कथाएं - महेश शर्मा Upanishadon ki Kathyein - Hindi book by - Mahesh Sharma
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उपनिषदों की कथाएं

महेश शर्मा

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :199
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 337
आईएसबीएन :81-288-0841-9

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उपनिषद अध्यात्म विद्या अथवा ब्रह्मविद्या को कहते हैं। उपनिषद वेद का ज्ञानकाण्ड है। यह चिरप्रदीप्त वह ज्ञान दीपक है जो सृष्टि के आदि से प्रकाशमान है और जो शाश्वत है, सनातन है, अक्षर है।

Upnishadon ki Kathyein - A Hindi Book by - Mahesh Sharma उपनिषदों की कथाएं - महेश शर्मा

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

उपनिषदों की कथाएं अनादि काल से हमारे मनोरंजन और ज्ञान का स्रोत रही है। दादा दादी की कथाओं से लेकर विज्ञान कथाओं का एक व्यापक इतिहास रहा है। वेद, पुराण, महाभारत, रामायण आदि की कथाएं प्राचीन काल से लेकर आज तक ज्ञान और प्रेरणा का भण्डार हैं। उपनिषद की कथाएं भी इसी क्रम में आती हैं। इनकी रचना वेदों की व्याख्या के रूप में हुई। जो बातें वेदों में जटिलता से कही गयी है उन्हें उपनिषदों में सरल ढंग से समझाया गया है। उपनिषदों में देवता-दानव, ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी, पृथ्वी, प्रकृति, चर-अचर, सभी को माध्यम बना कर रोचक और प्रेरणादायक कथाओं की रचना की गयी है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, अग्नि, सूर्य, इन्द्र आदि देवताओं से लेकर नदी, समुद्र, पर्वत, वृक्ष तक उपनिषद के कथापात्र है। उन्हीं गूढ़ पनिषदों की कथाओं को इन उपनिषदों में सरल, रोचक व प्रेरक ढंग से दिया गया है। जिससे कि ये जन मन तक पहुँच कर उनका मार्गदर्शन कर सके।

अपनी बात

उपनिषद् अध्यात्म विद्या अथवा ब्रह्म विद्या को कहते हैं। उपनिषद् वेद का ज्ञान काण्ड है। यह चिर प्रदीप्त वह ज्ञान दीपक है जो सृष्टि के आदि से प्रकाश देता चला आ रहा है और जो शाश्वत और सनातन है। इसके प्रकाश में वह अमरत्व है, जिसने सनातन धर्म के मूल का सिंचन किया है। यह जगत् कल्याणकारी भारत की अपनी निधि है।
मुख्य उपनिषद् दस कहे गए हैं। ये हैं—ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य तैत्तीरीय, एतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक।
सम्पूर्ण वेद तीन भागों में विभक्त हैं—उपनिषद् भाग, मंत्र भाग और ब्राह्मण भाग। उपनिषद् भाग वेद के ज्ञान काण्ड का प्रकाशक है। वर्तमान मन्वंतर में वेद की 1180 शाखाएँ आविर्भूत हुईं। इतनी ही संख्या में उपनिषद्, ब्राह्मण और मंत्र भाग भी प्रकट हुए। पुराणों और उपनिषदों में वेद की यह संख्या पाई जाती है। आज इसका सौवाँ अंश भी नहीं मिलता। उपनिषदों के समान ग्रंथ पुराणों में भी मिलते हैं। जैसे कि महाभारत में श्रीमद्भागवत गीता, जोकि उपनिषदों का सार कही जाती है। इस संदर्भ में देखा जाए तो हमारे सभी धर्म ग्रंथों की जड़ें कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूप में वेदों में ही छिपी हुई हैं। वेदों से पृथक करने पर इनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है।
उपनिषद् एक व्यापक अर्थों वाला शब्द है जिसका मुख्य अर्थ है—विद्या; और गौण अर्थ है—पुस्तक। उपनिषद् वेदों के अंतिम भाग हैं, अतः इन्हें वेदांत भी कहते हैं। सत्य की खोज करने की उत्सुकता, उपनिषदों की एक आनंदमयी और प्रशंसनीय विशिष्टताओं में से एक है।
बिना उपनिषदों को समझे, भारतीय इतिहास और संस्कृति का सूक्ष्म ज्ञान पाना असंभव है। कोई ऐसा पूर्ण विकसित भारतीय आदर्श नहीं जिसका उद्गम उपनिषदों में खोजने पर न मिले। उपनिषद् शक्ति और सृजनात्मकता के सनातन स्रोत हैं। उपनिषद् ही हैं जो कह सकते हैं।
असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय,
मृत्योर्मा अमृतं गमय।


