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उपन्यास >> न जाने कहाँ कहाँ

न जाने कहाँ कहाँ

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :138
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 405
आईएसबीएन :9788126340842

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ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका श्रीमती आशापूर्णा देवी जी का एक और उपन्यास

उन दिनों घर में हर समय लोग बोला करते थे। गृहिणी तो अकेली ही सौ के बराबर थी। हर कोई ज़ोर से बोलता था। दबी आवाज़ में बोलना तो कोई जानता ही नहीं था। अब सब बदल गया है।

तेज और ऊँची आवाज़ में कोई नहीं बोलता है। धीरे बोलो, धीरे हँसो।

जो कुछ शोर मचता वह दूरदर्शन के पर्दे पर। वह भी गला फाड़कर गाता, उसी में शोर मचाकर नाचा जाता।

जहाँ हर कोई धीरे बोलते, धीरे चलते, दबी आवाज़ में बोलते वहाँ प्रवासजीवन अपने निजी स्टाइल में गला फाड़कर पुकार न पाते–'भूषण !' अथवा – 'देबू !'

हाँ वे लोग हैं।

बालक देबू के होठों के ऊपर अब बारीक मूंछों की रेखा उभर आयी है और युवक भूषण थोड़ा और जवान हो गया है। अब तो वे लोग भी घर की धारा के मुताबिक बह रहे हैं। भूषण अब सोच ही नहीं सकता है कि खाना पकाते-पकाते वह एकाएक हिन्दी सिनेमा के गाने की एक लाइन गा सकता है।

चैताली बोली, “दोपहर में थोडा रेस्ट किया था न पिताजी?' प्रवासजीवन हँस पड़े, "रेस्ट तो हर समय ही करता हूँ, बेटी।"

“वाह ! यह कैसे कह रहे हैं? किसी-किसी दिन तो आप दोपहर भर किताब पढ़ा करते हैं।"

प्रवासजीवन जानते हैं, बात करने के लिए ही यह सब कह रही है। इस लड़की में सौजन्यता का ज्ञान बहुत है।

वे भी उस वातावरण को बनाये रखकर मस्करा देते हैं, “वह तो कभी कोई किताब जब बहुत अच्छी लगती है तब।”

इसके बाद ही प्लान मुताबिक झट से चिट्ठी उठाकर चैताली की ओर बढ़ाकर कौतुकपूर्ण स्वरों में बोल उठे, “तुम्हारी गृहस्थी में तो एक और मेम्बर बढ़ गया। देखो पढ़कर?'

चैताली की भौंहें ज़रा-सी सिकुड़ी क्या? शायद। पत्र हाथ में लेते हुए बोली, "यह पत्र तो आपके नाम है।"

“अरे नाम तो मेरा ही होगा परन्तु भार तो तुम पर भी पड़ेगा।"

तह खोलकर चैताली ने पत्र पढा। उसके बाद चपचाप फिर से तह करके छेने की प्लेट के पास मेज पर रख दिया। उसके हावभाव से किसी तरह का कुछ अनुमान लगा पाना सम्भव नहीं था।

प्रवासजीवन बड़े अप्रतिभ हुए। सोचा था कुछ ज़रूर कहेगी। नहीं तो एक आध सवाल पूछेगी। यह भी तो पूछ सकती थी, “यह लाबू कौन है?"

यूँ पहचान लेने की बात भी नहीं है। शादी के वक़्त देखा होगा। लेकिन उस समय देखा चेहरा कहाँ याद रहता है ! नयी बहू को तो न जाने कितने चहरे देखने को मिलते हैं।

अप्रतिभ प्रवासजीवन ने छेने की प्लेट ज़रा आगे खींच, गला साफ़ कर बड़े ही सहज ढंग से कहा, “लाबू कौन है पहचान पायी? मेरी बुआ की लड़की। तुम्हारी शादी के वक्त आयी थी। तुम्हारी सास से तो उसकी बहुत दोस्ती थी। कम उम्र में विधवा हुई है। अगर कहा जाये कि यहीं पली-बड़ी है तो उसमें दोष नहीं होगा। दादी ज्यादातर बीमार रहती थीं इसीलिए बुआजी भी अक्सर यहीं रहती थीं।"

चैताली ने केवल हूँ' कहा।

इकट्ठा इतनी सारी बातें करने के बाद प्रवासजीवन ने हूँ' सुना तो उनका साहस बढ़ गया। बोले, “बेवक्त बेचारी के पति का देहान्त हो जाने से पढ़ा तो तुमने? जान तो गयी हो सब?”

हाँ पढ़कर जान तो गयी ही है। एक ही नज़र में पढ़कर समझ लिया है।

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