गायत्री - महेन्द्र मित्तल Gayatri - Hindi book by - Mahendra Mittal
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गायत्री

महेन्द्र मित्तल

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :48
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3969
आईएसबीएन :00000

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गायत्री के ज्ञान और तेज की दिव्य महिमा का रंगीन चित्रों के माध्यम से वर्णन...

Gayatri

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘ओउम् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।।

-(यजु. 36.3)

उस प्राण स्वरूप, दुखनाशक, सुख स्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।
गायत्री वह देवी शक्ति है, जिससे संबंध स्थापित करके मनुष्य अपने जीवन को विकास के मार्ग पर, बिना किसी बाधा के ले जाता है। यह मनुष्य को सद्बुद्धि की प्रेरणा देती है।

गायत्री की महिमा अपार है। वह भूलोक की कामधेनु है। संसार का कोई कष्ट ऐसा नहीं है, जो माता गायत्री की कृपा से नष्ट न किया जा सके। विश्व की कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो माता गायत्री के अनुग्रह से प्राप्त न की जा सके।
गायत्री महामंत्र के अक्षरों का परस्परिक गुंथन, स्वर-विज्ञान और शब्द शास्त्र का आधार ऐसे रहस्यमय तरीके से किया गया है कि उसके उच्चारण मात्र से सूक्ष्म शरीर में छिपे हुए अनेक शक्ति-केंद्र अपने आप जाग्रत हो जाते हैं।
साधक और ईश्वरीय सत्ता गायत्री माता के बीच में जो दूरी है, उसे हटाने का मार्ग इन चौबीस अक्षरों के मंत्र से संभव है। गायत्री मंत्र का एक-एक अक्षर, एक-एक धर्मशास्त्र है। संसार का समस्त ज्ञान इन चौबीस अक्षरों में भरा हुआ है। इन अक्षरों के तत्त्व-ज्ञान को जो जान लेता है, उसे इस संसार में और कुछ जानने योग्य नहीं रहता। संपूर्ण वेदों का सार तत्व इस गायत्री मंत्र में निहित है।

गायत्री की शक्ति, गति, क्रिया और प्रतिक्रिया को देखकर ही सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने गायत्री माता का काल्पनिक चित्र पंचमुखी और दशभुजी नारी के रूप में निर्मित किया है। पंचमुखी और दशभुजी गायत्री का जो वर्णन धर्म ग्रन्थों में प्राप्त होता है, वह एक भावना चित्र है। उससे प्रकट होता है कि गायत्री की शक्ति, महिमा और प्रतिक्रिया मानव जीवन में किस प्रकार प्रकट होती है और उसमें कितने प्रकार के रहस्य छिपे हुए हैं। इससे अलंकारिक रूप कह सकते हैं। वस्तुतः गायत्री माता शक्ति रूप है। उसका कोई भौतिक रूप नही। वह शब्द, रूप आदि पांच भौतिक तत्वों से परे है। वह सर्वव्यापिनी, अंतर्यामिनी, सर्वशक्तिशाली एवं महिमामयी है। ‘गय’ नाम प्राणों का है। जो ‘गय’ अर्थात् प्राणों को त्राण करती है, वह गायत्री कहलाती है। गायत्री का ध्यान, प्राण अर्थात् इंद्रियों का संयमन है।