‘‘असत्य से सत्य की ओर मुझे ले चलो, अंधकार से ज्योति की ओर मुझे ले चलो, मृत्यु से अमृत की ओर मुझे ले चलो।’’
उपनिषदों का एक अपना ही कर्म है। वे अमर साहित्य हैं और इसलिए उन्हें हम श्रुति कहते हैं, हम उन सत्यों को इन्द्रियों और इन्द्रियबद्ध मन के परे, लोकातीत अनुभूति में पाते हैं, किंतु शुद्ध मन द्वारा वे अनुभवगम्य हैं। ये उपनिषद् सत्य, सार्वभौमिक और शाश्वत हैं तथा मानवता को सदैव प्रेरित करेंगे। ये मनुष्य को सर्वोच्च की प्राप्ति के लिए सतत् संघर्ष करने के लिए बुलाते हैं; जीवन और अनुभव में नित्य चिरस्थायी, अमृत तत्त्व की उपलब्धि के लिए संघर्ष करने के लिए बुलाते हैं।
उपनिषद् गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श उदाहरण हैं। प्रश्नोत्तर के माध्यम से सृष्टि के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन उपनिषदों में सहज ढंग से किया गया है। विभिन्न दृष्टान्तों, उदाहरणों, रूपकों, संकेतों और युक्तियों द्वारा आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म आदि का स्पष्टीकरण इतनी सफलता से उपनिषद् ही कर सके हैं। उपनिषद् न होते तो वेदों का गूढ़ अर्थ हम नहीं समझ पाते।
उप-समीप, निषद्—निषीदति—बैठनेवाला। जो उस परम तत्त्व के समीप पहुँचकर चुपचाप बैठ जाता है, वह उपनिषद् है। परम तत्त्व अवर्णनीय है। उपनिषद् हमें उस अवर्णनीय परम तत्त्व—परब्रह्म—का साक्षात् ज्ञान कराते हैं। परम तत्त्व तक पहुँचने की कुंजी है उपनिषद्।
(नोट : उपनिषद् के बारे में विस्तार से जानने के लिए ‘डायमंड बुक्स’ में प्रकाशित ‘क्या कहते हैं उपनिषद्’ पढ़ें)
इस पुस्तक में उन्हीं ज्ञान के भण्डार उपनिषदों की मनोरंजक व ज्ञानवर्द्धक कहानियाँ दी जा रही हैं। जो कथात्मक शब्दों में हमारी क्षुद्र वृत्तियों को शांत करती हैं; साथ ही आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी करती हैं।

1
रजि बने इन्द्र


प्राचीन काल की बात है, एक बार दैत्यों और देवताओं में बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। किंतु जब अनेक वर्षों तक इस युद्ध का कोई परिणाम दिखाई नहीं दिया, तब आपस में विचार-विमर्श कर देवगण और दैत्य पितामह ब्रह्माजी की शरण में गए और उनकी स्तुति करते हुए बोले—‘‘पितामह ! आप सर्वज्ञ हैं। आप संसार की रचना करने के कारण यहाँ होने वाली सभी घटनाओं के विषय में आदि से अंत तक भली-भाँति परिचित होते हैं। आपका ज्ञान सृष्टि के लिए कल्याणकारी है। प्रभु ! हम अनेक वर्षों से युद्ध कर रहे हैं, जिसमें असंख्य दैत्य और देव काल का ग्रास बन चुके थे। किंतु युद्ध का कोई परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होता। अब आप ही बताए कि इस युद्ध में कौन-सा पक्ष विजयी होगा ?’’

