श्री विष्णु - महेन्द्र मित्तल Sri Vishnu - Hindi book by - Mahendra Mittal
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श्री विष्णु

महेन्द्र मित्तल

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :48
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3964
आईएसबीएन :00000

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जगत का पालन करने वाले की अलौकिक गाथा....

Shri Vishnu

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

श्रीविष्णु

प्रारंभ में आदि रूप ‘ब्रह्म’ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। आदि रूप प्रधान ब्रह्म से ही विष्णु ने पुरुष रूप उत्पन्न किए और उसी पुरुष का प्रधान तथा प्रथम पुरुष विष्णु ही था। इस प्रकार मूल रूप से स्वयं विष्णु ही त्रिगुण तत्व-सत्व, रज और तम रूप में जगत की उत्पत्ति, सृष्टि एवं प्रलय के कारण हैं। दूसरे शब्दों में, यह सारा संसार विष्णु के द्वारा रचाया गया है। वे ही इसे उत्पन्न करते हैं, धारण करते हैं और अपनी इच्छा से प्रलय द्वारा नष्ट कर देते हैं। वस्तुतः यह जगत स्वयं विष्णु का ही रूप है।

पुराणों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की जो कल्पना की जाती है और जिसके द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय मानी जाती है, वह स्वयं विष्णु ही हैं। विष्णु इस समस्त भैतिक जगत के पालनहार हैं। देवताओं, मनुष्यों, असुरों और पशु-पक्षियों पर आने वाले सभी प्रकार के संकटों को वे दूर करने वाले हैं। वे प्राणी मात्र के रक्षक हैं, भक्तवत्सल हैं। जब-जब उन पर संकट आते हैं, वे अपनी शक्ति महमाया लक्ष्मी सहित अवतार लेते हैं। जैसे द्वापर में कृष्ण के रूप में तथा त्रेता में राम के रूप में उन्होंने मानव शरीर ग्रहण किया था। वैसे उनके चौबीस अवतार माने जाते हैं, परंतु उनके दशावतार प्रसिद्ध हैं। जिनमें ‘कल्कि अवतार’ अभी होना है।

अमृत की खोज


एक बार पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए दुर्वासा मुनि को विद्याधर जाति की एक कन्या मिली। उसके हाथ में संतानक फूलों की एक माला थी। उस माला को मुनि ने मांग लिया। दुर्वासा मुनि ने माला इंद्र को सौंप दी। इंद्र ने वह माला ऐरावत हाथी के मस्तक पर डाल दी। ऐरावत असकी सुगंध को सहन नहीं कर सका और उसने वह माला पृथ्वी पर गिरा दी।

दुर्वासा मुनि ने इसे अपना अपमान समझा। उन्होंने इंद्र को उसका वैभव नष्ट हो जाने का शाप दे दिया। इंद्र का वैभव क्षीण होने लगा तो असुरों की बन आई। उन्होंने इन्द्र को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। स्वर्ग से निकल जाने पर सभी देवगण पहले ब्रह्मा के पास गए, परंतु ब्रह्मा ने उनकी सहायता करने में स्वयं को असमर्थ बताया। तब वे ब्रह्मा के साथ क्षीरसागर में शयन करते विष्णु के पास पहुंचे और उनसे रक्षा करने की प्रार्थना की।
विष्णु ने कहा, ‘‘हे देवगण ! यदि असुरों से तुम अपनी रक्षा चाहते हो तो समुद्र-मंथन करके तुम्हें अमृत खोजना होगा। इसके लिए तुम मंदराचल को मथानी बनाओ और वासुकि नाग को उस पर लपेटकर सागर को मथो। समुद्र-मंथन से निकले अमृत का पान करने से तुम बलशाली और अमर हो जाओगे। इस कार्य में मैं तुम्हारी सहायता करुंगा।’’

