मेरी इक्यावन बाल कहानियाँ - भगवतीशरण मिश्र Meri Ikyavan Bal Kahaniyan - Hindi book by - Bhagwati Sharan Mishra
लोगों की राय

कहानी संग्रह >> मेरी इक्यावन बाल कहानियाँ

मेरी इक्यावन बाल कहानियाँ

भगवतीशरण मिश्र

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :296
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4037
आईएसबीएन :81-7043-527-7

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

288 पाठक हैं

प्रस्तुत है बाल कहानियाँ

Meri ekyavan bal kahaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मीरा के श्याम

राजस्थान का एक छोटा-सा राज्य था मेवाड़। राव दूदा वहाँ के राजा थे। उन्होंने अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे थे। वह युद्ध नहीं चाहते थे, पर उन्हें विवश होकर युद्धों में भाग लेना पड़ता था। वह श्रीकृष्ण के भक्त थे।
राव दूदा वृद्ध थे। उनसे अब बहुत कुछ नहीं हो सकता था। वह चाहते थे कि उनके वंश में कोई ऐसा उत्पन्न हो जो सबको प्रेम के रंग में रंग दे। घृणा के स्थान पर भक्ति का प्रचार करे। काश ! कोई उनके सपनों को साकार करता।

श्रीकृष्ण ने राव दूदा की सुन ली। कुड़की गाँव में उनके पुत्र रतनसिंह के यहाँ एक पुत्री ने जन्म लिया।
राव दूदा पोती के जन्म का समाचार पाकर खुशी से खिल उठे। बोले—‘‘क्या हुआ जो मेरे कुल में बालिका ने जन्म लिया ! मैं उस बालिका को ही श्रीकृष्ण की भक्ति के रँग में रँग दूँगा।’’ उन्होंने उसका नाम रखा-मीरा।
मीरा कुड़की में पलने लगी। उसके पिता रतनसिंह भी श्रीकृष्ण के भक्त थे। दो-तीन वर्ष की होते-होते मीरा श्रीकृष्ण के रंग में रँगने लगी। पिता ने मीरा के लिए घर के सामने श्रीकृष्ण का मन्दिर बनावा दिया।
मीरा चार-पाँच वर्षों की हुई, तो वह श्रीकृष्ण के भजन गुनगुनाने लगी। वह उनके प्रेम में नाचने लगी।
मीरा की श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति बढ़ती जा रही थी। उसे रोकना रतनसिंह के वश की बात नहीं थी।
अतः राव दूदा ने मीरा को अपने पास मेवाड़ बुला लिया। उनके महल में श्रीकृष्ण का मन्दिर था। वह मन्दिर के प्रांगण में मीरा को भक्ति का पाठ पढ़ाने लगे। शीघ्र ही मीरा श्याम की भक्ति में लीन हो गई। आरती के समय मीरा भजन गाती। भजन गाते-गाते उसके पैर भी थिरकने लगते। उसके गले से भजन के मधुर स्वर निकलते—‘‘मीरा के प्रभु गिरधर नागर।’’
ऐसे पद मीरा स्वयं रचने लगी। राव दूदा उसकी प्रतिभा से हैरान थे। वह मीरा को पढ़ाने-लिखाने लगे।
दूसरे बालक-बालिकाओं की तरह उसे साधारण खिलौनों की आवश्यकता नहीं थी। उसके लिए श्रीकृष्ण की मूर्ति ही उसका खिलौना था।

पूर्णिमा के चाँद की तरह मीरा खिल आई। उसका हृदय श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति की लहरें हिलोरें लेने लगा। यह देख, राव दूदा की खुशी की सीमा न रही। उनका सपना साकार हो गया था। पर अब दूसरी समस्या सामने आई। विवाह की बात चली, तो मीरा ने शादी करने से इनकार कर दिया। बोली—‘‘मेरी शादी तो श्रीकृष्ण से हो चुकी है। अब कैसा विवाह ? कैसी शादी ?’’
राव दूदा चिन्ता में पड़ गए। उन्होंने मीरा को समझाया—‘‘विवाह से श्रीकृष्ण की भक्ति में कोई कमी नहीं आएगी।’’
‘‘ईश्वर से विवाह करने के बाद मैं सामान्य मनुष्य से कैसे विवाह कर सकती हूँ ?’’ मीरा ने अपने पितामह राव दूदा से पूछा।
‘‘उपाय है।’’ राव दूदा ने कहा।
‘‘क्या ?’’ मीरा ने पूछा।

‘‘पहले वचन दो कि तुम मेरी बात मानोगी।’’ राव दूदा ने उससे कहा।
मीरा ने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। राव दूदा ने कहा—‘‘बेटी विवाह के बाद तुम यह समझना कि तुम अपने पति की नहीं, अपितु श्रीकृष्ण की सेवा कर रही हो। ऐसे करने से तुम्हें अपने पति भी श्रीकृष्ण नजर आएँगे।’’
मीरा को पितामह की बात समझ में आ गई। चित्तौड़ के राजा राणा सांगा के पुत्र भोजराज से उसका विवाह हो गया।
भोजराज ने मीरा की भावनाओं का आदर किया। उसके श्रीकृष्ण प्रेम को बढ़ावा देने में उन्होंने पूरा सहयोग दिया। किले में श्रीकृष्ण का मन्दिर भी बनावा दिया। मीरा को परदे से पूरी तरह मुक्ति दे दी। वह मन्दिर में सबके समक्ष भजन गाने लगी। भजन गाते-गाते उसके पैर भी थिरक उठते थे। दूर-दूर से लोग उसके दर्शन करने आने लगे। साधु-सन्त भी एकत्र होने लगे।
मीरा का ऐसा श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम, साधु-महात्माओं का जमघट राजघाराने के लोगों को रास नहीं आया।

मीरा की सास कर्मवती को मीरा फूटी आँखों भी नहीं सुहाती थी। भोज के भाई भी यह सब पसन्द नहीं करते थे।
मीरा की भक्ति का प्रभाव चारों ओर फैल गया। वनवासी, आदिवासी भी उसके नृत्य और गायन को देखने-सुनने आने लगे। मीरा ने उनको संगठन की शिक्षा दी। कर्म का महत्त्व समझाया। दरिद्रता से उबरने का मार्ग दिखाया।
एक दिन भोजराज बीमार हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। मीरा पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। सास कर्मवती और देवर विक्रमादित्य की बन आई। उन्हें मीरा से मुक्ति पाने का अवसर मिल गया।
इधर भोजराज की अरथी सजाई जा रही थी। उधर मीरा की चिता सज रही थी। एक ही साथ दोनों को आग की लपटों के हवाले कर देना था।

कर्मवती ने मीरा को सजने-सँवरने को कहा।
पर मीरा ने सती होने से इन्कार कर दिया। वह बोली—‘‘मैं नहीं जाती चिता पर चढ़ने।’’
‘‘क्यों ?’’ कर्मवती ने कड़क कर पूछा।
‘‘जाए वह जिसका पति मरा हो।’’ मीरा बोली।
‘‘तो तुम्हारा पति नहीं मरा ?’’ सास ने आश्चर्य से पूछा।
‘‘वह तो अमर है। वह तो अब भी मेरे साथ है।’’ मीरा बोली।
‘‘तुम्हारे साथ है, पर वह कहाँ है ?’’ कर्मवती और विक्रमादित्य साथ-साथ बोल पड़े। ‘‘यहीं इसी कमरे में।’’ मीरा ने कहा।


प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book