ब्रह्माजी बोले, ‘‘पुत्रों ! भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के विषय में बताना नियम-विरुद्ध है। इससे विधि के विधान का उल्लंघन होता है। इसलिए मैं इस विषय में तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता। किंतु तुम्हें इतना अवश्य बता सकता हूँ कि पृथ्वी पर रजि नाम का एक परम पराक्रमी राजा राज्य करते हैं। उनका बल अनंत है। पृथ्वी पर कोई योद्धा उनका सामना नहीं कर सकता। इसलिए तुम उनकी शरण में जाकर उन्हें अपने पक्ष में करने का प्रयास करो। वे जिसके भी पक्ष में युद्ध करेंगे, वह निःसन्देह तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर लेगा।’’
यह सुनकर दैत्य और देवता दोनों ही बड़े प्रसन्न होकर राजा रजि के पास आए उनसे अपने-अपने पक्ष में युद्ध करने को कहा। तब रजि इन्द्र से बोले—‘‘देवेन्द्र ! मैं आपके पक्ष में युद्ध करने के तैयार हूँ, किंतु मेरी यह शर्त है कि यदि मैंने अपने पराक्रम से समस्त दैत्यों को पराजित कर दिया तो आपको मुझे इन्द्र बनाना होगा। यदि आपको यह शर्त स्वीकार है तो मुझे युद्ध करने में कोई आपत्ति नहीं है।’’ इन्द्र ने उनकी शर्त सहर्ष स्वीकार कर ली।

रजि ने दैत्यों से भी यही प्रश्न किया। किंतु दैत्य अहंकार भरे स्वर में बोले, ‘‘राजन ! हमने तुमसे अपने पक्ष में युद्ध करने की विनती क्या कर ली, तुम्हारा दुःसाहस इतना बढ़ गया कि तुम स्वयं को ही सर्वशक्तिमान समझने लगे। इन्द्रासन पर केवल दैत्यराज प्रह्लाद ही सुशोभित होंगे। इसलिए तुम चुपचाप हमारे पक्ष में युद्ध करो, अन्यथा इन देवताओं के साथ-साथ हम तुम्हारा भी वध कर डालेंगे।’’
उनकी बात सुनकर रजि अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अस्त्र-शस्त्र धारण कर उन दैत्यों का संहार कर डाला, जो इन्द्र के लिए अवध्य थे। यद्यपि रजि ने दैत्यों का संहार कर दिया था। तथापि अब इन्द्र को अपने सिंहासन की चिंता सताने लगी। वचन के अनुसार उन्हें राजा रजि को इन्द्र बनाना था।
तब देवेन्द्र राजा रजि के पास आए और स्वयं को उनका पुत्र घोषित करते हुए बोले—‘‘तात ! आप निःसन्देह हमारे इन्द्र हैं, क्योंकि आज से मैं आपका पुत्र कहलाऊँगा।’’ उनकी बात सुनकर मायावश रजि ने तथास्तु कह दिया। इस प्रकार इन्द्र को पुत्र-रूप में पाकर वे भी इन्द्र कहलाए।