समुद्र-मंथन


भगवान विष्णु का आश्वासन पाकर देवताओं ने समुद्र-मंथन की तैयारियां शुरू कर दीं। इस कार्य में सहायता करने के लिए उन्होंने असुरों को भी अमृतपान कराने का लालच दिया। असुर तैयार हो गए। मंदराचल पर्वत को महाकच्छप की पीठ पर समुद्र में धर दिया गया। मंदराचल के शीर्ष पर स्वयं विष्णु विराजमान हो गए, जिससे मंदराचल इधर-उधर न लुढ़के। वासुकि नाग को मंदराचल की कमर में लपेट दिया गया।
देवता बड़े चालाक थे। उन्होंने असुरों को वासुकि नाग के फन की ओर रखा और स्वयं पूछ की ओर पकड़कर खड़े हो गए। इस प्रकार विधि-विधान के साथ घड़ी देखकर समुद्र मंथन प्रारंभ कर दिया गया।

धीरे-धीरे समुद्र-मंथन में तेजी आने लगी। ज्यों-ज्यों तेजी बढ़ती, वासुकि नाग फेन अपने मुख से उगलने लगा। उनके फेनों के संपर्क में आने से असुरों का रंग काला पड़ गया, लेकिन देवगण उसी तरह गौर वर्ण बने रहे।
समुद्र-मंथन को जब काफी देर हो गई, तब देवगण और असुर निराश और चिंतित होने लगे। भगवान विष्णु ने उन्हें धीरज बंधाया।

दिव्य पदार्थों का उदय


भगवान विष्णु द्वारा धीरज बंधाने पर सुर-असुरों का आत्मबल बढ़ गया। वे दूने उत्साह से मंदराचल को घुमाने लगे। बड़े वेग से मथे जाने के कारण समुद्र का जल क्षुब्ध हो उठा। उस समय समुद्र के गर्भ से अगणित किरणों वाला, शीतल प्रकाश से युक्त, श्वेतवर्ण वाला चंद्रमा प्रकट हुआ। चंद्रमा के उपरांत भगवती लक्ष्मी और सुरा देवी प्रकट हुईं। तभी श्वेत वर्ण का उच्चैःश्रवा घोड़ा निकला। दिव्य किरणों से युक्त कौस्तुभमणि, मनोवांछित फल देने वाला कल्पवृक्ष और कामधेनु गाय भी उसी समय निकली। वे सभी आकाश मार्ग से देवलोक को चले गए। असुरों के हिस्से में कुछ भी नहीं आया।

इस पर असुरों ने आपत्ति प्रकट की, लेकिन विष्णु ने यह कहकर उनके क्रोध को शांत कर दिया कि बंटवारा होगा, किसी के साथ अन्याय नहीं होगा।

ऐरावत और कालकूट विष


समुद्र-मंथन फिर शुरू हो गया। इस बार तीव्र गति से मंथन किया जा रहा था। कुछ समय बाद समुद्र से सफेद दांतों वाला ऐरावत हाथी प्रकट हुआ। उसे इंद्र ने चंद्रलोक भेज दिया। उसके जाते ही भयानक कालकूट विष, विषम ज्वालाओं को फेंकता तथा गहरा काला धुआं उड़ाता हुआ प्रकट हुआ तो सभी देव-दानव घबराकर भाग खड़े हुए। विष की भयानक ज्वालाओं ने मंदराचल के वृक्षों में आग लगा दी। चारों ओर धुंआ फैलने लगा। कोई भी उसे ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं हुआ।

भगवान विष्णु ने पुकारकर उन्हें रोकना चाहा, पर वे वहां रुकने को तैयार नहीं थे। भगवान ने उनसे कहा, ‘‘इस प्रकार भागने से तुम लोग अमृत प्राप्त करने से वंचित रह जाओगे। इस विष की उष्णता को सहन करो। तभी तुम अमृत का स्वाद चख पाओगे।’’
देवता बोले, ‘‘भगवान ! अमृत तो तब चखेंगे, जब हम इस कालकूट विष से बच पाएंगे।’’
जबकि राक्षसों का कहना था, ‘‘प्रभु ! इस कालकूट से हमारी रक्षा करो। इसकी तपिश से हमारा शरीर जला जा रहा है।’’


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