गायत्री के 24 अक्षर-24 शक्ति बीज


एक बार सभी देवताओं ने अपना-अपना तेज एकत्रित करके एक शक्ति-केंद्र के रूप में अवतरित किया। ये देवता उन तत्व प्रमुख शक्तियों को धारण करने वाले थे, जिनके द्वारा सृष्टि का निर्माण, पोषण और संहार होता है। धर्मशास्त्रों में इन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहा गया है।
इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियों से प्रकट होने वाली दिव्य शक्ति दुर्गा ही मां गायत्री है। गायत्री मंत्र में 24 अक्षर है। ये 24 अक्षर शक्ति-बीज के रूप में स्थित हैं। इनके पांच प्रमुख तत्व—पृथ्वी, जल, वायु तेज और आकाश हैं। इन चौबीस तत्वों को मिलाकर एक सूक्ष्म आध्यात्मिक-शक्ति का आविर्भाव किया गया, जिसका नाम ‘गायत्री’ रखा गया।
इन चौबीस अक्षरों के देवता इस प्रकार हैं—सर्वश्री गणेश, नृसिंह, विष्णु, शिव, कृष्ण, राधा, लक्ष्मी, अग्नि, इन्द्र, सरस्वती, दुर्गा, हनुमान, पृथ्वी, सूर्य, राम, सीता, चन्द्र, यम, ब्रह्मा, वरुण, नारायण, हयग्रीव, हंस और तुलसी। ये सभी देवता सूक्ष्म रूप से महान शक्तियों के प्रतीक हैं।

गायत्री मंत्र का रहस्य


एक बार नारद मुनि ने भगवान विष्णु से पूछा, ‘‘भगवान ! गायत्री की महिमा अनंत है। वेद, पुराण, सभी धर्म शास्त्र, ऋषि-मुनि, गृहस्थ-वैरागी, स्त्री-पुरुष आदि समान रूप से गायत्री की महानता को स्वीकार करते हैं। कृपया गायत्री महिमा का बखान कीजिए।’’
भगवान विष्णु ने कहा, ‘‘हे नारद ! गायत्री के 24 अक्षरों में अनंत ज्ञान भरा पड़ा है। जो ज्ञान गायत्री के गर्भ में छिपा है, उसे यदि मनुष्य भली प्रकार समझ ले और उसका अपने जीवन में व्यवहार करे, तो उसके लोक-परलोक दोनों सुख-शांति से भर जाएं। सच्चिदानंद सर्वेश्वर परमात्मा ‘ऊँ’ है। ‘भूः’ प्राण तत्व है, जो समस्त प्रणियों में ईश्वर का अंश है। संसार में समस्त दुखों का नाश ही ‘भुवः’ कहलाता है। ‘स्वः’ शब्द से मन की स्थिरता का बोध होता है। ‘तत्’ शब्द से जीवन-मरण के रहस्य को जाना जाता है। ‘सवितु’ मनुष्य को सूर्य के समान बलवान बनाता है। ‘वरेण्यं’ मनुष्य को श्रेष्ठता की ओर ले जाता है। ‘भर्गो’ मनुष्य को निष्पाप करता है। ‘देवस्य’ बताता है कि मरणधर्मा मनुष्य भी देवत्व प्राप्त करके अमर हो सकता है। ‘धीमिहि’ मनुष्य को पवित्र शक्तियों को धारण करना सिखाता है। ‘धियो’ का संकेत है कि शुद्ध बुद्धि से ही सत्य को जाना जा सकता है। ‘योनः’ मनुष्य की आवश्यकता के अनुसार अपनी न्यूनतम शक्तियों का प्रयोग करने की प्रेरणा देता है और शेष को छोड़ने की शक्ति देता है। ‘प्रचोदयात्’ मनुष्य को स्वयं तथा दूसरों को सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

शिव द्वारा गायत्री-रहस्य का उद्घाटन


एक बार कैलाश पर्वत पर शिव और पार्वती परस्पर वार्ता कर रहे थे। पार्वती ने जिज्ञासु होकर भगवान शिव से पूछा, ‘‘हे स्वामी ! आप तो समस्त ब्रह्माण्ड के ज्ञाता हैं। योगेश्वर हैं, फिर आप किसके योग की उपासना किया करते हैं? वह कौन है, जिसकी उपासना से आपको अनंत सिद्धियां प्राप्त हुई हैं ?’’
शिव बोले, ‘‘पार्वती ! गायत्री वेद माता है। इस ब्रह्माण्ड में वह आदिशक्ति के रूप में जानी जाती है। वह संसार की माता है। मैं उसी गायत्री माता की उपासना करता हूं। यह माता समस्त यौगिक साधनाओं की मूलाधार है। इसके पांच मुख हैं और दस भुजाएं हैं। ऋषियों ने इसके दिव्य स्वरूप की भव्य कल्पना की है।’’
पार्वती ने कहा—‘‘हे प्रभु ! कृपया गायत्री माता के इस भव्य स्वरूप का विस्तार से वर्णन कीजिए। उनके पांच मुखों और दश भुजाओं का रहस्य क्या है ?