2
कार्तवीर्य


प्राचीन समय की बात है—पृथ्वी पर हैहयवंश के राजा कृतवीर्य का राज्य था। कृतवीर्य बड़े वीर, दयालु, दानवीर और धर्मात्मा राजा थे। उनके राज्य में सर्वत्र सुख-शांति व्याप्त थी। कृतवीर्य की मृत्यु के बाद मंत्रियों और पुरोहितों ने महर्षि गर्ग से विचार-विमर्श कर उनके पुत्र कार्तवीर्य को बुलवाया और उनसे कहा ‘‘युवराज ! महाराज को प्राण त्यागे बहुत समय हो गया है। सिंहासन को अब अधिक दिनों तक रिक्त रखना उचित नहीं है। पड़ोसी राजा राज्य पर गिद्ध दृष्टि जमाए हुए हैं। वे इस प्रतीक्षा में है कि कब अवसर मिले और वे इसे अपनी अधीन कर लें। महाराज के बाद केवल आप ही उनके सिंहासन पर बैठने के योग्य हैं। आप में सभी श्रेष्ठ गुणों का समावेश है। अतः हमने निर्णय लिया है कि शुभ मुहुर्त में आपका राज्याभिषेक करके राज्य का कार्यभार आपको सौंप दिया जाए। यदि इस बारे में आपको कुछ कहना है तो निस्संकोच कहें।’’
कार्तवीर्य हाथ जोड़ बोले—‘‘मान्यवरों ! आप सभी परम ज्ञानी और विद्वान हैं। आपने सदा इस राज्य की भलाई के विषय में सोचा है। आज भी आपका निर्णय उचित और तर्कसंगत है। किंतु मुझे क्षमा करें। मैं ऐसा राज्य कभी स्वीकार नहीं करूँगा, जो भविष्य में मुझे नरक में ले जाए।’’
उनकी बात सुनकर महर्षि गर्ग विस्मित होकर बोले, ‘‘युवराज ! यह तुम क्या कह रहे हो ? भला यह राज्य तुम्हें किस प्रकार नरक की ओर ले जाएगा ? महाराज कृतवीर्य ने भी यही राज्य करते हुए स्वर्ग को प्राप्त किया है, फिर इसमें तुम्हें क्या दोष दिखाई देता है ? इसके विषय में स्पष्ट बताने की कृपा करें।’’

कार्तवीर्य आदरपूर्ण स्वर में बोले—‘‘महर्षि ! जिस उद्देश्य के लिए प्रजा से कर लिया जाता है, उसका पालन न किया जाए तो कर लेना व्यर्थ है। वैश्य कर इसलिए देते हैं कि हम लुटेरों से उनकी रक्षा करें और वे सुरक्षित होकर व्यापार कर सकें। ग्वाले और किसान भी इसी उद्देश्य से कर देते हैं। पूर्व समय में ऋषी-मुनियों ने प्रजा से मिलने वाले कर को उनकी रक्षा के बदले राजा को दिए जाने वाले वेतन के रूप में निश्चित किया था। फिर कर लेने के बाद भी प्रजा की रक्षा राजा द्वारा न होकर अन्य व्यक्तियों द्वारा हो तो राजा अवश्य नरक का भागी बनता है। इसलिए पहले मैं तपस्या करके पृथ्वी के पालन की शक्ति प्राप्त करना चाहता हूं, तत्पश्चात् मैं यह राज्य स्वीकार करूँगा।’’
महर्षि गर्ग बोले—‘‘युवराज ! आपका कथन सत्य है। यदि आप ऐसा करना चाहते हैं तो मेरी बात ध्यान से सुनें। निकट के वन में मुनि दत्तात्रेयजी वास करते हैं। आप उनकी शरण में जाएँ। उनके आशीर्वाद से आप अपने प्रयोजन में अवश्य सफल होंगे।’’
कार्तवीर्य वन की ओर प्रस्थान कर गए। घने वन में उन्हें एक वृक्ष के नीचे महामुनि दत्तात्रेयजी बैठे दिखाई दिए। उनके निकट ही देवी लक्ष्मी बैठी हुई थीं। कार्तवीर्य ने भगवान द्त्तात्रेयजी को प्रणाम किया और उनकी स्तुति की।
उनकी स्तुति से संतुष्ट होकर दत्तात्रेयजी बोले—‘‘वत्स ! तुम कौन हो ? इस भयानक वन में क्या कर रहे हो ? तुम्हारे मुख की कांति से यह स्पष्ट होता है कि तुम किसी राज्य के राजकुमार हो। अपना परिचय देने का कष्ट करो।’’
कार्तवीर्य दत्तात्रेयजी के चरणों में फूल अर्पित करते हुए बोले—‘‘भगवन् ! मैं महाराजा कृतवीर्य का पुत्र कार्तवीर्य हूँ। महर्षि गर्ग ने आपकी महानता की बड़ी प्रशंसा की थी। इसलिए मैं आपकी सेवा में उपस्थित हूँ। कृपया मुझे सेवक के रूप में स्वीकार करें।’’

दत्तात्रेयजी हँसते हुए बोले—‘‘कार्तवीर्य ! तुम्हें मेरी सेवा नहीं करनी चाहिए। यह निकट बैठी हुई स्त्री मेरी पत्नी है। मैं गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए प्रभु-भक्ति करता हूँ। मुझ साधारण मनुष्य की सेवा से तुम्हें कोई फल प्राप्त नहीं होगा। मैं कुछ भी करने में असमर्थ हूँ। अतः अपने हित के लिए तुम किसी अन्य शक्तिशाली पुरुष की अराधना करो।’’
कार्तवीर्य बोले—‘‘भगवन् ! मुझे अपनी माया से भ्रमित न करें। मुझ जैसे तुच्छ प्राणी के लिए आप ही सबकुछ हैं। सम्पूर्ण जगत् नित्य आपका स्मरण करता है। आप ही सृष्टि के पालनकर्ता भगवान् विष्णु हैं। आपके साथ सुशोभित ये देवी साक्षात् जगत-जननी लक्ष्मी माता हैं। आपकी कृपा-दृष्टि से इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं है।’’
तब दत्तात्रेयजी बोले—‘‘वत्स ! तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए ही मैंने ये वचन कहे थे। किंतु तुमने मेरे कथन के गूढ़ रहस्य को समझ लिया, अतः मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। माँगों, तुम्हें क्या वर चाहिए ? मैं तुम्हें इच्छित वर प्रदान करूँगा।’’
कार्तवीय वर माँगते हुए बोले—‘‘प्रभु ! मुझे ऐसी शक्ति प्रदान करें, जिससे कि मैं भली-भाँति अपनी प्रजा का पालन कर सकूँ। मैं दूसरों के मन की बात जान लूँ। युद्ध में कोई मुझे पराजित न कर सके। युद्ध के समय मेरी एक हज़ार भुजाएँ हो जाएँ और इनका भार मेरे शरीर पर न पड़े। मेरी मृत्यु किसी श्रेष्ठ मनुष्य के हाथों हो। मैं तीनों लोकों में वायु के समान भ्रमण कर सकूँ। भरपूर दान करने के बाद भी मेरा धन कभी कम न हो। जब भी मैं कुमार्ग पर चलने लगूँ तो मुझे सन्मार्ग दिखाने वाला उपदेशक प्राप्त हो।’’ दत्तात्रेयजी ने कार्तवीर्य को इच्छित वर प्रदान कर दिए।
तत्पश्चात् द्त्तात्रेयजी और देवी लक्ष्मी को प्रणाम कर कार्तवीर्य अपने राज्य लौट आए। कुछ दिनों के पश्चात् कार्तवीर्य का राज्याभिषेक किया गया। तब उन्होंने राज्य में यह घोषणा करवा दी कि आज से राज्य में राजा के अतिरिक्त कोई व्यक्ति अस्त्र धारण नहीं करेगा। हज़ार भुजाओं के कारण कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के नाम से भी प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार दत्तात्रेयजी के वरदान से कार्तवीर्य प्रजा का पालन करने में सक्षम हुए।