गायत्री के पांच मुखों का रहस्य


शिव ने गायत्री के पांच मुखों का रहस्य बताते हुए कहा, ‘‘हे पार्वती ! यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड जल, वायु, पृथ्वी, तेज और आकाश के पांच तत्वों से बना है। संसार में जितने भी प्राणी हैं, उनका शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है। ये पांच तत्व ही गायत्री के पांच मुख हैं। मनुष्य के शरीर में इन्हें पांच कोश कहा गया है। ये पांच कोश अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश के नाम से जाने जाते हैं। ये पांच अनंत ऋद्धि-सिद्धियों के अक्षय भंडार हैं। इन्हें पाकर जीव धन्य हो जाता है।’’
पार्वती ने पूछा, ‘‘प्रभु ! इन्हें जाना कैसे जाता है ? इनकी पहचान क्या है ?’’
शिव बोले, ‘‘पार्वती ! योग साधना से इन्हें जाना जा सकता है, पहचाना जा सकता है। इन्हें सिद्ध करके जीव भव सागर के समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है। जीवन-मरण के चक्र से छूट जाता है। जीव का ‘शरीर’ अन्न से, ‘प्राण’ तेज से, ‘मन’ नियंत्रण से, ‘ज्ञान’ विज्ञान से और कला से ‘आनन्द की श्रीवृद्धि होती है। गायत्री के पांच मुख इन्हीं तत्वों के प्रतीक हैं।

गायत्री की दस भुजाएं


पार्वती ने पूछा, ‘‘प्रभु ! गायत्री की दश भुजाओं का क्या अर्थ है ?’’
शिव बोले, ‘‘पार्वती ! मनुष्य जीवन के दस शूल अर्थात् कष्ट हैं। ये दस कष्ट है—दोषयुक्त दृष्टि, परावलंबन, भय, क्षुद्रता, असावधानी, क्रोध, स्वार्थपरता, अविवेक, आलस्य और तृष्णा। गायत्री की दस भुजाएं इन दस कष्टों को नष्ट करने वाली हैं। इसके अतिरिक्त गायत्री की दाहिनी पांच भुजाएं मनुष्य के जीवन में पांच आत्मिक लाभ—आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, आत्म-अनुभव, आत्म-लाभ और आत्म-कल्याण देने वाली हैं तथा गायत्री की बाईं पांच भुजाएं पांच सांसारिक लाभ—स्वास्थ्य, धन, विद्या, चातुर्य और दूसरों का सहयोग देने वाली हैं। दस भुजी गायत्री का चित्रण इसी आधार पर किया गया है। ये सभी जीवन विकास की दस दिशाएं हैं। माता के ये दस हाथ, साधक को उन दसो दिशाओं में सुख और समृद्धि प्रदान करते हैं। गायत्री के सहस्रो नेत्र, सहस्रों कर्ण, सहस्रों चरण भी कहे गए हैं। उसकी गति सर्वत्र है।

गायत्री भूलोक की कामधेनु है


पार्वती ने पुनः पूछा, ‘‘प्रभु ! विद्वान लोग गायत्री को भू-लोक की कामधेनु कहते हैं। इसका क्या अर्थ है ?’’
शिव बोले, ‘‘पार्वती ! कामधेनु वह गाय है, जो संपूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करती है। समुद्र-मंथन के समय सुर-असुर द्वारा इसे समुद्र से निकाला गया था। जो व्यक्ति अपनी संपूर्ण इंद्रियों को वश में कर लेता है, वही कामधेनु को अपने पास रख सकता है। इसीलिए इन्द्र के पास यह सदैव रहती है। पांच तत्वों—पृथ्वी, जल, वायु, तेज और आकाश से जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड बना है, उसी प्रकार कामधेनु भी पांच तत्वों से बनी है। जो व्यक्ति इन पांच तत्वों के मर्म को जान लेता है, वह जीवन के समस्त प्रपंचों से छुटकारा पा जाता है।’’