3
देवी पार्वती


प्राचीन समय की बात है, एक बार महर्षि कश्यप पर्वतराज हिमालय के महल में पधारे। हिमालय ने उनका यथोचित सत्कार कर उनकी पूजा-आराधना की। तत्पश्चात् विनम्र स्वर में बोले—‘‘मुनिश्रेष्ठ ! आप तो परम ज्ञानी और विद्वान हैं। कृपया बताएँ कि किस उपाय से संसार में मेरी प्रसिद्धि हो सकती है ? सत्पुरुषों में मैं किस प्रकार पूजनीय समझा जा सकता हूँ ? मुझे मोक्ष कैसे प्राप्त हो सकता है ?’’
महर्षि कश्यप बोले—‘‘राजन ! आप जो प्राप्त करना चाहते हैं, उसका एक मात्र साधन श्रेष्ठ गुणों से युक्त संतान है। श्रेष्ठ संतान के होने पर सबकुछ स्वतः प्राप्त हो जाता है। आप जानते ही हैं कि ब्रह्माजी और अनेक ऋषी-मुनियों सहित मेरी प्रसिद्धि भी केवल उत्तम संतान के कारण है। अतः गिरिराज ! आप घोर तपस्या करके एक श्रेष्ठ संतान उत्पन्न करें।’’
महर्षि कश्यप के परामर्शानुसार गिरिराज हिमालय ने अनेक वर्षों तक घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी साक्षात् प्रकट हुए और उनसे वर माँगने को कहा।

हिमालयराज उनकी स्तुति करते हुए बोले—‘‘पितामह ! आपने इस तुच्छ सेवक को दर्शन देकर कृतार्थ कर दिया। प्रभु ! आप भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करने में सक्षम हैं। आपकी कृपा-दृष्टि प्राप्त कर मनुष्य समस्त दुखों से मुक्त हो जाते हैं। प्रभु ! यदि आप मेरी तपस्या से संतुष्ट हैं तो मुझे श्रेष्ठ गुणों से युक्त एक संतान प्रदान करने की कृपा करें।’’
ब्रह्माजी बोले—‘‘गिरिराज ! इस तप के प्रभाव से तुम्हारे घर एक कन्या जन्म लेगी, जो साक्षात् भगवती दुर्गा होगी। उनके कारण ही तुम तीनों लोकों में आदर और यश के पात्र बन जाओगे। तुम्हारे यहाँ असंख्य तीर्थों की स्थापना होगी और तुम देवगण द्वारा पूजित होकर अपने पुण्य से उन्हें भी पावन करोगे। संसार में तुम सदा विद्यामान रहोगे।’’ इस प्रकार के वर देकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए।
कुछ समय बाद हिमालय की पत्नी मैना ने एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम पार्वती रखा गया। पार्वती बचपन से ही भगवान् महादेव की अनन्य उपासक थीं। वे सदा उनके ही ध्यान में ही मग्न रहती थीं। एक बार उन्होंने अनेक दिनों तक निराहार रहकर भगवान् भोलानाथ की अराधना की। इससे उनका शरीर अत्यंत दुर्बल और शक्तिहीन हो गया। पुत्री की यह दशा देखकर दुखी मैना ने ‘उ मा’ (ऐसा मत करो) कहकर उन्हें उपवास भंग करने को कहा। तभी से देवी पार्वती संसार में उमा नाम से प्रसिद्ध हुईं।

देवी पार्वती ने अनेक वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनके तप के तेज से तीनों लोक जल उठे। चारों ओर हाहाकार मच गया। तब ब्रह्माजी साक्षात् प्रकट हुए और बोले—‘‘कल्याणी ! आपने इस सृष्टि की रचना की है। किंतु आपके तप की प्रचण्ड ज्वालाएँ इसे जलाकर भस्म कर देना चाहती हैं ! सृष्टि के कल्याण के लिए आप अपनी तपस्या का त्याग करें। आप अपने तेज से तीनों लोकों को धारण करती हैं। फिर ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसे आप तपस्या द्वारा प्राप्त करना चाहती हैं ?’’
देवी पार्वती बोलीं—‘‘पितामह ! आप मेरी तपस्या का उद्देश्य भली-भाँति जानते हैं। मैंने स्वयं को भगवान् शिव के चरण-कमलों में समर्पित कर दिया है और उन्हीं को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप कर रही हूँ।’’
ब्रह्माजी बोले, --‘‘कल्याणी ! आप जिनके लिए तपस्या कर रही हैं, कुछ कुछ समय बाद ही वे आपका वरण करेंगे। देवी ! भगवान् शिव सम्पूर्ण लोकों के स्वामी हैं। देवाधिदेव महादेव देवताओं के साथ-साथ दैत्य, ऋषि, मुनि, नाग, किन्नर, भूत, पिशाच, गंधर्व आदि के लिए भी पूजनीय हैं। उनका स्वरूप बड़ा ही उदार है। वे अपकी इच्छा अवश्य पूर्ण करेंगे। किंतु सृष्टि के कल्याण के लिए आप इस घोर तप का त्याग करें।’’ यह कहकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए और देवी पार्वती तप से निवृत्त होकर आश्रम में रहने लगीं।
एक दिन जब वे भगवान् शिव की पूजा-आराधना में मग्न थीं, उसी समय देवाधिदेव महादेव वहाँ पधारे। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए उन्होंने विकृत स्वरूप धारण कर रखा था। उनकी नाक कटी हुई थी और पीठ पर एक बड़ा-सा कूबड़ उभरा हुआ था। उनका मुख अत्यन्त भयानक था।
वे पार्वती से बोले—‘‘देवी ! तुम बड़ी सुंदर और श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न हो। मैं तुम्हारा रूप-सौंदर्य देखकर तुम पर आसक्त हो गया हूँ और इसी क्षण तुम्हारा वरण करता हूँ।’’

अपने तपोबल द्वारा देवी पार्वती जान गई थीं कि ये साक्षात् देवाधिदेव महादेव हैं। उन्होंने विभिन्न सामग्रियों द्वारा उनका पूजन किया और नम्र स्वर में बोलीं—‘‘दयानिधान ! मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। मेरे पिता ही मुझे देने में समर्थ हैं।’’
भगवान् शंकर बोले—‘‘देवी ! मैं तुम्हारे पिता के पास भी गया था, किंतु उन्होंने तुम्हारे स्वयंवर होने की बात कही है। उसमें तुम जिसका वरण करोगी, वही तुम्हारा पति होगा। उस समय किसी रूपवान को छोड़कर तुम मुझ जैसे विकृत का वरण कैसे कोरगी ?’’
उनकी बात सुनकर वे बोलीं—‘‘भगवन् ! आप निश्चिंत रहें। स्वयंवर में भी मैं आपका ही वरण करूँगी। किंतु यदि आपको कोई संदेह हो तो मैं यहीं आपका वरण करती हूँ।’’ यह कहकर उन्होंने हाथों में पकड़ा अशोक का गुच्छा भगवान् शिव के कंधे पर रख दिया।
भगवती पार्वती के इस प्रकार वरण करने पर भगवान शिव अशोक वृक्ष को वर देते हुए बोले, ‘‘हे अशोक ! तुम्हारे परम पवित्र गुच्छे से मेरा वरण हुआ है, इसलिए तुम अजर-अमर रहोगे। तुम जैसा चाहोगे, वैसा रूप धारण कर सकोगे। तुम में इच्छानुसार फूल लगेंगे। तुम समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले और मेरे साथ-साथ देवताओं के भी अत्यन्त प्रिय होगे।’’
इसके बाद देवी पार्वती से विदा लेकर भगवान शिव अन्तर्धान हो गए।

5
गोदावरी


देवाधिदेव महादेव की जटा में समाहित परम पुण्यमय गंगा के दो भेद हैं, क्योंकि उन्हें पृथ्वी पर उतारने वाले दो व्यक्ति थे। गंगा का एक भाग क्षत्रिय राजा भगीरथ ने पृथ्वी पर उतारा। दूसरा भाग तप और समाधि में लीन रहने वाले गौतम ऋषि ने पृथ्वी तक पहुँचाया। इसकी कथा इस प्रकार है :
एक समय की बात है’, महर्षि गौतम कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान् महादेव की स्तुति करते हुए बोले—‘‘भगवन् ! आप समस्त प्राणियों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। विद्वान और ज्ञानी मनुष्य प्रतिदिन आपका ही ध्यान करते हैं। आपने जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करने के लिए जल का स्वरूप धारण किया है।