पार्वती ने पूछा, ‘‘स्वामी ! गायत्री अत्यंत कल्याणकारी है। फिर इसे इतना गुप्त क्यों रखा गया है ?’’
शिव बोले, ‘‘पार्वती ! गायत्री विद्या को गुप्त इसलिए रखा गया है कि कुपात्रों द्वारा इसका दुरुपयोग न हो। वस्तुतः गायत्री की साधना अत्यंत पवित्र मन से की जाती है। यह साधना अत्यंत उग्र और प्रचण्ड है। किसी योग्य गुरु के सान्निध्य में रहकर ही इस साधना को करना चाहिए, अन्यथा यह विद्या निष्फल हो जाती है, जिसका परिणाम बड़ा भयंकर होता है।

गायत्री साधना—अनंत आनंद की साधना


वरुण के पुत्र भृगु ने अपने पिता के निकट जाकर प्रार्थना की, ‘‘हे पिताश्री ! मुझे ब्रह्मज्ञान की शिक्षा दीजिए।’’
वरुण ने पुत्र को जिज्ञासु देखकर कहा, ‘‘हे पुत्र ! यह समस्त संसार जिससे उत्पन्न होता है, जीवित रहता है और अंत में जिसमें विलीन हो जाता है, तू उसी के विषय में मुझसे जानना चाहता है ? उसे गायत्री भी कहते हैं।’’
भृगु ने कहा, ‘‘हे पिता ! मैं नहीं जानता कि वह कौन है ? विद्वान लोग उसे ‘ब्रह्म’ का नाम देते हैं। यदि यह समस्त संसार उसी ब्रह्म से उदित होता है, जीवित रहता है और फिर अंत समय में उसी में विलीन हो जाता है तो आप मुझे उसी ब्रह्म के विषय में बताइए कि वह कौन है और कैसा है ?’’

वरुण ने कहा, ‘‘पुत्र ! वह ब्रह्म पांच आवरणों के पीछे छिपा है। उसे जानने के लिए तुझे ये पांच आवरण भेदने होंगे। ये पांच आवरण—अन्नमय कोश, प्राण मय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश के नाम से जाने जाते हैं। इन्हें जानने के लिए, तुझे कठोर तपस्या करनी होगी।’’
भृगु ने कहा, ‘‘मैं तप करूंगा पिताश्री।’’ ऐसा कहकर भृगु वन में चला गया।
भृगु की कठोर तपस्या और गायत्री का प्रथम मुख ‘अन्नमय कोश’

वन में रहकर भृगु ने वर्षों तक घोर तपस्या की। परंतु वह पांच आवरणों का भेद नहीं जान सका। साधना बीच में छोड़कर वह नगर में आया। नगर में उसकी भेट एक साध्वी स्त्री से हुई। भृगु ने उससे पूछा—‘‘देवी ! यह अन्नमय कोश क्या है ?’’
साध्वी स्त्री ने भृगु के चेहरे पर ब्रह्मचर्य का तेज देखा और कहा—‘‘वत्स ! मनुष्य का यह हाड़-मांस का शरीर अन्न के आवरण से घिरा है। पृथ्वी से उत्पन्न वनस्पति द्वारा इसका पोषण होता है और स्त्री-पुरुष के शारीरिक संसर्ग से ही ये जीवन चलता रहता है। इसका अनुभव करने के लिए तुम्हें वैवाहिक-बंधन में बंधना होगा। दार्शनिक इसे ‘अन्नमय कोश’ का नाम देते हैं।’’


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