जो भक्तजन निष्काम भाव से आपका स्मरण करते हैं, वे जीवन-मृत्यु के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं। आप ही जगत् के कल्याण के लिए मायामय स्वरूप धारण करते हैं। मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ।’’
महर्षि गौतम की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे इच्छित वर माँगने के लिए कहा।
गौतम ऋषि बोले, ‘‘भगवन् ! यदि आप प्रसन्न हैं तो अपनी जटाओं में समाहित तीनों लोकों को पवित्र करने वाली परम पवित्र गंगा को ब्रह्मगिरि पर छोड़ दीजिए। समुद्र में मिलने तक यह सभी प्राणियों के लिए तीर्थ रूप में पूजित हो। इसमें स्नान करने से मन, वाणी और शरीर द्वारा किए हुए घोर पाप नष्ट हो जाएँ। चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, संक्रांति आदि में पुण्य-तीर्थों पर स्नान करने से प्राणी को जो फल मिलता है, वह इसके स्मरण मात्र से ही प्राप्त हो जाए और आप सदा इसके तट पर निवास कर भक्तजन का कल्याण करें। यह वर दीजिए।’’
भगवान शिव बोले—‘‘महर्षि ! इससे बढ़कर दूसरा कोई तीर्थ न है और न ही होगा। संसार में इसे गौतमी गंगा (गोदावरी) कहा जाएगा। जो भी मनुष्य इसके परम पवित्र जल में स्नान कर पीड़ित मनुष्यों को अन्न आदि देकर उनकी सेवा करेगा, उसे ऐश्वर्य और वैभव प्राप्त होगा। इसके तट पर भगवान विष्णु और देवी गंगा के प्रकट होने की दिव्य-कथा सुनने वाले मनुष्य श्रेष्ठ फल के भागी होंगे।’’

इसके बाद भगवान शिव ने महर्षि गौतम को जटासहित देवी गंगा प्रदान की।
महर्षि गौतम ने भगवान् शिव की जटाओं को ब्रह्मगिरि के शिखर पर रख दिया और देवी गंगा की स्तुति करते हुए बोले--‘‘माते ! आप समस्त कामनाओं कोउपनिषदों की कथाएं अनादि काल से हमारे मनोरंजन और ज्ञान का स्रोत रही है। दादा दादी की कथाओं से लेकर विज्ञान कथाओं का एक व्यापक इतिहास रहा है। वेद, पुराण, महाभारत, रामायण आदि की कथाएं प्राचीन काल से लेकर आज तक ज्ञान और प्रेरणा का भण्डार हैं। उपनिषद की कथाएं भी इसी क्रम में आती हैं। इनकी रचना वेदों की व्याख्या के रूप में हुई। जो बातें वेदों में जटिलता से कही गयी है उन्हें उपनिषदों में सरल ढंग से समझाया गया है। उपनिषदों में देवता-दानव, ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी, पृथ्वी, प्रकृति, चर-अचर, सभी को माध्यम बना कर रोचक और प्रेरणादायक कथाओं की रचना की गयी है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, अग्नि, सूर्य, इन्द्र आदि देवताओं से लेकर नदी, समुद्र, पर्वत, वृक्ष तक उपनिषद के कथापात्र है। उन्हीं गूढ़ पनिषदों की कथाओं को इन उपनिषदों में सरल, रोचक व प्रेरक ढंग से दिया गया है। जिससे कि ये जन मन तक पहुँच कर उनका मार्गदर्शन कर सके। पूर्ण करने वाली देवी हैं। आप यहाँ से प्रवाहित होकर जगत् का कल्याण करें। हे देवी ! भगवान् महादेव ने भी इसी उद्देश्य से आपको प्रदान किया है। आप हमारा मनोरथ पूर्ण करें।’’
उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर गंगा स्वयं को तीन स्वरूपों में विभक्त कर स्वर्गलोग, पृथ्वीलोक और पाताललोक में प्रवाहित होने लगीं।

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